भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

५४ सूरसागर सार सटीक अर्थ- (यशोदा ने नन्द से कहा) कुमार कृष्ण का अन्नप्राशन संस्कार कीजिये क्योकि छः मास बीतने मे कुछ ही दिन शेष हैं । यह सुनकर कि कृष्ण अन्नप्राशन के योग्य हो गये, बाबा नन्द अपने मन मे बहुत प्रसन्न हुये । उन्होने ब्राह्मण को बुलाकर कृष्ण का नाम और राशि शोध करके शुभ दिन का निश्चय किया । इस शुभ दिन को सुनकर मां यशोदा ने सखियो को बुलाकर सुन्दर गान सुनाया । युवतियाँ बाबा नन्द और यशोदा का नाम ले कर गाली (गीत) गा रही हैं । ब्रज के प्रत्येक घर मे आनन्द की अत्यन्त वृद्धि हुई । प्रेम से उत्पन्न प्रसन्नता हृदय मे नही समाती । [सूरदास कहते है कि] श्रुतियां जिसका गुणगान 'नेति-नेति' कहकर गाती है, देव और ऋषि जिसका ध्यान धारण करते हैं उसी (ब्रह्म) को ब्रज वनिताये गोद में लेकर हृदय से लगाकर झकझोर रही हैं ॥१५॥ लाल हौँ बारी तेरे मुख पर । कुटिल अलक, मोहनि-मन बिहँसनि भृकुटी बिकट ललित नैननि पर । दमकति दून-दँतुलिया बिहँसत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर । लघु-लघु लट सिर घुघरवारी, लटकन लटकि रह्यो माथैँ पर । यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौँ सकुचति हौँ जिय पर । नव-तन-चंद्र रेख-मधि राजत, सुरगुरु-सुक्र-उदोत परसपर । लोचन लोल कपोल ललित अति, नासा कौ मुकता रदछद पर । सूर कहा न्यौछावर करिये अपने लाल ललित लरखर पर ॥१६॥ अर्थ-हे लाल मैं तुम्हारे मुख (की शोभा) पर निछावर हूँ । घुंघराली लटे, नेत्रो पर टेढी भौंहे और मुस्कान मन को मोहित करने वाली हैं । हँसते समय दूध के दांत इस प्रकार चमकते है मानो कमल पर मोती ने स्थान बना लिया हो । सिर पर की छोटी-छोटी घुंघराली लटे माथे पर लटक रही है । इस उपमा को कौन कह सकता है । कुछ कहने पर कवि के मन मे संकोच होता है । (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा के बीच वृहस्पति और शुक्र की पारस्परिक आभा का प्रकाश (सुशोभित) हो । (कृष्ण के) नेत्र चंचल है, कपोल सुन्दर हैं तथा नाक का मोती होठो पर (झलक रहा) है । सूरदास कहते हैं कि अपने लाल (कृष्ण) की लड़- खडाहट (डगमगा कर गिरने की क्रिया) पर क्या न्योछावर करुँ ॥१६॥ उमगीँ ब्रजनारि सुभग, कान्ह बरष गाँठि उमंग, चहतिँ बरष बरषनि । गावहिँ मगल सुगान, नीके सुर नीके तान, आनँद अति हरषनि । कंचन मनि-जटित-थार, रोचन, दधि, फूल-डार, मिलिबे कौ तरसनि । प्रभु बरष-गाँठि जोरति, वा छवि पर तृन तोरति, सूर अरस परसनि ॥१७॥ अर्थ कृष्ण की वर्ष गांठ पर सौभाग्य वाली ब्रज की गोपियां उल्लसित होकर अपने उल्लास की वरषा करना चाहती है । वे मगलमय सुन्दर गीत अत्यन्त आनदित होकर सुरीले स्वरो मे गा रही है । वे (गोपियाँ) सोने के मणि जटित थाल मे दधि,