भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ५५ रोली, फूल रख कर कृष्ण से मिलने (कृष्ण को तिलक करने) के लिए आतुर है। सूर कहते है कि प्रभु (कृष्ण) की वर्ष गांठ जोड़ी जा रही है (लम्बाई नापने वाले धागे मे गांठ लगाई जा रही है)। सब मिल भेट कर कृष्ण की सुन्दरता पर तृन तोड़ रहे है। (नजर लगने से बचा रहे हैं) ॥१७॥ सोभित कर नवनीत लिये । घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये । चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिये । लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए । कठुला-कंठ, बज्र केहरि-नख, राजत रुचिर हिए । धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए ॥१८॥ अर्थ - (भगवान् कृष्ण) हाथ मे माखन लिये हुये सुशोभित हो रहे हैं। धूल धूसरित शरीर तथा मुख मे दधि लपेट कर वे घुटनो के बल चल रहे हैं। उनके कपोल सुन्दर हैं, नेत्र चंचल हैं तथा वे गोरोचन का तिलक दिये हैं। उनके लटो की लटकन ऐसी प्रतीत होती है मानो उन्मत्त भ्रमरो का समूह, मादक मधु का पान कर (के झूम) रहा हो । उनके कण्ठ मे कठुला और हृदय पर सिंह का वज्र नाखून (अथवा सिंह नख और मणि) सुशोभित हो रहा है (रहे हो)। सूरदास कहते है कि इस सुख मे एक पल का जीवन भी धन्य है। सैकड़ों कल्प (जीवन) जीने से क्या लाभ ? ॥१८॥ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबौ, धावत । कबहु निरखि हरी आपु छाँह कौं, कर सौं पकरन चाहत । किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत । कनक-भूमि पर कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति । करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति । बाल-दसा-मुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावत । अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥१९॥ अर्थ - कृष्ण किलकारी करते हुये घुटनो के बल आ रहे हैं। नन्द के मणियुक्त स्वर्णिम आँगन मे वे परछाई पकड़ने के लिये दौड रहे हैं। कभी कृष्ण अपनी छाया को देखकर उसे हाथ से पकडना चाहते है। किलक कर हँसने से उनके दूध के दो दाँत सुशोभित होते है कृष्ण उस (स्थिति) को बार-बार देखते हैं। (आँगन की) स्वर्ण-भूमि पर उनके हाथ और चरणो की छाया देखकर यही उपमा सुशोभित होती है मानो पृथ्वी प्रत्येक चरण एवं हाथ को प्रतिमा बना कर उनके लिए कमलासन सजा रही है। (कृष्ण के हाथ तथा चरण प्रतिमा हैं उनकी परछायी कमलासन है) । (कृष्ण के इस)