सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० सूरसागर सार सटीक शैशव चरित्र जसोदा हरि पालनै झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछू गावै । मेरे लाल कौं आउ निँदरिया, काहैं न आनि सुवावै । तू काहैं नहिं वेगहिं आवै, तोकों कान्ह बुलावै । कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै रहि, करि करि सैन बतावै । इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै । जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनि पावै ॥७॥ अर्थ — यशोदा भगवान् (कृष्ण) को पालने मे झुला रही हैं। वे उन्हे हिलाती हैं, दुलराती हुई मल्हारती हैं तथा जैसा-तैसा कुछ गाती हैं, यशोदा गाती हुई कहती हैं कि नीद मेरे लाल के पास आओ, क्यो नही (यहाँ) आकर (इन्हे) सुलाती है। तू जल्दी क्यो नही आती, तुझे कृष्ण बुला रहे हैं। कभी भगवान् (कृष्ण) पलके बन्द कर लेते है, कभी होठ फडफड़ाने लगते हैं। उन्हे सोता हुआ समझकर (मां यशोदा) मौन होकर इशारे से बताती है। इसी बीच भगवान् व्याकुल हो उठे और यशोदा जी पुनः मधुर गीत गाने लगती है। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियो को भी दुर्लभ है उसे नन्द-पत्नी (यशोदा) प्राप्त कर रही है ॥७॥ कपट करि ब्रजहिँ पूतना आई । अति सुरूप, विष अस्तन लाए, राजा कस पठाई । मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कठ लगाई । भाग बड़े तुम्हरे नन्दरानी, जिहिँ के कुँवर कन्हाई । कर गहि छीर पियावति अपनी, जानत केसवराई । बाहर ह्वैं कै असुर पुकारी, अब बलि लेहु छुड़ाई । गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई । सूरदास प्रभु तुम्हरी लीला, भक्तनि गाइ सुनाई ॥८॥ अर्थ—पूतना कपट रूप धारण करके ब्रज मे आयी। राजा कंस द्वारा भेजी गयी वह बहुत रूपवती तथा विषाक्त स्तनों युक्त होकर आयी थी। वह भगवान् कृष्ण के मुख का चुम्बन लेती, उनके नेत्रों को देखती और उन्हें गले से लगा लेती। (कृष्ण के प्रति इस प्रकार झूठा प्रेम दिखाकर वह बोली नन्दरानी तुम्हारे भाग्य प्रबल है — जिसके कृष्ण जैसा कुमार है। वह उन्हे अपने हाथ मे लेकर अपना दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे) । बाहर होकर राक्षसी ने पुकारा कि हे बलि (दैत्यराज) अब मुझे छुड़ा लो। अथवा (हे कृष्ण मैं तुम्हारी बलिहारी हूँ मुझे छोड़ दो) वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी मानो उसे सांप ने काट लिया हो। सूरदास जी कहते हैं हे भगवान् आपकी लीला को भक्तो ने गाकर सुनाया ॥८॥