सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ सूरसागर सार सटीक भगवान् मेरे द्वारा सेवित नही हुए (उनकी) सेवा (आराधना मुझसे न हो सकी), जो सभी सुखो से भरी हुई निधि है। विशेष—पद के अन्त में 'मई' (मयी) शब्द निधि के मेल मे स्त्रीलिंग में है ॥३६॥ अब मैं जानी, देह बुढ़ानी । सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दशा सिरानी । आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक वहै पानी । मिटि गइ चमक-दमक अंग-अंग की, मति अरु दृष्टि हिरानी । नाहिं रहि कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात विरानी । सूरदास अब होत विगूचनि, भजि लै सारँगपानी ॥३७॥ अर्थ—अब मैं जान गया कि शरीर वृद्ध हो गया। फिर, पैर, हाथ अब कहना नहीं मानते (न चाहने पर भी हिलते-कांपते रहते हैं) शरीर की (स्वाभाविक, स्वस्थ] दशा बीत गयी। कहते कुछ और हैं, मुख से शब्द कुछ और ही निकलते है। आंख और नाक से (अनावश्यक) पानी बहता रहता है। विभिन्न अंगो की चमक तथा आभा समाप्त हो गयी। स्मरण-शक्ति तथा [नेत्रों की दृष्टि] खो गयी। शरीर तथा मन का कुछ भी ध्यान न रहा, सभी बाते बदल गई। सूरदास कहते हैं कि अब दुर्दशा (छोछालेदर) होने लगी, इसलिए [ऐसी दशा में जब सांसारिक जीवन मे रस नही रहा] भगवान् (सारंग-पानी) का भजन ही कर ले ॥३७॥ मन प्रबोध सब तजि भजिऐ नन्द कुमार । और भजे तैँ काम सरै नहिँ, मिटै न सब जंभार । जिहिँ जिहिँ जोनि जन्म धायो, वहु जोर्यो अघ कौ भार । जिहिँ काटन कौँ समरथ हरि कौँ तीछन नाम-कुठार । वेद, पुरान, भागवत, गीता, सब कौ यह मत सार । भव समुद्र हरि-पद-नौका बिनु, कोउ न उतारै पार । यह जिय जानि, इहीँ छिन भजि, दिन बीते जात असार । सूर पाइ यह समौ लाहु लहि, दुर्लभ फिरि संसार ॥३८॥ अर्थ—[हे मन,] सब कुछ छोड़कर नन्दकुमार का भजन करना चाहिए । अन्य किसी का भजन करने से कार्य सिद्ध नही होता और न इस सांसारिक (जन्म-मरण के) बखेडे से ही छुटकारा मिलता है। जिस-जिस योनि मे जन्म लिया वहाँ [तुमने] बहुत अधिक पाप का भार एकत्र किया। उसे काटने मे हरि नाम रूपी तीक्ष्ण कुल्हाडी ही समर्थ है, वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत तथा गीता सभी ग्रन्थों के मतों का यही तत्व है कि इस संसार रूपी सागर से भगवान् के चरण रूपी नौका के अतिरिक्त कोई पार नही उतार सकता। ऐसा मन में समझ कर इसी क्षण (भगवान् का) भजन [आरम्भ] करो [नही तो] दिन व्यर्थ मे ही बीतते जा रहे है। सूरदास कहते है कि