सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति ३३ अर्थ-यद॒राज श्रीकृष्ण ही इसलिए सेव्य हैं, क्योंकि उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति से अपकर्ष तथा दुःख की स्थिति को प्राप्त होना और अपकर्ष तथा दुःख से उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति को प्राप्त होते रहना शरीर धारियों का स्वभाव है । [जैसे हम देखते हैं कि] वृक्ष काल पाकर [समयानुसार] फूलता है, फलता है, (उसके) पत्ते झड़ते हैं । जलाशय पानी से भरता है, भर जाने पर उमड़ता है फिर सूख जाता है और उसमें धूल उड़ने लगती है । द्वितीया का चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्ण चन्द्र बन जाता है और [फिर] घटते-घटते समाप्त हो जाता है । [इसलिए] सूरदास कहते हैं कि उन्नति, अवनति, सुख-दुःख पर किसी को विश्वास नहीं करना चाहिए, तात्पर्य यह है कि परिवर्तन-शील संसार की सभी स्थितियाँ अस्थायी, विनश्वर हैं; अविनाश्वर स्थायी तत्व तो एकमात्र भगवान् हैं, अतएव उनकी प्राप्ति ही हमारा ध्येय होना चाहिए ॥३१॥ वैराग्य किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए । तेल लगाइ कियौ रुचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए । तिलक बनाइ चले स्वामी व्है, विषयिनि के मुख जोए । काल बली तैं सब जग काँप्यौ, ब्रह्मादिक हूँ रोए । सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए ॥३२॥ अर्थ-मैंने अनगिनत दिन भगवान् को स्मरण किये बिना खो दिये । दूसरों की निन्दा को ही जिह्वा का स्वाद मानकर कितने ही जन्मो को व्यर्थ में गँवा दिया । तेल लगाकर शौक से मालिश किया और वस्त्रो को रगड़-रगड़ कर धोया किया [किन्तु] मन को स्वच्छ (पवित्र) नहीं किया । तिलक लगाकर स्वामी की तरह चलता रहा तथा विषयी व्यक्तियों का मुखापेक्षी बना रहा । बलशाली काल [के भय] से तो सारा संसार कांपता है । [उसकी भयंकरता देखकर] ब्रह्मा आदि को रोना पड़ता है, तो फिर उसके आगे अधम सूर का क्या बस, जो पेट भरने पर पड़कर सो जाना भर जानता है ॥३२॥ नर तैं जनम पाइ कह कीनौ ? उदर भरचौ कूकुर लौं, प्रभु कौ नाम न लीनौ । श्री भागवत सुनी नहिं श्रवननि, गुरु गोबिंद नहिं चीनौ । भाव-भक्ति कछु हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ । झूठो सुख अपनौ करि जान्यो, परस प्रिया कैं भीनौ । अघ कौ मेरु बढ़ाइ अधम तू, अत भयौ बलहीनौ । लख चौरासी जोनि भरमि कै, फिर वाहीँ मन दीनौ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, ज्यौँ अंजलि-जल छीनौ ॥३३॥ ३