भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

४४ सूरसागर सार सटीक अर्थ— अब तो (संसार तथा उसके सुखों का का मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाने पर) कही जाकर भगवान् के भजन का आनन्द प्राप्त करना चाहिए । ऐसा मार्ग (जीवन- क्रम) ग्रहण करना चाहिए जिसमे [किसी वस्तु के नष्ट हो] जाने (हानि) पर चिन्ता न हो तथा (कोई वस्तु) आने (लाभ) पर आनन्द न हो, सभी के साथ मधुरवाणी तथा दैन्य भाव युक्त व्यवहार के साथ निरन्तर आनन्दपूर्ण जीवन हो [और] वाद-विवाद, हर्ष-व्याकुलता आदि द्वन्द्वो [के उद्वेगो) को मन मे सह लिया जाय । ऐसी भावना यदि मन मे घर कर ले तो उस सुख का वर्णन कहां तक शक्य है ? सूरदास कहते हैं कि [ऐसी स्थिति को पहुँच जाने पर] जो कुछ चाहिये—आठो सिद्धियां, नवो निधियां, आदि—सब कुछ प्राप्त हो जाता है ॥५१॥ जौ लौं मन-कामना न छूटै । तो कहा जोग-जज्ञ-व्रत कीन्हें बिन कन तुस कीँ कूटै । कहा सनान कियैँ तीरथ के, अंग भस्म जट जूटे । कहा पुरान जु पढैँ अठारह, ऊर्ध्व धूम के घूटे । जग शोभा की सफल बड़ाई इनतैँ कछू न खूटै । करनी और, कहैँ कछु औरै, मन दसहूँ दिसि टूटै । काम, क्रोध, मद, लोभ शत्रु हैं, जो इतनति सौँ छूटै । सूरदास तबहीँ तम नासै ज्ञान-अगिनि-झर फूटै ॥५२॥ अर्थ—जब तक मनोकामनाएं क्षीण नही पडती या दूर नही हो जाती तब तक योग साधन, यज्ञ तथा व्रत करने से क्या होता है ? [यह सब उसी प्रकार निरर्थक है जैसे] बिना दाने की भूसी का कूटना । [तब तक] तीर्थों मे स्नान करने, अंग मे भस्म रमाने तथा जटा जूट धारण करने से क्या लाभ ? पुराणो के अध्ययन तथा उल्टा लट- कते हुए नीचे जलती आग काधुआं पीने से क्या लाभ? इन सब से प्राप्त यश सांसारिक दिखावा संसार की समस्त शोभा मात्र है, [इनसे मनोकामनाओ मे] कुछ भी कमी नही आती । [इस प्रकार के जीवन मे] करनी ओर कथनी का भेद दूर नही होता ओर मन दसो दिशाओ मे दौड़ता हुआ [विषयो पर] झपटता रहता है । काम, क्रोध, मद और लोभ [बडे प्रबल] शत्रु हैं, मनुष्य जब इनसे छुटकारा पा लेता है तभी अज्ञानता का अन्धकार नष्ट होता है और ज्ञान रूपी अग्नि की ज्वाला प्रस्फुटित होती है ॥५२॥ आत्मज्ञान अपुनपौ आपुन ही बिसरचौ । जैसेँ स्वान कांच-मंदिर मैँ, भ्रमि-भ्रमि भूकि परचौ । ज्यौँ सौरभ मृग-नाभि वसत है, द्रुम तृन सूँघि फिरचौ । ज्यौँ सपने मैं रंक भूप भयौ, तसकर अरि पकरचौ । ज्यौँ केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपुन कूप परचौ । जैसेँ गज लखि फटिकसिला मैँ, दसननि जाइ अरचौ ।