भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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५२ सूरसागर सार सटीक अपने सहस्र फनो को (पृथ्वी का भार सहने के लिए) लगा देते हैं। सूरदास कहते हैं कि (इतना होने पर भी) वे ब्रजनिवासी बात नहीं समझ सके। उन्होंने मात्र यही जाना कि भगवान् पैर से छकड़ा ठेल रहे हैं ॥१०॥ महरि मुदित उलटाइ कै मुख चूमन लागी । चिरजीवौ मेरौ लाडिलौ, मैं भई सभागी । एक पाख त्रय-मास कौ मेरौ भयौ कन्हाई । पटकि रान उलटौ पऱ्यौ, मैं करैं बधाई । नन्द-घरनि आनन्द भरी, बोलीं ब्रजनारी । यह-सुख सुनि आईं सबै, सूरज बलिहारी ॥११॥ अर्थ - यशोदा (महरि) प्रसन्न होकर (कृष्ण को ऊपर) उलट कर उनका मुख चूमने लगी (और कहा कि) मेरे प्रिय तुम चिरंजीव हो मैं भाग्यवती हुई। मेरे कृष्ण साढ़े तीन मास के हुये। ये अब जांघ पटक कर उलट पड़ते हैं। मैं बधाई देती हूँ। नन्द की पत्नी (यशोदा) ने आनन्दित होकर यह बात व्रजांगनाओ से भी बता दी यह सुखमय समाचार सुनकर सभी (उन्हे देखने) आयी। सूरदास (भी उनकी इस शोभा पर) बलिहारी हैं ॥११॥ जसुमति मन अभिलाप करै । कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै । कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख वचन झरै । कब नदहि बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै । कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौँ झगरै । कब धौँ तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै । कब हँसि बात कहैगो मोसौँ, जा छबि तैं दुख दूरि हरै । स्याम अकेले आँगन छोड़ि, आपु गई कछु काज घरै । इहिँ अंतर अँधवाह उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै । सूरदास-ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै ॥१२॥ अर्थ - यशोदा जी अपने मन मे (अनेक) अभिलापाये करती हैं। कब मेरे लाल घुटनो के बल चलेगे, कब पृथ्वी पर दो-एक कदम रखेगे। कब (मैं) दूध के दो दांत देखूंगी, कब इनके मुख से तोतले स्वर निकलेगे। कब नन्द को बाबा कह कर पुका- रेगे, कब मां कहकर मुझे बार-बार रटेगे। मोहन कब मेरा आंचल पकड़ कर इधर- उधर कुछ कह कर मुझसे हठ करेगे। कब तक [ये थोड़ा-थोड़ा कुछ खाने लगेगे ओर अपने हाथ से (अपना) मुख भरेगे] अपने आप खाने लगेगे। कब कृष्ण हँस कर मुझसे बात करेगे जिसकी शोभा से मेरे दुःख दूर हो जायेगे। श्याम को अकेले आंगन मे छोड कर कुछ कार्यवश वे घर मे गयी। इसी बीच एक अन्धड़ गर्जन करता हुआ तथा