भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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विनय तथा भक्ति ४५ मर्कट मूठि छांड़ि नहीं दीनी, घर-घर-द्वार फिरयौ । सूरदास नलिनी को सुवटा, कहि कौनैं पकरयौ ॥५३॥ अर्थ—[हमारा आनन्दमय] आत्म-स्वरूप स्वयं हमारे द्वारा भुला दिया गया है जैसे शीश महल का कुत्ता शीशे मे [अपनी ही परछांइयां देख] भ्रमित हो होकर बार- बार भूक पड़ता है (भूकि पर्यो) या भूंकता हुआ मरता है (भूमि पर्यो), अर्थात् परेशान होता है । जैसे कस्तूरी (सौरभ) मृग की नाभि में रहती है किन्तु वह [बाहर] पौधों और घासो को सूंघता [हुआ उसे ढूंढता] फिरता है । जैसे स्वप्न मे राजा अपने को दरिद्र हुआ, अथवा डाकू या शत्रु द्वारा वन्दी बनाया गया मानता है । [और दुःखी होता है] । जैसे सिंह [कुएं में] अपना प्रतिबिम्ब देखकर [मूर्खता-वश उसमे] कूद पड़ा । जैसे हाथी बिल्लोर पत्थर (स्फटिक शिला) मे [अपना प्रतिबिम्ब देख] जाकर [उससे] दांतो से भिड़ गया । [जैसे] बन्दर ने [सँकरे मुंह वाले बर्तन में चनों से भर कर लोभ- वश] अपनी मुट्ठी नही छोड़ी और [इस प्रकार फँसकर] घर-घर के दरवाजे पर फिरता रहा । सूरदास कहते हैं कि नलिका पर बैठे हुए शुक को भला किसने पकड़ रखा है । (अपने बैठने के भार से नलिका के झुक जाने से सिर नीचा पैर ऊपर हो जाने पर भ्रम वह शुक स्वयं को को आबद्ध समझकर बहेलिये के आने पर उड़ नही जाता, और पकड़ा जाता है) ॥५३॥ अपनपौ आपुन ही मै पायौ । सब्दहि सब्द भयौ उजियारी, सतगुरु भेद बतायौ । ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायौ । फिरि चितयौ जब चेतन ह्वै करि, अपनैं ही तन छायौ । राज-कुमारि कंठ-मनि-भूषन भ्रम भयौ कहूँ गँवायौ । दियौ बताइ और सखियनि तब, तनु कौ ताप नसायौ । अपने माहिं नारि कौं भ्रम भयौ बालक कहूँ हिरायौ । जागि लख्यौ, ज्यौं कौ त्यौं ही है ना कहूँ गयौ न आयौ । सूरदास समुझे को यह गति, मनहीं मन मुसुकायौ । कहि न जाइ या सुख की महिमा, ज्यौं गूँगैं गुर खायौ ॥५४॥ अर्थ—[अपना विस्मृत] आत्म-स्वरूप अपने [शरीर के] भीतर ही [फिर] उप- लब्ध हुआ । जब सद्गुरु ने मर्म बताया तो [उनके] शब्द (उपदेश नामोपदेश) से अनाहत नाद प्रकट हुआ, जो अन्तर्ज्योति (आत्म-प्रकाश) मे परिवर्तित हो गया । जैसे मृग की नाभि मे ही कस्तूरी होती है किन्तु वह [उसके बाहर होने के] भ्रम मे पड़कर [उसे चारों तरफ] ढूंढता फिरता है, किन्तु जब पुनः चेत कर विचार करता है तो [जान जाता है कि वह] अपने ही शरीर मे छिपी हुई (आच्छादित) है । राजकुमारी के कण्ठ में ही मणि-जटित आभूषण वर्तमान था किन्तु उसे भ्रम हुआ कि कही खो गया, परन्तु जब