सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति ३७ [मनुष्य-जन्म का] यह सुअवसर जो संसार मे फिर दुष्प्राप्य है, प्राप्त करके इसकी (भगवद्-भजन-रूपी) सार्थकता (लाभ) प्राप्त कर लो ॥३८॥ जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैँ । ता दिन तेरे तन-तरुवर कै, सबै पात झरि जैहैँ । या देही कौ गरब न करिये, स्यार-काग-गिध खैहैँ । तीननि में तन कृमि, कै बिष्टा कै ह्वै खाक उड़ैहैँ । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा, कहँ रंग-रूप दिखैहैँ । जिन लोगनि सौँ नेह करत हैं, तेई देखि घिनैहैँ । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ घर खैहैँ । जिन पुत्रनिहिँ बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैँ । तेई लै खोपरी बाँस दे, सीस फोरि बिखरैहैँ । अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, सतानि मैँ कछु पैहैँ । नर-बपु धारि नाहिँ जन हरि कौँ, जम की मार सो खैहैँ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु वृथा सु जनम गँवैहैँ ॥३६॥ अर्थ-हे मन, जिस दिन प्राण रूपी पक्षी उड़ जायेगा उस दिन तुम्हारे शरीर रूपी वृक्ष के सारे पत्ते झड़ जायेगे (सम्पूर्ण कायिक सौन्दर्य समाप्त हो जायेगा) । इस शरीर पर गर्व मत करो; [प्राण छूटने पर] इसे स्यार, कौवे, गिद्ध आदि खायेगे । शरीर का तीन मे से एक परिणाम होगा, या तो [गाडे जाने पर सड़कर यह] कीड़ों में परिणत होगा, या [स्यार, गिद्ध आदि द्वारा खाया जाकर] मल बन जायेगा, या [जलाया जाकर] खाक बन कर उड़ जायेगा । शरीर की वह आभा, वह सौन्दर्य, वह रंग-रूप तब कहाँ दिखाई पडेगा ? जिन लोगों से तुम स्नेह करते हो वे ही देख कर घृणा करने लगेगे । घर के लोग कहने लगेगे कि शीघ्र ही [इसे बाहर] निकालो, नही तो भूत बन कर पकड़ कर खाने लगेगा । जिन पुत्रो का बड़ा प्रतिपालन किया और [उनकी कुशलता के लिए] अनेक देवी देवताओ की मनोती मानी, वे ही तुम्हारी खोपड़ी पर बाँसो से प्रहारकरके उसे तोड कर बिखरा देगे । हे मूढ, अब भी सत्संगति करो, संतो में तुम्हेकुछ [अवश्य] प्राप्त होगा । मनुष्य का शरीर धारण करके जो भगवान् का भक्त (जन) नही होता उसे यमराज (काल) का दण्ड सहना पड़ेगा । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य का जन्म व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगा ॥३६॥ तिहारौ कृष्न कहत कह जात ? बिछुरै मिलन बहुरि कब ह्वैहै, ज्यौँ तरवर के पात । सीत-वात-कफ कंठ बिरौधै, रसना टूटै बात । प्रान लए जम जात, मूढ़-मति देखत जननी-तात । छन इक माहिँ कोटि जुग बीतत, नर की केतिक बात । यह जग-प्रीति सुवा-सेमर ज्यौँ, चाखन ही उड़ि जात ।