सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ सूरसागर सार सटीक
जमकेँ फंद पर्यौ नहिं जब लगि, चरननि किन लपटात । कहत सूर बिरथा यह देही, एतौ कत इतरात ॥४०॥ अर्थ—कृष्ण कहने मे तुम्हारा क्या जाता है ? [इस संसार में] बिछुड जाने पर वृक्ष के [टूटे हुए] पत्तो की भाँति फिर मिलन कब होगा ? शीत-वात तथा कफ (के प्रकोप) से कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है [और] जिह्वा से शब्द फूटने बन्द हो जाते हैं । हे मूर्ख [माता-पिता के] देखते-देखते यमराज प्राणो का हरण करके चल देते हैं । [विधाता के] एक ही क्षण मे [मर्त्यलोक के] करोडो युग बीत जाते है, मानव जीवन किस गिनती मे है ? यह सांसारिक प्रेम [आकर्षक लाल-लाल फूलो को देख कर] सुए द्वारा सेये गये सेमर के टेढे के समान [अन्तःसार-शून्य] है, जो चखना आरम्भ करते (चोच मारते) ही [रूई के रूप मे] उड़ जाता है । इसलिए, जब तक यमराज के बन्धन मे नही पड़ते तब तक [भगवान् श्रीकृष्ण के] चरणो से क्यों नही लिपट जाते । सूरदास कहते है कि [भगवद्भक्ति के बिना] यह शरीर व्यर्थ है, इस पर इतना क्यो इतराते हो ? ॥४०॥ मन, तोसोँ किती कही समुझाइ । नँदनंदन के चरन कमल भजि तजि पाखंड-चतुराइ । सुख-सपति, दारा-सुत, हय गय, छूट सबै समुदाइ । छनभंगुर यह सबै स्याम बिनु, अंत नाहिं सँग जाइ । जनमत-मरत बहुत जुग बीते, अजहुँ लाज न आइ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, जैहै जनम गँवाइ ॥४१॥ अर्थ—हे मन, मैंने तुमसे कितना समझा कर कहा कि पाखण्ड और चतुराई (धूर्तता) छोडकर श्रीकृष्ण के चरण कमलो को भजो । सुख सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र, घोड़ा- हाथी [आदि भोज्य पदार्थों] का सम्पूर्ण समूह यही छूट जाता है । यह सब क्षण-भगुर (नाशवान्) है, भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी अन्त मे (मरने पर) साथ नही जाता । जन्म लेते और मरते अपरिमित समय बीत गया किन्तु तुम्हें आज भी लज्जा नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना यह जन्म व्यर्थ मे नष्ट हो जावेगा ॥४१॥ धोखैँ ही धोखैँ डहकायौ । समुझि न परी, विषय-रस गोध्यौ, हरि-हीरा घर माँझ गँवायौ । ज्यौँ कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई चहूँ दिसि धायौ । जनम-जनम बहु करम किए हैं, तिनमै आपुन आपु बँधायौ । ज्यौँ सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चित्त लगायो । रीति पर्यौ जबै फल चाख्यौ, उड़ि गयौ तूल, ताँवरौ आयौ । ज्यौँ कपि डोर बाँधि बाजीगर, कन-कन कौँ चौहहैँ नचायौ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, काल-ब्याल पै आप डसायौ ॥४२॥