सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ५१ काग-रूप इक दनुज धर्यौ । नृप-आयसु लै धरि माथे पर, हरषवंत उर गरव भर्यौ । कितिक बात प्रभु तुम आयसु तें, वह जानी मो जात मर्यौ । इतनी कहि गोकुल उड़ आयौ, आइ नन्द-घर-छाज रह्यौ । पलना पर पौढै हरि देखे, तुरत आइ नैननिहिं अर्यौ । कंठ चाँपि बहु वार फिरायो, गहि पटक्यो, नृप पास पर्यौ । तुरत कंस पूछन तिहिं लाग्यो, क्यो आयौ नहिं काज कर्यौ । वातैं जाम बोलि तब आयौ, सुनहु कंस, तब आइ सर्यौ । धरि अवतार महाबल कोऊ, एकहिं कर मेरौ गर्व हर्यौ । सूरदास प्रभु कंस-निकंदन, भक्त-हेत अवतार धर्यौ ॥६॥ अर्थ-एक दैत्य ने कौवे का रूप धारण किया । राजा कंस की आज्ञा शिरो- धार्य कर, गर्वयुक्त तथा हर्षित होकर वह कंस से बोला- यह कौन-सी (बड़ी) बात है। आपकी आज्ञा से मेरे वहाँ जाते ही आप उसे (कृष्ण को) मरा हुआ ही समझें । इतना कहकर वह गोकुल मे उड़ आया और आकर नन्द के घर पर बैठ गया । पालने पर श्री कृष्ण को लेटा हुआ देखकर तुरन्त आकर वह उनकी आंखो पर अड़ गया । (कृष्ण ने उसका) गला पकड़ कर कई बार घुमाया और पकड़ कर पटक दिया तथा वह राजा कंस के पास जा गिरा । कंस तुरन्त उससे पूछने लगा, 'क्यों चले आये क्या कार्य नही किया !' पहर भर बीतने पर वह बोल पाया 'कंस सुनो, (तुम्हारी) आयु पूरी हो गयी । किसी महाबली ने अवतार ले कर एक ही हाथ से मेरे गर्व का हरण कर लिया । सूरदास जी कहते है कंस को समाप्त करने वाले भगवान् ने भक्तो (की रक्षा) के लिए अवतार धारण किया ॥६॥ कर पग गहि, अंगुठा मुख मेलत । प्रभु पौढे पालनैं अकेले, हरषि-हरषि अपनैं रङ्ग खेलत । सिव सोचत, विधि बुद्धि विचारत, वट बाढ्यौ सागर-जल झेलत । बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग दतीनि सकेलत । मुनि मन भीत भए, भुब कंपित सेष सकुचि सहसौ फन पेलत । उन व्रज-वासिनि बात न जानी, समुझे सूर सकट पग ठेलत ॥१०॥ अर्थ - (भगवान् श्री कृष्ण) हाथ से पकड़ कर पैर का अँगूठा मुख मे डालते हैं। भगवान् पलने में अकेले लेटे हुये हर्षित होकर अपनी ही धुन मे खेलते है । (उनकी इस शोभा को देख कर) शिव जी कहते है तथा ब्रह्मा बुद्धिपूर्वक विचार करने लगे । (प्रलय काल सन्निकट होने के कारण) वट वृक्ष बडा हो गया । (बढते हुए) सागर के जल (मे डूबने के कष्ट) को झेल रहा है। (यह परिस्थिति देखकर) बादल प्रलय काल (सन्निकट) जानकर तितर-बितर होने लगे और दिग्पाल दिग्गजों को इकट्ठा करने लगे ! मुनि लोग मन मे भयभीत हुये, धरती कांप उठी और शेषनाग संकुचित होकर