सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति ३५ अर्थ-[जीवन के] सारे दिन विषय वासनाओं के चक्कर में ही बीत गये। [बीती हुई] तीनों अवस्थाएँ (बाल्य, कौमार तथा यौवन) मैंने व्यर्थ मे ही खो दी [और अब वार्द्धक्य आ गया] शिर के केश श्वेत हो गये। आंखों से अन्धा हो गया, कानो से सुनाई नही पडता, तथा चरणों सहित सभी अंग शिथिल हो गये। [माया द्वारा वशीभूत मन] गंगा का पवित्र जल छोड़कर कुएँ का पानी पीता है, भगवान् का परित्याग कर प्रेत-पूजा करता है। जो मन, वाणी और कर्म से श्याम का भजन करता है [उसे वे] चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) प्रदान करते हैं। ऐसे प्रभु का त्याग करके हे अचेत [मन] क्यो भटक रहे हो ? अब भी चेत जाओ । राम-नाम का स्मरण किये बिना तुम (आवागमन से) मुक्त नही हो सकते। (तुम उसी प्रकार काल के ग्रास हो) जैसे चन्द्रमा केतु-ग्रस्त होता है। सूरदास कहते हैं कि राम का नाम मुँह से लेने में कुछ खर्च भी तो नही लगता [फिर तुम राम नाम क्यों नही लेते ?] ॥३५॥ द्वै मैँ एकौ तौ न भई । ना हरि भज्यौ, न गृह सुख पायौ, वृथा विहाइ गई। ठानी हुती और कछु मन मैँ, औरै आनि ठई। अविगत-गति कछु समुझि परत नहिँ, जौ कछु करत दई। सुत सनेहि-तिय सकल कुटुंब मिलि, निसि-दिन होत खई। पद-नख-चंद चकोर विमुख मन, खात अँगार मई। विषय-विकार-दवानल उपजी मोह-बयारि लई। भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेँव गई। होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई। सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥३६॥ अर्थ-जीवन के दो लाभ कहे जाते है, एक सांसारिक दूसरा पारमार्थिक [इन] दोनो मे एक की भी तो प्राप्ति नही हुई [मैने] न तो भगवान् का भजन किया और न गृहस्थाश्रम का ही सुख प्राप्त किया, सम्पूर्ण आयु व्यर्थ मे ही बीत गयी। मन मे निश्चय किया था कुछ और किन्तु हो कुछ और ही गया। जो कुछ होता है, उसे देव (विधाता) ही करता है। किन्तु [उस] अविनाशी का अविज्ञात विधान कुछ समझ में नही आता । पुत्र, प्रेम करने वाली पत्नी आदि सम्पूर्ण परिवार में लगकर (आसक्त होकर) रात- दिन क्षय को प्राप्त होता रहता हूँ। [भगवान् के] पद-नख रूपी चन्द्रमा से विमुख मन रूपी चकोर अंगार-मयी (अंगारो के समान दाह-मयी) विषय-वासना जनित पीड़ाएँ भोगता है (जैसे चन्द्रमा के अदर्शन पर चकोर अगारे खाता है)। विषय-वासना और [मानसिक] विकारों की दावाग्नि उत्पन्न हुई जिसे मोह रूपी वायु ने और भी प्रज्वलित कर दिया। [उसके फलस्वरूप अनेक योनियो मे] भ्रमण करते-करते अनेक कष्ट सहे किन्तु आज भी वह पुराना ढर्रा, दूर नहीं हुआ। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ (क्योकि) बहुत देर हो गयी। सूरदास कहते हैं कि [खेद है कि] कृपा-निधि