सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ५३ आकाश सहित गहराता हुआ उठा । सूरदास कहते हैं कि ब्रज के लोग उस ध्वनि को सुनकर यथास्थिति अत्यन्त भयभीत हुये ॥१२॥ सुत मुख देखि जसोदा फूली । हरषति देखि दूध की दँतियाँ, प्रेममगन तन की सुधि भूली । बाहिर तैं तब नंद बुलाए, देखौ धौं सुन्दर सुखदाई । तनक-तनक सी दूध दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करौ आई । आनंद सहित महर तब आए, मुख चितवत दोउ नैन अघाई । सूर स्याम किलकत द्विज देख्यौ, मनौ कमल पर बिज्जु जमाई ॥१३॥ अर्थ—पुत्र के मुँह को देखकर यशोदा (हर्ष से) प्रफुल्लित हो उठी । कृष्ण के दूध के दांत देखकर, हर्षित हो (श्री कृष्ण के) प्रेम मे निमग्न होकर शरीर की सुध- बुध भूल गयी । उन्होने तब बाहर से नन्द को बुलाया और कहा कि सुन्दर सुखदायक (श्री कृष्ण) को देखो । छोटे-छोटे से दूध के दांतो को देखिये और अपने नेत्रो को सफल कीजिये । तब प्रसन्न होकर नन्द आये तथा (पुत्र के) मुख को देखकर उनके नेत्र तृप्त हो गए । सूरदास कहते है कि यदुराज नन्द ने किलकारी मारते हुए कृष्ण को देखा तो ऐसा लगा कि जैसे कमल पर बिजली उग आयी हो ॥१३॥ हरि किलकत जसुमति की कनियाँ । मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नंद-रनियाँ । घर-घर हाथ दिखावति डोलति, बाँधति गरैँ बघनियाँ । सूर स्याम की अद्भुत लीला नहिँ जानत मुनिजनियाँ ॥१४॥ अर्थ—भगवान् कृष्ण यशोदा की गोद में किलक रहे हैं । उन्होने (अपने मुंह) में तीनों लोको को दिखाया जिससे नन्दरानी (अत्यन्त) चकित हो गईं । वे घर-घर जा कर हाथ दिखाती डोलती है और गले मे (कृष्ण के) (बघनख ताबीज) बांधती है । सूरदास कहते हैं कि श्याम की अद्भुत लीला का ज्ञान मुनिजनों को भी नही है ॥१४॥ कान्ह कुँवर की करहु पासनी, कछु दिन घटि षट मास गए । नंद महर यह सुनि पुलकित जिय, हरि अनप्रासन जोग भए । विप्र बुलाई नाम लै बूझ्यौ, रासि सोधि एक सुदिन धरयौ । आछौ दिन सुनि महरि जसोदा, सखिनि बोलि सुभ गान करयौ । जुवति महरि कौँ गारी गावति, और महर कौ नाम लिए । ब्रज-घर-घर आनंद बढ़यौ अति, प्रेम पुलक न समात हिए । जाकौँ नेति-नेति स्रुति गावत, ध्यावत सुर मुनि ध्यान धरे । सूरदास तिहिँ कौँ ब्रज-वनिता, झकझोरतिँ उर अंक भरे ॥१५॥