भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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विनय तथा भक्ति ४३ रहता है [और बिलाव का शिकार बनता है] वैसे ही [भजन-विहीन मनुष्य] विषयों के वशीभूत हो [काल का शिकार बन कर] रहता है। बगला-बगली, गृद्ध-गृद्धपत्नी [जैसे अपवित्र प्राणियो] की भाँति ही ऐसे स्त्री-पुरुषों ने [इस पृथ्वी पर] जन्म लिया है। [इनके समान] उनके भी तो घर, पुत्र और पत्नी हैं फिर बतलाइए, उनमे और इनमे क्या अन्तर है ? [जो लोग] जीव-हत्या करके अपना पेट भरते हैं, उनके विषय में इसी प्रकार की बात कही जा सकती है। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य ऊँट, बैल और भैंसे के समान [भार-वाही मात्र] है ॥४९॥ सत्संग-महिमा जा दिन संत पाहुने आवत । तीरथ कोटि सनान करैँ फल जैसौ दरसन पावत । नयौ नेह दिन-दिन प्रति उनकैँ चरन-कमल चित-लावत । मन-बच कर्म और नहिँ जानत, सुमिरत औ सुमिरावत । मिथ्याबाद-उपाधि-रहित ह्वैँ, बिमल-विमल जस गावत । बंधन कर्म जे पहिले, सोऊ काटि बहावत । संगति रहैँ साधु की अनुदिन, भव-दुख दूरि नसावत । सूरदास संगति करि तिनकी, जे हरि-सुरति कहावत ॥५०॥ अर्थ-जिस दिन [किसी सद्गृहस्थ के यहां] सन्त अतिथि [के रूप मे] आते हैं, उस दिन [उसे] करोड़ों तीर्थस्थानों जैसा फल [पुण्य] उनके दर्शन से प्राप्त हो जाता है। उनके चरणो में चित्त लगाने से [भगवान् के प्रति] नित-नूतन प्रेम उत्पन्न होता है। वे मन, वाणी तथा कर्म से और कुछ नहीं जानते, [भगवान् का] स्मरण [स्वयं] करते हैं और [दूसरों से] कराते हैं। झूठे वाद-विवाद और झगड़ों से अलग रहकर वे भगवान् का पवित्रयश का गान करते हैं [जन्म-जन्मान्तर के] कर्मों का जो कठिन बन्धन पहले से चला आ रहा है उसे भी वे समाप्त कर देते है। नित्य प्रति सत्संगति में रहने से जन्म-मरण का कष्ट दूर हो जाता है [तथा समूल] विनष्ट हो जाता है। सूरदास कहते हैं कि उन्ही [सन्तों] का साथ करो जो भगवान् का स्मरण कराते हैं ॥५०॥ स्थितप्रज्ञ हरि-रस तौँ डब जाइ कहुँ लहियै । गएँ सोच आएँ नहिँ आनंद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता सब सौँ, सदा अनँदित रहियै । वाद बिवाद, हर्ष-आतुरता, इतौ द्वैंद जिय सहियै । ऐसी जो आवै या मन मैँ, तौ सुख कहँ लौँ कहियै । अष्ट सिद्धि, नवनिधि, सूरज प्रभु, पहुँचै जो कछु चहियै ॥५१॥