भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला कृष्ण जन्म आनंदै आनंद बढ़यो अति । देवनि दिवि दुंदभी बजाई, सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति । विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिलि कंठ अमित गति । गावत गुन गंधर्व पुलकि तन नाचतिँ सब सुर-नारि रसिक अति । बरषत सुमन सुदेस सूर सुर, जय-जयकार करत, मानत रति । सिव-विरंचि-इन्द्रादि अमर मुनि, फूले सुख न समात मुदित मति ॥१॥ अर्थ – मथुरा मे यदुपति श्री कृष्ण का प्रकट होना सुनकर देवताओं ने स्वर्ग में दुन्दुभिनाव किया ओर (चारो ओर) अत्यधिक आनन्द ही आनन्द बढ गया । विद्याधर तथा किन्नर लोग विनोदपूर्ण मन से (कलोलमन) परस्पर मिलकर (समवेत रूप में) स्व- कंठों मे (संगीत की) अमित गति (स्वर लहरियाँ) उत्पन्न करते हैं । गन्धर्व पुलकित होकर (भगवान् का) गुणगान करते हैं तथा अत्यधिक रसिक सभी देवांगनाये नृत्य कर रही हैं। सूरदास जी कहते हैं कि देवता पुष्पवृष्टि करते हैं, (भगवान् कृष्ण की) जय- जयकार करते है तथा (उनके प्रति) प्रेम-भाव प्रदर्शित करते हैं । शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि देवता तथा ऋषि प्रसन्नमन होकर सुख से फूले नही समाते ॥१॥ देवकी मन मन चकित भई । देखहु आइ पुत्र-मुख काहे न, ऐसी कहुँ देखी न दई । सिर पर मुकुट, पीत उपरैना, भृगु-पद-उर भुज चारि धरे । पूरब कथा सुनाइ कही हरि, तुम माँग्यौ इहिँ भेष करे । छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरचौ । तुरत मोहिँ गोकुल पहुँचावहु, यह कहिके सिसु वेष धरचौ । तब बसुदेव उठे यह सुनतहिँ, हरषवंत नंद-भवन गए । बालक धरि, लै सुरदेवी कौँ, आइ सूर मधुपुरी ठए ॥२॥ अर्थ-देवकी मन ही मन चकित हो गयी । (उन्होने वसुदेव से कहा कि) आकर पुत्र का मुंह क्यों नही देखते, हे भगवान् ! ऐसा (विचित्र रूप) मैने कही नही देखा । (इनके) शिर पर मुकुट (सुशोभित) है तया इन्हो पीला उत्तरीय, हृदय पर भृगु के पद (चिह्न) तथा चार भुजाये धारण की है। भगवान् ने पूर्व कथा सुनाकर कहा कि "तुमने