सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ सूरसागर सार सटीक बाल्यावस्था के सुख को देखकर यशोदा वार-वार नन्द को बुलाती हैं। यशोदा 'सूर' के स्वामी को आंचल से ढक कर दूध पिलाती है ।।११९॥ सिखवति चलन जसोदा मैया । अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया । कबहुँक सुंदर वदन विलोकति, उर आनंद भरि लेत बलैया । कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर कन्हैया । कबहुँक बल कौं टेरि बुलावति, इहिँ आँगन खेलौ दोउ भैया । सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप विलसत नँदरैया ॥१२०॥ अर्थ- मां यशोदा (श्री कृष्ण को) चलना सिखाती हैं। कृष्ण लडखड़ाते है तो (अपना) हाथ उनके हाथ में पकड़ा देती हैं; वे डगमगा कर पृथ्वी पर पैर रखते हैं। (मां यशोदा) कभी उनके सुन्दर मुख को देखती हैं और अत्यन्त प्रसन्न हृदय से उनकी बलैया लेती हैं। कभी अपने कुल के देवताओं की मनौती मानती है कि मेरे कुमार कृष्ण चिरजीव हो। कभी बलराम को जोर से पुकारती हैं (और कहती हैं) कि इसी आंगन मे दोनों भाई खेलो। सूरदास कहते हैं कि स्वामी की लीला के प्रताप से राजा नन्द उल्लसित हो रहे हैं ॥१२०॥ चलत देखि जसुमति सुख पावै । ठुमकि-ठुमकि पग धरनी रेंगत, जननी देखि दिखावै । देहरि लौं चलि जात, बहुरि फिरि-फिरि इतहीं कौं आवै । गिरि-गिरि परत, बनत नहिं नाँघत सुर-मुनि सोच करावै । कोटि ब्रह्मांड करत छिन भीतर, हरत विलंब न लावै । ताकौं लिए नंद की रानी, नाना खेल खिलावै । तब जसुमति कर टेकि स्याम कौ, क्रम-क्रम करि उतरावै । सूरदास प्रभु देखि-देखि, सुर-नर-मुनि-बुद्धि भुलावै ॥१२१॥ अर्थ- कृष्ण को चलता हुआ देख कर मां (अत्यन्त) सुख प्राप्त करती हैं। वे ठुमुक-ठुमुक कर पृथ्वी पर चलते है और मां को देखकर (अपना चलना) दिखाते हैं। वे घर की देहली तक चले जाते हैं और फिर यही वापस आ जाते हैं। वे बार-बार गिर पडते हैं। उनसे देहली लांघते नही बनता इसलिये देवताओ और मुनियो के हृदय मे सोच उत्पन्न करवा देते है (कि भगवान् इतने अशक्त हैं कि देहली नही लांघ सकते फिर असुरों का विनाश किस प्रकार करेंगे ?) जो भगवान् करोडो ब्रह्माण्डो का निर्माण एक क्षण के भीतर करता है तथा उसका हरण करने मे भी देर नही करता उसको नन्दरानी गोद मे लेकर अनेक प्रकार के खेल खिलाती हैं। तब यशोदा श्याम का हाथ पकड़ कर क्रम से एक-एक सीढ़ी उतारती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को (इस रूप मे) देख-देख कर देवता, मनुष्य और ऋषि गण अपना विवेक भूल जाते हैं ॥१२१॥