भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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४६ सूरसागर सार सटीक मुझे इसी वेष में मांगा था । (मैंने तुम्हारे) बन्धनों (बेड़ियो) को तोड़ दिया । पहरेदारों को सुला दिया तथा (कारावास के) किवाड़ों को खोल दिया है । तुरन्त मुझे गोकुल पहुँचा दो" ऐसा कहकर भगवान् ने शिशु रूप धारण कर लिया । यह सुनते ही वासुदेव हर्षित होकर उठे और नन्द के घर गये । सूरदास कहते हैं कि बालक (श्री कृष्ण) को (वहां रखकर सुरदेवी (नन्द कन्या) को लेकर मथुरा आ गये ॥२॥ गोकुल प्रगट भए हरि आइ । अमर-उधारन, असुर-सँहारन अंतरजामी त्रिभुवन राइ । माथैँ धरि बसुदेव जुं ल्याए, नद-महर-घर गए पहुँचाई । जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, पुलकि अंग उर मैं न समाइ । गदगद कंठ, बोल नहिं आवै, हरषवंत ह्वै नंद बुलाई । आवहु कंत, देव परसन भये, पुत्र भयौ, मुख देखौ धाइ । दौरि नद गए, सुत-मुख देख्यौ, सो सुख मोपे बरनि न जाई । सूरदास पहिलैँ ही माँग्यौ, दूध पियावन जसुमति माइ ॥३॥ अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण गोकुल मे आकर प्रकट हुये । देवताओ का उद्धार करने वाले, असुरो का संहार करने वाले, अतर्यामी तथा त्रिभुवन पति (श्री कृष्ण) को वसुदेव मस्तक (सिर) पर रखकर लाये और बाबा नन्द के घर पहुँचा दिया । महरि (नन्दरानी) जागी, पुत्र का मुंह देखा शरीर पुलकित हो उठा और प्रसन्नता उनके हृदय मे नही समाती थी । (प्रसन्नता से) कण्ठ गदगद हो गया था, (मुंह से) शब्द नही निकल रहे थे हर्षित होकर उन्होने नन्द को बुलाया । पतिदेव आइये, देवता प्रसन्न हुए, पुत्र हुआ, दौड़कर आइए और उसका मुंह देखिये । नन्द दौड़कर गये और पुत्र का मुंह देखा, उस सुख का वर्णन मुझसे वर्णित नही किया जाता । सूरदासजी कहते है कि (कृष्ण भगवान् को पुत्र के रूप मे) यशोदा ने पहले ही मांग लिया था, अब वे उन्हे दूध पिला रही हैं ॥३॥ हौं इक नई बात सुनि आई । महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर-घर होति बधाई । द्वारैँ भीर गोपि-गोपिनि की, महिमा बरनि न जाई । अति आनन्द होत गोकुल मैं, रतन भूमि सब छाई । नाचत वृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस-कीच मचाई । सूरदास स्वामी सुख-सागर, सुन्दर स्याम कन्हाई ॥४॥ अर्थ - (हे सखि) मैं एक नई बात सुन आयी हूँ । माँ यशोदा ने पुत्र जन्म दिया है तथा हर घर मे बधाइयाँ हो रही हैं । द्वार पर उपस्थित ग्वालो और गोपियो की भीड़ की महिमा का वर्णन नही किया जा सकता । गोकुल मे अत्यधिक आनन्द उत्पन्न हो रहा है तथा भूमि अब रत्नो से ढँक गई है । वृद्ध, तरुण और बालक नृत्य कर रहे हैं तथा गोरस (दूध, दही आदि) से (गोकुल मे) कीचड़ उत्पन्न कर दी है ।