भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३२ सूरसागर सार सटीक भावी काहूँ सौं न टरै । कहँ वह राहु, कहाँ वै रवि ससि, आनि संजोग परै । मुनि बसिस्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै । तात-मरन, सिय हरन, राम वन-वपु धरि विपति भरै । रावन जीति कोटि तैंतीसौ, त्रिभुवन राज करै । मृत्युहिँ बाँधि कूप मैं राखै, भावी-बस सो मरै । अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बन निकरै । द्रुपद-सुता कौ राजसभा, दुस्सासन चीर हरै । हरीचंद सो को जगदाता. सो घर नीच भरै । जौ गृह छाँड़ि देस बहु धावै, तऊ वह सग फिरै । भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै । सूरदास प्रभु रची सु ह्वै है, को करि सोच मरै ॥३०॥ अर्थ—भावी किसी से नही टाली जा सकती । कहाँ वह राहु है तथा कहाँ वे सूर्य तथा चन्द्रमा (किन्तु सूर्य-ग्रहण तथा चन्द्र-ग्रहण के रूप मे) उनका संयोग आ ही पड़ता है । वशिष्ठ मुनि अत्यन्त ज्ञानी पंडित थे और उन्होंने खूब सोच समझ कर [राम जानकी के विवाह का] लग्न निर्धारित किया, किन्तु पिता (दशरथ) की मृत्यु हुई तथा सीता-हरण आदि के रूप मे राम को वन मे वनवासी वेश धारण करके कष्ट उठाना पडा । रावण तैतीस करोड़ [देवताओ] को जीत कर तीनो लोको पर राज्य करता था । [और उसने] मृत्यु को बन्दी बना कर कुँए में [डाल] रखा था; किन्तु भावी-वश उसे [मनुष्य के हाथो] मरना पड़ा । भगवान् [स्वयं] अर्जुन के सारथि थे किन्तु (पांडवो को) वनवास करना पडा, और द्रौपदी का [उनकी पत्नी] दुश्शासन ने [भरी] राजसभा मे चीर-हरण किया । हरिश्चन्द्र के समान ससार में कौन दानी होगा किन्तु उन्हे भी नीच के घर भृत्य बनना पड़ा । यद्यपि मनुष्य घर छोड़कर अनेक देशो मे दौड़ता है [भ्रमण करता है] तथापि भावी उसके साथ-साथ ही जाती है । भावी के वश मे तीनो लोक [के प्राणी] हैं, चाहे देव-योनि-धारी हो या नर-योनि-धारी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने जैसी व्यवस्था कर रखी है वैसा ही होगा [इसलिये भवितव्य के विषय मे] चिन्ता करके कौन मरे ? ॥३०॥ तातैँ सेइयै श्री जदुआइ । संपति बिपति, बिपति तैं संपत्ति, देह कौ यहै सुभाइ । तरुवर फूले, फरै, पतझरै, अपने कालहिँ पाइ । सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै, सूखै खेह उड़ाइ । दुतिया चंद बढ़त ही बाढै, घटत-घटत घटि जाइ । सूरदास संपदा-आपदा, जिनि कोऊ पतिआई ॥३१॥