सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ सूरसागर सार सटीक वाराणसी [के समान] मुक्ति दायी क्षेत्र है, चलो तुम्हें [इसे] दिखला दूँ । सूरदास कहते हैं कि सन्तों की संगति ही यह [मुक्ति दायी वन-वाराणसी है], इसे पा जाऊँ तो मेरे धन्य भाग्य ! ॥४७॥ हरिविमुख-निन्दा अचंभौ इन लोगनि कौ आवै । छाँड़ि स्याम-नाम-अमृत फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै । मानसरोवर छोड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रम जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहतु जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥४८॥ अर्थ—इन [असन्त (माया-ग्रस्त)] लोगो को देखकर आश्चर्य होता है । ये नाम रूपी अमरता प्रदान करने वाले फल का परित्याग करके माया रूपी विष फल को पसन्द करते हैं । ये मूर्ख (हरिविमुख) मलय चन्दन की निन्दा करते हैं और शरीर मे भस्म रमाते हैं । [इनका मन रूपी] हंस मानसरोवर के तट का परित्याग करके कौवो के तालाब में स्नान करता है । ये मूर्ख अपने पैरों के नीचे की जलन को नही जानते घर मे लगी हुई आग को छोड़कर घूरे की आग बुझाते हैं । [भाव यह है कि हृदयस्थ लोभ-मोहादि रूपी ताप को नही बुझाते वरन् बाह्य अंगो को जो ताप के वास्तविक स्थल नही हैं स्नानादि द्वारा सींचते हैं] चौरासी लाख योनियों मे विभिन्न पशु-पक्षियो के रूप धारण कर भ्रमते हुए यमराज (काल) की हँसी के पात्र बनते हैं । सांसारिक वाह्याचार समष्टि मृग-तृष्णा के जल के समान [भ्रम-मय तथा धोखा देने वाली] है, किन्तु इसी से ये [मूर्ख हरि विमुख] अपने मन मे तृप्ति पाने का लोभ करते हैं । सूरदास कहते है कि वे सन्तो के साथ मिलकर भगवान् का यशोगान [न जाने] क्यो नही करते ॥४८॥ भजन बिनु कूक़र-सूकर जैसौ । जैसे घर विलाव के मूसा, रहत विषय-वस बैसौ । वन-वगुली अरु गीध-गीधिनी, आइ जनम लियो तैसौ । उनहूँ केँ गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ । जीव मारि के उदर भरत हैं, तिनकौ लेखौ ऐसौ । सूरदास भगवत-भजन विनु, मनौ ऊँट-वृष-भैंसौ ॥४६॥ अर्थ—[भगवान् के] भजन के बिना मनुष्य कुत्ते और सूअर के समान [निकृष्ट और अपवित्र] है। जैसे चूहा विलाव वाले घर मे [खाद्य पदार्थों के लोभ मे पड़कर]