सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
५० सूरसागर सार सटीक शैशव चरित्र जसोदा हरि पालनै झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछू गावै । मेरे लाल कौं आउ निँदरिया, काहैं न आनि सुवावै । तू काहैं नहिं वेगहिं आवै, तोकों कान्ह बुलावै । कबहुँक पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै रहि, करि करि सैन बतावै । इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै । जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनि पावै ॥७॥ अर्थ — यशोदा भगवान् (कृष्ण) को पालने मे झुला रही हैं। वे उन्हे हिलाती हैं, दुलराती हुई मल्हारती हैं तथा जैसा-तैसा कुछ गाती हैं, यशोदा गाती हुई कहती हैं कि नीद मेरे लाल के पास आओ, क्यो नही (यहाँ) आकर (इन्हे) सुलाती है। तू जल्दी क्यो नही आती, तुझे कृष्ण बुला रहे हैं। कभी भगवान् (कृष्ण) पलके बन्द कर लेते है, कभी होठ फडफड़ाने लगते हैं। उन्हे सोता हुआ समझकर (मां यशोदा) मौन होकर इशारे से बताती है। इसी बीच भगवान् व्याकुल हो उठे और यशोदा जी पुनः मधुर गीत गाने लगती है। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियो को भी दुर्लभ है उसे नन्द-पत्नी (यशोदा) प्राप्त कर रही है ॥७॥ कपट करि ब्रजहिँ पूतना आई । अति सुरूप, विष अस्तन लाए, राजा कस पठाई । मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कठ लगाई । भाग बड़े तुम्हरे नन्दरानी, जिहिँ के कुँवर कन्हाई । कर गहि छीर पियावति अपनी, जानत केसवराई । बाहर ह्वैं कै असुर पुकारी, अब बलि लेहु छुड़ाई । गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई । सूरदास प्रभु तुम्हरी लीला, भक्तनि गाइ सुनाई ॥८॥ अर्थ—पूतना कपट रूप धारण करके ब्रज मे आयी। राजा कंस द्वारा भेजी गयी वह बहुत रूपवती तथा विषाक्त स्तनों युक्त होकर आयी थी। वह भगवान् कृष्ण के मुख का चुम्बन लेती, उनके नेत्रों को देखती और उन्हें गले से लगा लेती। (कृष्ण के प्रति इस प्रकार झूठा प्रेम दिखाकर वह बोली नन्दरानी तुम्हारे भाग्य प्रबल है — जिसके कृष्ण जैसा कुमार है। वह उन्हे अपने हाथ मे लेकर अपना दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे) । बाहर होकर राक्षसी ने पुकारा कि हे बलि (दैत्यराज) अब मुझे छुड़ा लो। अथवा (हे कृष्ण मैं तुम्हारी बलिहारी हूँ मुझे छोड़ दो) वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी मानो उसे सांप ने काट लिया हो। सूरदास जी कहते हैं हे भगवान् आपकी लीला को भक्तो ने गाकर सुनाया ॥८॥
गोकुल लीला ५१ काग-रूप इक दनुज धर्यौ । नृप-आयसु लै धरि माथे पर, हरषवंत उर गरव भर्यौ । कितिक बात प्रभु तुम आयसु तें, वह जानी मो जात मर्यौ । इतनी कहि गोकुल उड़ आयौ, आइ नन्द-घर-छाज रह्यौ । पलना पर पौढै हरि देखे, तुरत आइ नैननिहिं अर्यौ । कंठ चाँपि बहु वार फिरायो, गहि पटक्यो, नृप पास पर्यौ । तुरत कंस पूछन तिहिं लाग्यो, क्यो आयौ नहिं काज कर्यौ । वातैं जाम बोलि तब आयौ, सुनहु कंस, तब आइ सर्यौ । धरि अवतार महाबल कोऊ, एकहिं कर मेरौ गर्व हर्यौ । सूरदास प्रभु कंस-निकंदन, भक्त-हेत अवतार धर्यौ ॥६॥ अर्थ-एक दैत्य ने कौवे का रूप धारण किया । राजा कंस की आज्ञा शिरो- धार्य कर, गर्वयुक्त तथा हर्षित होकर वह कंस से बोला- यह कौन-सी (बड़ी) बात है। आपकी आज्ञा से मेरे वहाँ जाते ही आप उसे (कृष्ण को) मरा हुआ ही समझें । इतना कहकर वह गोकुल मे उड़ आया और आकर नन्द के घर पर बैठ गया । पालने पर श्री कृष्ण को लेटा हुआ देखकर तुरन्त आकर वह उनकी आंखो पर अड़ गया । (कृष्ण ने उसका) गला पकड़ कर कई बार घुमाया और पकड़ कर पटक दिया तथा वह राजा कंस के पास जा गिरा । कंस तुरन्त उससे पूछने लगा, 'क्यों चले आये क्या कार्य नही किया !' पहर भर बीतने पर वह बोल पाया 'कंस सुनो, (तुम्हारी) आयु पूरी हो गयी । किसी महाबली ने अवतार ले कर एक ही हाथ से मेरे गर्व का हरण कर लिया । सूरदास जी कहते है कंस को समाप्त करने वाले भगवान् ने भक्तो (की रक्षा) के लिए अवतार धारण किया ॥६॥ कर पग गहि, अंगुठा मुख मेलत । प्रभु पौढे पालनैं अकेले, हरषि-हरषि अपनैं रङ्ग खेलत । सिव सोचत, विधि बुद्धि विचारत, वट बाढ्यौ सागर-जल झेलत । बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग दतीनि सकेलत । मुनि मन भीत भए, भुब कंपित सेष सकुचि सहसौ फन पेलत । उन व्रज-वासिनि बात न जानी, समुझे सूर सकट पग ठेलत ॥१०॥ अर्थ - (भगवान् श्री कृष्ण) हाथ से पकड़ कर पैर का अँगूठा मुख मे डालते हैं। भगवान् पलने में अकेले लेटे हुये हर्षित होकर अपनी ही धुन मे खेलते है । (उनकी इस शोभा को देख कर) शिव जी कहते है तथा ब्रह्मा बुद्धिपूर्वक विचार करने लगे । (प्रलय काल सन्निकट होने के कारण) वट वृक्ष बडा हो गया । (बढते हुए) सागर के जल (मे डूबने के कष्ट) को झेल रहा है। (यह परिस्थिति देखकर) बादल प्रलय काल (सन्निकट) जानकर तितर-बितर होने लगे और दिग्पाल दिग्गजों को इकट्ठा करने लगे ! मुनि लोग मन मे भयभीत हुये, धरती कांप उठी और शेषनाग संकुचित होकर
५२ सूरसागर सार सटीक अपने सहस्र फनो को (पृथ्वी का भार सहने के लिए) लगा देते हैं। सूरदास कहते हैं कि (इतना होने पर भी) वे ब्रजनिवासी बात नहीं समझ सके। उन्होंने मात्र यही जाना कि भगवान् पैर से छकड़ा ठेल रहे हैं ॥१०॥ महरि मुदित उलटाइ कै मुख चूमन लागी । चिरजीवौ मेरौ लाडिलौ, मैं भई सभागी । एक पाख त्रय-मास कौ मेरौ भयौ कन्हाई । पटकि रान उलटौ पऱ्यौ, मैं करैं बधाई । नन्द-घरनि आनन्द भरी, बोलीं ब्रजनारी । यह-सुख सुनि आईं सबै, सूरज बलिहारी ॥११॥ अर्थ - यशोदा (महरि) प्रसन्न होकर (कृष्ण को ऊपर) उलट कर उनका मुख चूमने लगी (और कहा कि) मेरे प्रिय तुम चिरंजीव हो मैं भाग्यवती हुई। मेरे कृष्ण साढ़े तीन मास के हुये। ये अब जांघ पटक कर उलट पड़ते हैं। मैं बधाई देती हूँ। नन्द की पत्नी (यशोदा) ने आनन्दित होकर यह बात व्रजांगनाओ से भी बता दी यह सुखमय समाचार सुनकर सभी (उन्हे देखने) आयी। सूरदास (भी उनकी इस शोभा पर) बलिहारी हैं ॥११॥ जसुमति मन अभिलाप करै । कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै । कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख वचन झरै । कब नदहि बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै । कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौँ झगरै । कब धौँ तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै । कब हँसि बात कहैगो मोसौँ, जा छबि तैं दुख दूरि हरै । स्याम अकेले आँगन छोड़ि, आपु गई कछु काज घरै । इहिँ अंतर अँधवाह उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै । सूरदास-ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै ॥१२॥ अर्थ - यशोदा जी अपने मन मे (अनेक) अभिलापाये करती हैं। कब मेरे लाल घुटनो के बल चलेगे, कब पृथ्वी पर दो-एक कदम रखेगे। कब (मैं) दूध के दो दांत देखूंगी, कब इनके मुख से तोतले स्वर निकलेगे। कब नन्द को बाबा कह कर पुका- रेगे, कब मां कहकर मुझे बार-बार रटेगे। मोहन कब मेरा आंचल पकड़ कर इधर- उधर कुछ कह कर मुझसे हठ करेगे। कब तक [ये थोड़ा-थोड़ा कुछ खाने लगेगे ओर अपने हाथ से (अपना) मुख भरेगे] अपने आप खाने लगेगे। कब कृष्ण हँस कर मुझसे बात करेगे जिसकी शोभा से मेरे दुःख दूर हो जायेगे। श्याम को अकेले आंगन मे छोड कर कुछ कार्यवश वे घर मे गयी। इसी बीच एक अन्धड़ गर्जन करता हुआ तथा
गोकुल लीला ५३ आकाश सहित गहराता हुआ उठा । सूरदास कहते हैं कि ब्रज के लोग उस ध्वनि को सुनकर यथास्थिति अत्यन्त भयभीत हुये ॥१२॥ सुत मुख देखि जसोदा फूली । हरषति देखि दूध की दँतियाँ, प्रेममगन तन की सुधि भूली । बाहिर तैं तब नंद बुलाए, देखौ धौं सुन्दर सुखदाई । तनक-तनक सी दूध दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करौ आई । आनंद सहित महर तब आए, मुख चितवत दोउ नैन अघाई । सूर स्याम किलकत द्विज देख्यौ, मनौ कमल पर बिज्जु जमाई ॥१३॥ अर्थ—पुत्र के मुँह को देखकर यशोदा (हर्ष से) प्रफुल्लित हो उठी । कृष्ण के दूध के दांत देखकर, हर्षित हो (श्री कृष्ण के) प्रेम मे निमग्न होकर शरीर की सुध- बुध भूल गयी । उन्होने तब बाहर से नन्द को बुलाया और कहा कि सुन्दर सुखदायक (श्री कृष्ण) को देखो । छोटे-छोटे से दूध के दांतो को देखिये और अपने नेत्रो को सफल कीजिये । तब प्रसन्न होकर नन्द आये तथा (पुत्र के) मुख को देखकर उनके नेत्र तृप्त हो गए । सूरदास कहते है कि यदुराज नन्द ने किलकारी मारते हुए कृष्ण को देखा तो ऐसा लगा कि जैसे कमल पर बिजली उग आयी हो ॥१३॥ हरि किलकत जसुमति की कनियाँ । मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नंद-रनियाँ । घर-घर हाथ दिखावति डोलति, बाँधति गरैँ बघनियाँ । सूर स्याम की अद्भुत लीला नहिँ जानत मुनिजनियाँ ॥१४॥ अर्थ—भगवान् कृष्ण यशोदा की गोद में किलक रहे हैं । उन्होने (अपने मुंह) में तीनों लोको को दिखाया जिससे नन्दरानी (अत्यन्त) चकित हो गईं । वे घर-घर जा कर हाथ दिखाती डोलती है और गले मे (कृष्ण के) (बघनख ताबीज) बांधती है । सूरदास कहते हैं कि श्याम की अद्भुत लीला का ज्ञान मुनिजनों को भी नही है ॥१४॥ कान्ह कुँवर की करहु पासनी, कछु दिन घटि षट मास गए । नंद महर यह सुनि पुलकित जिय, हरि अनप्रासन जोग भए । विप्र बुलाई नाम लै बूझ्यौ, रासि सोधि एक सुदिन धरयौ । आछौ दिन सुनि महरि जसोदा, सखिनि बोलि सुभ गान करयौ । जुवति महरि कौँ गारी गावति, और महर कौ नाम लिए । ब्रज-घर-घर आनंद बढ़यौ अति, प्रेम पुलक न समात हिए । जाकौँ नेति-नेति स्रुति गावत, ध्यावत सुर मुनि ध्यान धरे । सूरदास तिहिँ कौँ ब्रज-वनिता, झकझोरतिँ उर अंक भरे ॥१५॥
५४ सूरसागर सार सटीक अर्थ- (यशोदा ने नन्द से कहा) कुमार कृष्ण का अन्नप्राशन संस्कार कीजिये क्योकि छः मास बीतने मे कुछ ही दिन शेष हैं । यह सुनकर कि कृष्ण अन्नप्राशन के योग्य हो गये, बाबा नन्द अपने मन मे बहुत प्रसन्न हुये । उन्होने ब्राह्मण को बुलाकर कृष्ण का नाम और राशि शोध करके शुभ दिन का निश्चय किया । इस शुभ दिन को सुनकर मां यशोदा ने सखियो को बुलाकर सुन्दर गान सुनाया । युवतियाँ बाबा नन्द और यशोदा का नाम ले कर गाली (गीत) गा रही हैं । ब्रज के प्रत्येक घर मे आनन्द की अत्यन्त वृद्धि हुई । प्रेम से उत्पन्न प्रसन्नता हृदय मे नही समाती । [सूरदास कहते है कि] श्रुतियां जिसका गुणगान 'नेति-नेति' कहकर गाती है, देव और ऋषि जिसका ध्यान धारण करते हैं उसी (ब्रह्म) को ब्रज वनिताये गोद में लेकर हृदय से लगाकर झकझोर रही हैं ॥१५॥ लाल हौँ बारी तेरे मुख पर । कुटिल अलक, मोहनि-मन बिहँसनि भृकुटी बिकट ललित नैननि पर । दमकति दून-दँतुलिया बिहँसत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर । लघु-लघु लट सिर घुघरवारी, लटकन लटकि रह्यो माथैँ पर । यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौँ सकुचति हौँ जिय पर । नव-तन-चंद्र रेख-मधि राजत, सुरगुरु-सुक्र-उदोत परसपर । लोचन लोल कपोल ललित अति, नासा कौ मुकता रदछद पर । सूर कहा न्यौछावर करिये अपने लाल ललित लरखर पर ॥१६॥ अर्थ-हे लाल मैं तुम्हारे मुख (की शोभा) पर निछावर हूँ । घुंघराली लटे, नेत्रो पर टेढी भौंहे और मुस्कान मन को मोहित करने वाली हैं । हँसते समय दूध के दांत इस प्रकार चमकते है मानो कमल पर मोती ने स्थान बना लिया हो । सिर पर की छोटी-छोटी घुंघराली लटे माथे पर लटक रही है । इस उपमा को कौन कह सकता है । कुछ कहने पर कवि के मन मे संकोच होता है । (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा के बीच वृहस्पति और शुक्र की पारस्परिक आभा का प्रकाश (सुशोभित) हो । (कृष्ण के) नेत्र चंचल है, कपोल सुन्दर हैं तथा नाक का मोती होठो पर (झलक रहा) है । सूरदास कहते हैं कि अपने लाल (कृष्ण) की लड़- खडाहट (डगमगा कर गिरने की क्रिया) पर क्या न्योछावर करुँ ॥१६॥ उमगीँ ब्रजनारि सुभग, कान्ह बरष गाँठि उमंग, चहतिँ बरष बरषनि । गावहिँ मगल सुगान, नीके सुर नीके तान, आनँद अति हरषनि । कंचन मनि-जटित-थार, रोचन, दधि, फूल-डार, मिलिबे कौ तरसनि । प्रभु बरष-गाँठि जोरति, वा छवि पर तृन तोरति, सूर अरस परसनि ॥१७॥ अर्थ कृष्ण की वर्ष गांठ पर सौभाग्य वाली ब्रज की गोपियां उल्लसित होकर अपने उल्लास की वरषा करना चाहती है । वे मगलमय सुन्दर गीत अत्यन्त आनदित होकर सुरीले स्वरो मे गा रही है । वे (गोपियाँ) सोने के मणि जटित थाल मे दधि,
गोकुल लीला ५५ रोली, फूल रख कर कृष्ण से मिलने (कृष्ण को तिलक करने) के लिए आतुर है। सूर कहते है कि प्रभु (कृष्ण) की वर्ष गांठ जोड़ी जा रही है (लम्बाई नापने वाले धागे मे गांठ लगाई जा रही है)। सब मिल भेट कर कृष्ण की सुन्दरता पर तृन तोड़ रहे है। (नजर लगने से बचा रहे हैं) ॥१७॥ सोभित कर नवनीत लिये । घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये । चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिये । लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए । कठुला-कंठ, बज्र केहरि-नख, राजत रुचिर हिए । धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए ॥१८॥ अर्थ - (भगवान् कृष्ण) हाथ मे माखन लिये हुये सुशोभित हो रहे हैं। धूल धूसरित शरीर तथा मुख मे दधि लपेट कर वे घुटनो के बल चल रहे हैं। उनके कपोल सुन्दर हैं, नेत्र चंचल हैं तथा वे गोरोचन का तिलक दिये हैं। उनके लटो की लटकन ऐसी प्रतीत होती है मानो उन्मत्त भ्रमरो का समूह, मादक मधु का पान कर (के झूम) रहा हो । उनके कण्ठ मे कठुला और हृदय पर सिंह का वज्र नाखून (अथवा सिंह नख और मणि) सुशोभित हो रहा है (रहे हो)। सूरदास कहते है कि इस सुख मे एक पल का जीवन भी धन्य है। सैकड़ों कल्प (जीवन) जीने से क्या लाभ ? ॥१८॥ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबौ, धावत । कबहु निरखि हरी आपु छाँह कौं, कर सौं पकरन चाहत । किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत । कनक-भूमि पर कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति । करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति । बाल-दसा-मुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावत । अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥१९॥ अर्थ - कृष्ण किलकारी करते हुये घुटनो के बल आ रहे हैं। नन्द के मणियुक्त स्वर्णिम आँगन मे वे परछाई पकड़ने के लिये दौड रहे हैं। कभी कृष्ण अपनी छाया को देखकर उसे हाथ से पकडना चाहते है। किलक कर हँसने से उनके दूध के दो दाँत सुशोभित होते है कृष्ण उस (स्थिति) को बार-बार देखते हैं। (आँगन की) स्वर्ण-भूमि पर उनके हाथ और चरणो की छाया देखकर यही उपमा सुशोभित होती है मानो पृथ्वी प्रत्येक चरण एवं हाथ को प्रतिमा बना कर उनके लिए कमलासन सजा रही है। (कृष्ण के हाथ तथा चरण प्रतिमा हैं उनकी परछायी कमलासन है) । (कृष्ण के इस)
५६ सूरसागर सार सटीक बाल्यावस्था के सुख को देखकर यशोदा वार-वार नन्द को बुलाती हैं। यशोदा 'सूर' के स्वामी को आंचल से ढक कर दूध पिलाती है ।।११९॥ सिखवति चलन जसोदा मैया । अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरे पैया । कबहुँक सुंदर वदन विलोकति, उर आनंद भरि लेत बलैया । कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर कन्हैया । कबहुँक बल कौं टेरि बुलावति, इहिँ आँगन खेलौ दोउ भैया । सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप विलसत नँदरैया ॥१२०॥ अर्थ- मां यशोदा (श्री कृष्ण को) चलना सिखाती हैं। कृष्ण लडखड़ाते है तो (अपना) हाथ उनके हाथ में पकड़ा देती हैं; वे डगमगा कर पृथ्वी पर पैर रखते हैं। (मां यशोदा) कभी उनके सुन्दर मुख को देखती हैं और अत्यन्त प्रसन्न हृदय से उनकी बलैया लेती हैं। कभी अपने कुल के देवताओं की मनौती मानती है कि मेरे कुमार कृष्ण चिरजीव हो। कभी बलराम को जोर से पुकारती हैं (और कहती हैं) कि इसी आंगन मे दोनों भाई खेलो। सूरदास कहते हैं कि स्वामी की लीला के प्रताप से राजा नन्द उल्लसित हो रहे हैं ॥१२०॥ चलत देखि जसुमति सुख पावै । ठुमकि-ठुमकि पग धरनी रेंगत, जननी देखि दिखावै । देहरि लौं चलि जात, बहुरि फिरि-फिरि इतहीं कौं आवै । गिरि-गिरि परत, बनत नहिं नाँघत सुर-मुनि सोच करावै । कोटि ब्रह्मांड करत छिन भीतर, हरत विलंब न लावै । ताकौं लिए नंद की रानी, नाना खेल खिलावै । तब जसुमति कर टेकि स्याम कौ, क्रम-क्रम करि उतरावै । सूरदास प्रभु देखि-देखि, सुर-नर-मुनि-बुद्धि भुलावै ॥१२१॥ अर्थ- कृष्ण को चलता हुआ देख कर मां (अत्यन्त) सुख प्राप्त करती हैं। वे ठुमुक-ठुमुक कर पृथ्वी पर चलते है और मां को देखकर (अपना चलना) दिखाते हैं। वे घर की देहली तक चले जाते हैं और फिर यही वापस आ जाते हैं। वे बार-बार गिर पडते हैं। उनसे देहली लांघते नही बनता इसलिये देवताओ और मुनियो के हृदय मे सोच उत्पन्न करवा देते है (कि भगवान् इतने अशक्त हैं कि देहली नही लांघ सकते फिर असुरों का विनाश किस प्रकार करेंगे ?) जो भगवान् करोडो ब्रह्माण्डो का निर्माण एक क्षण के भीतर करता है तथा उसका हरण करने मे भी देर नही करता उसको नन्दरानी गोद मे लेकर अनेक प्रकार के खेल खिलाती हैं। तब यशोदा श्याम का हाथ पकड़ कर क्रम से एक-एक सीढ़ी उतारती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को (इस रूप मे) देख-देख कर देवता, मनुष्य और ऋषि गण अपना विवेक भूल जाते हैं ॥१२१॥
गोकुल लीला ५७ नंद जु के वारे कान्ह, छाँड़ि दे मथनियाँ । बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ । नैंकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ । आरि जनि करौ, बलि बलि जाउँ हौं निधनियाँ । जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ । ताकौ नंदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ । सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ । सूर स्याम देखि सबै भूलीं गोप-धनियाँ ॥२२॥ अर्थ—हे नन्द जी के छोटे कृष्ण, मथानी छोड़ दीजिए। बार-बार नन्दरानी, मां यशोदा कहती हैं कि थोडा ठहरो, मेरे प्राणधन, मैं तुम्हे मक्खन दूँगी। हे मेरी असीम सम्पत्ति, हठ मत करो, मैं तुम्हारे ऊपर बलिहारी हूँ। जिसका ध्यान सुर-नर- मुनि जन धारण करते हैं उनको कन्धे पर लेकर नन्दरानी यशोदा उनका मुख चूमती हैं। शेषनाग को हजारो मुखों से उनका गुणगान करते नही बनता। सूरदास कहते हैं कि उन्हे देखकर गोपवधुएँ सब कुछ भूल गयी ॥२२॥ कहन लागे मोहन मैया-मैया । नंद महर सौं बाबा बाबा, अरु हलधर सौं भैया । ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया । दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया । गोपी ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति वधैया । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, चरननि की वलि जैया ॥२३॥ अर्थ—श्री कृष्ण (यशोदा को) मां-मां कहने लगे। नन्द को बाबा और बलराम को भैया (कहने लगे) । (कृष्ण को बाहर खेलने के लिए जाता हुआ देखकर) माँ यशोदा ऊपर चढ़कर कृष्ण का नाम लेकर कहती है कि हे लाल, दूर खेलने मत जाओ, किसी की गाय मार देगी। गोपियाँ और ग्वाले परस्पर कौतूहल करते है, घर-घर में बधाइयाँ बज रही है। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, तुम्हारे दर्शन के लिए मैं तुम्हारे चरणो पर निछावर हूँ ॥२३॥ गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी । माखन सहित देहि मेरी मैया, सुपक सुकोमल, मोटी । कत हौ आरि करत मेरे मोहन तुम आँगन मैं लोटी । जो चाहौ सो लेहु तुरतहीँ, छाँड़ौँ यह मति खोटी । करि मनुहारि कलेऊ दाँह्रौ, मुख चुपरचौ अरु चोटी । सूरदास कौ ठाकुर ठाढौ, हाथ लकुटिया छोटी ॥२४॥ अर्थ—गोपाल श्री कृष्ण दही और रोटी माँगते हैं। मेरी मां मुझे सुन्दर पकी हुई पुष्टिकर मोटी रोटी मक्खन के साथ दो। (मां यशोदा कहती है कि) हे मेरे मोहन
५८ सूरसागर सार सटीक
तुम आंगन मे लोट कर हठ क्यो कर रहे हो जो कुछ चाहते हो उसे तुरन्त ही लो और यह खोटी बुद्धि छोड दो। (मां यशोदा ने) कृष्ण को मनाकर उन्हें कलेवा दिया, मुख में उबटन लगाया और चोटी संवारी। (अब) सूरदास के स्वामी हाथ मे छोटी सी लाठी लेकर खड़े हैं ॥२४॥ बरनौँ बाल-वेप मुरारि। थकित जित-तित अमर-मुनि-गन, नंद-लाल निहारि। केस सिर बिन बपन के चहुँ दिसा छिटके झारि। सीस पर धरि जटा, मनु सिसु रूप कियौ त्रिपुरारि। तिलक ललित ललाट केसरबिंदु सोभाकारि। रोष-अरुन तृतीय लोचन, रह्यौ जनु रिपु जारि। कंठ कठुला नील मनि, अंभोज-माल सँवारि। गरल ग्रीव, कपाल उर इहिँ भाइ भए मदनारि। कुटिल हरि-नख हिएँ हरि के हरषि निरखति नारि। ईस जनु रजनीस राख्यो भाल तैँ जु उतारि। सदन-रज तन स्याम सोभित, सुभग इहिँ अनुहारि। मनहुँ अंग-बिभूति-राजित सभु सो मधुहारि। त्रिदस-पति-पति असन कौँ अति जननि सौँ करै आरि। सूरदास विरंचि जाकौँ जपत निज मुख चारि ॥२५॥ अर्थ—मैं मुरारी (श्री कृष्ण) के बाल रूप का वर्णन कर रहा हूँ। नन्दलाल (श्री कृष्ण) को देखकर देवर्षि समूह यत्र-तत्र थकित हो गया है। बिना मुण्डन किये हुए सिर के सभी बाल चारो ओर बिखरे हुए हैं ऐसा प्रतीत होता है मानो शंकर जी ने सिर पर जटा धारण कर शिशु-रूप बनाया हो। सुन्दर मस्तक पर शोभा उत्पन्न करने वाली केशर की बिन्दी लगी है वह ऐसी प्रतीत होती है जैसे शत्रु (कामदेव) को जलाने के लिए क्रोधारुण तृतीय नेत्र हो। कण्ठ मे नीलमणि का कण्ठा तथा (सुन्दर) कमलों की संवारी हुयी माला (की शोभा) ऐसी प्रतीत होती है जैसे शंकर के कण्ठ मे विष तथा हृदय पर कपाल माला सुशोभित हो रही हो। स्त्रियां कृष्ण के हृदय पर सिंह का टेढ़ा नाखून हर्षित होकर देखती हैं ऐसा लगता है जैसे शंकर जी ने चन्द्रमा को मस्तक से (हृदय पर) उत्तार लिया हो। घर की धूल से भगवान् का शरीर इस प्रकार सुशोभित हो रहा है जैसे श्मशान की भस्म लगाये शंकर जी सुशोभित हों। सूरदास कहते हैं ब्रह्मा अपने चारो मुखो से जिनको जपते रहते हैं वही देवराज इन्द्र के स्वामी (श्री कृष्ण) भोजन के लिए हठ कर रहे हैं ॥२५॥ मैया, कबहिँ बढैगी चोटी ? किती वार मोहिँ दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी। तू जो कहति बल की बेनी ज्यौँ, ह्वै है लाँबी-मोटी।
गोकुल लीला ५६ काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुइँ लोटी। काचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी। सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥२६॥ अर्थ - (कृष्ण यशोदा से शिकायत करते हैं) माँ (मेरी) चोटी कब बड़ी होगी ? मुझे कितना समय दूध पीते हो गया और यह आज भी छोटी ही है। तुम तो कहती हो कि यह बलराम की वेणी की भांति लम्बी और मोटी होगी। काढ़ते, गुहते तथा स्नान करते समय नागिन की तरह पृथ्वी पर लोटने लगेगी। तुम बार-बार मुझे कच्चा दूध पिलाती हो तथा मक्खन और रोटी नही देती हो। सूरदास कहते है कि कृष्ण और बलराम दोनो भाइयो की जोड़ी चिरंजीवी हो ॥२६॥ हरि अपनैं आँगन कछु गावत । तनक-तनक चरननि सौँ नाचत, मनहिँ मनहिँ रिझावत । बाँह उठाइ काजरी-धौरी, गैयनि टेरि बुलावत । कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत । माखन तनक अपनैं कर लै, तनक बदन मैं नावत । कबहुँक चितै प्रतिबिंब खंभ मैं, लौनी लिए खवावत । दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष आनंद बढ़ावत । सूर स्याम के बाल चरित, नित नितही देखत भावत ॥२७॥ अर्थ- कृष्ण अपने आँगन मे कुछ गा रहे हैं। छोटे-छोटे चरणो से वह नाचते हैं तथा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। बांह उठाकर कजरी (काले रंग की) और धौरी (सफेद रंग की) नाम की गायों को जोर से बुलाते हैं। कभी नन्द बाबा को पुकारते है और कभी घर मे आते हैं। (कभी) अपने छोटे-छोटे हाथो मे मक्खन लेकर अपने छोटे मुँह में डालते हैं। कभी खम्भे मे अपनी परछाईं देखकर नवनीत लेकर उसे खिलाते हैं। यशोदा छिपकर उनकी यह लीला देखती है जो कि हर्ष और आनन्दवर्द्धक है। सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण का बालचरित्र प्रतिदिन ही देखने मे अच्छा लगता है ॥२७॥ जसुमति जबहि कह्यौ अन्हवावन, रोइ गए हरि लोटत री । तेल उबटनौ लै आगैं धरि, लालहिँ चोटत पोटत री । मैं बलि जाऊँ न्हाउ जनि मोहन, कत रोवत बिनु काजैं री । पाछे धरि राख्यो छपाइ कै, उबटन-तेल-समाजें री । महरि बहुत बिनती करि राखति, मानत नहीँ कन्हैया री । सूर स्याम अतिहीँ बिरझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री ॥२८॥ अर्थ - यशोदा ने जब कृष्ण को नहलाने की बात कही तो वे रोते हुए (पृथ्वी पर) लोट गये । तेल और उबटन आगे रखकर (माँ यशोदा) लाल श्री कृष्ण को लाड- प्यार करती है। मोहन मैं बलिहारी हूँ तुम मत नहाओ, व्यर्थ में ही क्यों रो रहे हो।
६० सूरसागर सार सटीक (यह कह कर मां यशोदा ने) उवटन और तेल का सामान पीछे रख दिया । मां यशोदा अनेक प्रकार से विनती करती है, किन्तु कृष्ण नहीं मानते । सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण (स्नान करने के बिलकुल) विरुद्ध हो गये तथा उनका अन्त सुर और मुनि भी नही पा सके ॥२८॥ ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, हरिहिं लिए चंदा दिखरावत । रोवत कत बलि जाऊँ तुम्हारी, देखौँ धौ भरि नैन जुड़ावत । चितै रहै तब आपुन ससि-तन अपने कर लै-लै जु बतावत । मीठौ लगत किधौं यह खाटौ, देखन अति सुन्दर मन भावत । मनहीँ मन हरि बुद्धि करत हैं, माता सौँ कहि ताहिं मँगावत । लागी भूख, चंद मैँ खैहौँ; देहि देहि रिस करि विरुझावत । जसुमति कहति कहा मैँ कीनौँ रोवत मोहन अति दुख पावत । सूर स्याम कौँ जसुमति बोधति, गगन चिरैया उड़त दिखावत ॥२६॥ अर्थ - यशोदा अपने आँगन मे खडी होकर भगवान् को (गोद मे) लेकर चन्द्रमा दिखाती हैं। (और उनसे कहती हैं कि) क्यो रो रहे हो मै तुम्हारी बलिहारी हूँ तुम्हे देखकर मेरे नेत्र शीतल (तृप्त) हो जाते है। तब श्री कृष्ण स्वयं चन्द्रमा की ओर देखकर हाथ (से इशारा) बनाकर कहते है कि यह मीठा हो अथवा खट्टा, देखने मे अत्यन्त सुन्दर तथा मन को मोहित करने वाला है। मन-ही-मन (भगवान् श्री कृष्ण) बाल- बुद्धि (का स्वाग) रचते है और माँ (यशोदा) से कहकर उस (चन्द्रमा) को (पृथ्वी पर) मँगाते है। मुझे भूख लगी है मैं चन्द्रमा खाऊँगा इस प्रकार (कृत्रिम) क्रोध करके (माँ यशोदा को) उलझन मे डाल देते हैं। यशोदा कहती हैं कि यह मैने क्या किया कृष्ण रोते हुए बहुत दुख पा रहे है। सूरदास कहते हैं कि (इस प्रकार हठ मे पडे हुए) श्याम को यशोदा समझाती हैं और आकाश मे उडती चिडियाँ उन्हे दिखला रही हैं ॥२६॥ सुनि सुत, एक कथा कहौँ प्यारी । कमल-नैन मन आनंद उपज्यों, चतुर सिरोमनि देत हुँकारी । दसरथ नृपति हुतौ रघुबंसी, ताकै प्रगट भए सुत चारी । तिनमैँ मुख्य राम जो कहियत, जनक सुता ताकी बर नारी । तात-बचनलगि राज तज्योतिन, अनुज घरनिसँग गए बनचारी । धावत कनक मृगा के पाछै, राजिव लोचन परम उदारी । रावन हरन-सिया कौ कीन्हौ, सुनि नंद-नंदन नींद निंवारी । चाप चाप कहि उठे सूर प्रभु, लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी ॥३०॥ अर्थ - (मां यशोदा कृष्ण से कहती है कि) हे पुत्र मैं एक अच्छी कहानी कह रही हूँ। कमलनेत्र (श्री कृष्ण) के मन मे (अत्यन्त) आनन्द प्राप्त हुआ और चतुर शिरोमणि (श्रीकृष्ण) हुँकारी (कथा सुनते समय हां, हां की उक्ति) देते हैं। रघुवश मे दशरथ नाम के एक राजा हुये उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये । उनमे मुख्य जिन्हे राम
गोकुल लीला ६१ कहा जाता था उनकी श्रेष्ठ पत्नी जानकी जी थी । वे पिता की आज्ञा मानकर भाई (लक्ष्मण) और पत्नी सहित वन चले गये । कमलनेत्र वाले परम उदार रामचन्द्र जी स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते है इसी समय रावण ने सीता का हरण कर लिया । यह (कहानी) सुन कर नन्द सुत (कृष्ण) की नीद दूर हो गयी । सूरदास कहते हैं भगवान् कृष्ण चौंक कर यह कहने लगे कि 'लक्ष्मण धनुष दो, धनुष दो।' माँ को (कृष्ण की यह बात सुनकर) बहुत भ्रम हुआ ॥३०॥ जागौ, जागौ हो गोपाल । नाहिं इतौ सोइयत सुनि सुत, प्रात परम सुचि काल । फिरि-फिरि जात निरखि मुख छिन छिन, सब गोपनि के बाल । बिन बिकसे कल कमल-कोष तैं मनु मधुपनि की माल । जो तुम मोहिं न पत्याहु सूर प्रभु, सुन्दर स्याम तमाल । तौ तुमहीं देखौ आपुन तजि निद्रा नैन बिसाल ॥३१॥ अर्थ-(माँ यशोदा कृष्ण को जगाते हुए कहती है) हे गोपाल जागिये । हे पुत्र सुनो इस प्रातःकालीन अत्यन्त पवित्र समय मे नही सोना चाहिये । सभी बाल-गोपाल एक-एक क्षण पर तुम्हारा मुख देखकर (उसी प्रकार) वापस चले जाते है, जैसे कमल की कली के पराग कोष को खिला हुआ न पाकर भ्रमरो की पंक्तियां (निराश लौट जाती हैं) । सुन्दर तमाल वृक्ष की भाँति श्याम वर्ण वाले सूर के प्रभु यदि मेरा विश्वास न हो तो नीद छोड़कर अपने विशाल नेत्रो से तुम स्वय देखो ॥३१॥ कमल-नैन हरि करौ कलेवा ।' माखन-रोटी, सद्य जम्यौ दधि, भाँति-भाँति के मेवा । खारिक, दाख, चिरौंजी, किसमिस, उज्ज्वल गरी बदाम । सफरी, सेव, छुहारे, पिस्ता, जे तरबूजा नाम । अरु मेवा बहु भाँति-भाँति हैं षटरस के मिष्ठान्न । सूरदास प्रभु करत कलेवा, रीझे स्याम सुजान ॥३२॥ अर्थ-कमलनेत्र, भगवान् श्री कृष्ण प्रातःकालीन अल्पाहार कीजिये । मक्खन और रोटी, तुरन्त जमा हुआ दही, अनेक प्रकार के मेवे, छुहारा, द्राक्षा, चिरौंजी किशमिस, श्वेत गरी (नारियल), बादाम, अमरूद, सेव, छुहारा, पेश्ता, तरबूज और अन्य प्रकार के बहुत से मेवे छः रसों से युक्त मिष्ठानो को पाकर सर्वज्ञ भगवान् कलेवा करते हैं और मन-ही-मन प्रसन्न होते है ॥३२॥ मैया मोहिं दाउ बहुत खिजायौ । मोसों कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ । कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात ।
६२ सूरसागर सार सटीक पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात। गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात। चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात। तू मोहीँ कौँ मारन सीखी, दाउहिँ कबहुँ न खीझै। मोहन मुख रिस की ये बातैँ, जसुमति सुनि-सुनि रीझै। सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत। सूर स्याम मोहि गोधन की सौँ, हौँ माता तू पूत ॥३३॥ अर्थ - (कृष्ण मां से बलराम की शिकायत करते हुए कहते है) मां मुझे बलराम ने बहुत चिढ़ाया। मुझसे कहते हैं कि तुम मोल लिए गये हो, तुम्हे यशोदा ने कब जन्म दिया। क्या करूं इसी क्रोध के कारण मैं खेलने नही जाता। (बलराम) बार-बार कहते है कि तुम्हारी मां कौन है और तुम्हारे पिता कौन है। नन्द गोरे हैं, यशोदा (भी) गोरी हैं तुम्ही क्यो सावले शरीर वाले हो ? सभी ग्वाले चुटकी बजाकर हंसते है और बलराम उन्हे (यही) सिखा देते है। तुम हमेशा मुझे ही मारना जानती हो भैया पर कभी क्रोध नही करती। श्री कृष्ण के मुख से ये क्रोधपूर्ण बाते सुनकर यशोदा (मन- ही-मन) प्रसन्न होती है और (कृष्ण से) कहती है कृष्ण, सुनो, बलराम चुगली करने वाला और जन्म से ही धूर्त है। सूरदास कहते है कि (मां यशोदा ने कहा कि) मुझे गोधन (गायो की सम्पत्ति) की शपथ है मैं (तुम्हारी) मां हूँ और तुम (मेरे) पुत्र हो ॥३३॥ खेलन दूरि जात कत कान्हा। आजु सुन्यौ मैं हाउ आयौ, तुम नहिँ जानत नान्हा। इक लरिका अबहीँ भजि आयौ, रोवत नहिँ देख्यौ ताहि। कान तोरि वह लेत सबनि के, लरिका जानत जाहि। चली न, बेगि सबारै जैये, भाजि आपनैं धाम। सूर स्याम यह बात सुनतही बोलि लिए बलराम ॥३४॥ अर्थ-हे कृष्ण, दूर खेलने क्यो जा रहे हो ? मैंने आज सुना है कि 'होवा' आया है तुम छोटे हो (इसलिए) नही जानते। एक लड़का अभी भागता हुआ आया है, मैंने उसे रोता हुआ देखा। जिसे लड़का समझता है वह (होवा) सबके कान तोड लेता है चलो न, आज सबेरे ही (शीघ्र हो) अपने घर भाग चले। सूरदास जी कहते हैं कि श्याम ने यह बात सुनते ही बलराम को (अपने साथ) बुला लिया ॥३४॥ खेलत मैँ को काको गुसैयाँ। हरि हारे जीते सुदामा, बरबस हीँ कत करत रिसैयाँ। जाति पाँति हमतैँ बड़ नाहीँ, नाहीँ बसत तुम्हारी छैयाँ। अति अधिकार जनावत यातै, जातैँ अधिक तुम्हारे गैयाँ। रूठहि करै तासौँ को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ ग्वैयाँ। सूरदास प्रभु खेल्यीइ चाहत, दाउँ दियौ करि नद-दुहैयाँ ॥३५॥
गोकुल लीला ६३ अर्थ-खेलने में कौन किसका स्वामी होता है। भगवान् कृष्ण हार गये और श्रीदामा जीत गये, (इस पर श्रीकृष्ण हार नही मानते और क्रोध करते हैं। श्रीदामा भी रुष्ट हो-हो कर कहते हैं कि) बलपूर्वक क्रोध क्यों करते हो जाति-पांति मे भी तो हमसे बड़े नही हो न तो हम तुम्हारी छाया मे ही रहते हैं। क्या तुम्हारे पास कुछ अधिक गाएँ है इसीलिए अधिक अधिकार दिखा रहे हो। जो खेल मे रूठता है उसके साथ कौन खेले ? (ऐसा कहकर) सभी साथी जहां-तहां बैठ गये। सूरदास कहते हैं कि भगवान् खेलना चाहते थे इसलिए नन्द की दुहाई देकर दाँव दिया (पारी दी) ॥३५॥ हरि कौँ टेरति है नँदरानी । बहुत अवार भई कहँ खेलत रहे, मेरे सारँग पानी ? सुनतहिँ टेर, दौरि तहँ आए, कब के निकसे लाल । जेँवत नहीँ नंद तुम्हरै बिनु, बेगि चलौ, गोपाल । स्यामहिँ ल्याई महरि जसोदा, तुरतहिँ पाइँ पखारे । सूरदास प्रभु संग नंद कैँ, बैठे हैं, दोउ वारे ॥३६॥ अर्थ-नन्दरानी (यशोदा) भगवान् कृष्ण को पुकारती है। मेरे सारंगपाणि, बहुत देर हुयी कहाँ खेल रहे हो ? माता की पुकार सुनकर (कृष्ण) वहाँ दौड़कर आ गये। (यशोदा ने कहा) हे लाल कब से निकले हो ? तुम्हारे बिना नन्द भोजन नही कर रहे हैं। हे गोपाल शीघ्र चलो। श्याम को लाकर मां यशोदा ने तुरन्त ही उनका पैर धोया। सूरदास कहते है कि नन्द के साथ (उनके) दोनो बालक (बलराम और कृष्ण) बैठे है ॥३६॥ जेँवत कान्ह नद इकठौरे । कछुक खात लपटात दोऊ कर, बालकेलि अति भोरे । वरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे । तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे । फूँकति वदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाइ अँकोरे । सूर स्याम कौँ मधुर कौर दै, कीन्हे तात निहोरे ॥३७॥ अर्थ--कृष्ण और नन्द एक ही स्थान पर भोजन कर रहे है। अत्यन्त भोले, शीघ्र ही कृष्ण कुछ खाते हैं, और दोनो हाथो मे लपेट लेते हैं। वरो का कौर उन्होने मुख मे डाला (और उसमे पड़ी हुई) मिर्च को दाँतो ने टटोल लिया। मिर्च तेज लगी उनकी आंखे डबडबा आईं और वे रोते हुये बाहर दौड पडे। रोहिणी उन्हे गोद मे उठाकर खड़ी होकर उनका मुँह फूंकती है। सूरदास कहते है कि पिता ने (नन्द ने) मीठा ग्रास देकर उनको अनुकूल किया ॥३७॥ मोहन काहेँ न उगिलौ माटी । वार-वार अनरुचि उपजावति, महरि हाथ लिए साँटी । महतारी सौँ मानत नाहीं, कपट-चतुरई ठाटी । १
६४ सूरसागर सार सटीक
वदन उधारि दिखायौ अपनौ, नाटक की परिपाटी । बड़ी वार भई लोचन उघरे, भ्रम-जवनिका फाटी । सूर निरखि नँदरानि भ्रमित भई, कहति न मीठी-खाटी ॥३८॥
अर्थ—(मां यशोदा कृष्ण को मिट्टी खाने से रोकती हैं) हे मोहन, तुम मिट्टी क्यो नही उगलते ? मां हाथ मे छडी लेकर मिट्टी खाने मे अरुचि उत्पन्न करती है किन्तु वे मां का कहना मानते ही नही और उन्होने अपनी कपटपूर्ण चतुरता को प्रदर्शित किया। अभिनय करते हुए उन्होने अपने मुँह को खोलकर दिखाया । (इस आश्चर्य को देखकर) मां यशोदा के नेत्र बहुत देर वाद खुले और भ्रम की यवनिका फट गई। सूर- दास कहते हैं कि कृष्ण के मुख को देखकर नन्दरानी भ्रमित हो गयी और उनके मुँह से मीठा-खट्टा (किसी प्रकार) का शब्द नही निकल सका ॥३८॥
नंद करत पूजा, हरि देखत । घट बजाइ देव अन्हवायौ, जल चंदन लै भेटत । पट अतर दै भोग लगायौ, आरति करी बनाई। कहत कान्ह, बाबा तुम अर्प्यौ, देव नहीँ कछु खाई । चितै रहे तब नंद महरि-मुख, सुनहु कान्ह की बात । सूर स्याम देवनि कर जोरहु, कुसल रहैं जिहिँ गात ॥३६॥
अर्थ—भगवान् (कृष्ण) नन्द को पूजा करते हुये देखते है। नन्द ने घण्टा बजाकर देवताओ को स्नान कराया तथा जल और चन्दन लेकर भेट स्वरूप समर्पित किया। वस्त्र की आड़ मे उनका भोग लगाया और सजाकर आरती की। कृष्ण ने कहा बाबा तुमने तो अर्पण कर दिया किन्तु भगवान् कुछ नही खाते । तब नन्द यशोदा के मुख की ओर देखने लगे और कहा कि कृष्ण की बात तो सुनो ! सूरदास कहते है (बाबा नन्द ने कहा) कि हे श्याम देवताओ को हाथ जोड़ो जिससे तुम्हारा शरीर कुशल पूर्वक रहे ॥३६॥
कहत नंद, जसुमति सोँ बात । कहा जानिए कह तै देख्यौँ, मेरौँ कान्ह रिसात । पाँच वरष को मेरौ कन्हैया, अचरज तेरी बात । बिनहीँ काज साँटि ले धावति, ता पाछै बिललात । कुसल रहैँ बलराम स्याम दोउ, खेलत-खात-अन्हात । सूर स्याम कौँ कहा लगावति, बालक कोमल गात ॥४०॥
अर्थ—नन्द यशोदा से बाते करते है कि तुमने मेरे कृष्ण को क्रोध करते हुए कहाँ से जाना और कहाँ से देखा। पाँच वर्ष का मेरा कृष्ण है और तुम्हारी बाते आश्चर्यजनक है। बिना किसी कार्य के ही बडबडाती हुई छडी लेकर उसके पीछे दौड़ती हो। बलराम और श्याम दोनो खेलते खाते नहाते कुशल-पूर्वक रहे। सूरदास
२. बाललीला एवं माखन चोरी
गोकुल लीला ६५ जी कहते हैं (नन्द ने यशोदा से कहा) कि कोमल अंग वाले श्रीकृष्ण को दोष क्यों लगाती हो ? ॥४०॥ माखन-चोरी मैया री, मोहिं माखन भावै । जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै । ब्रज-जुवती इक पाछै ठाढ़ी, सुनत स्याम की बात । मन-मन कहति कबहु अपने घर, देखौँ माखन खात । पैठे जाइ मथनियाँ कैं ढिग, मैं तब रहौं छपानी । सूरदास प्रभु अंतरजामीँ ग्वालिनि मन की जानी ॥४१॥ अर्थ- हे माँ, मुझे मक्खन ही अच्छा लगता है । यदि तू मेवा पकवान (आदि खाने के लिए) कहती हो तो मुझे नहीं रुचता । एक व्रजांगना पीछे खड़ी होकर कृष्ण की बात सुन रही है और अपने मन में ही कहती है कि मैं कभी इन्हें अपने घर माखन खाते हुए देखती (तो कितना अच्छा होता !) मैं तब छिपकर बैठ गयी और कृष्ण, मथानी के पास जाकर बैठ गये । सूरदास जी कहते हैं कि भगवान् अन्तर्यामी हैं उन्होने गोपी के मन की बात को जान लिया ॥४१॥ गए स्याम तिहिं ग्वालिनि कैं घर । देख्यौ द्वार नहीं कोउ, इत-उत चितैँ चले तब भीतर । हरि आवत गोपी जब जान्यौ, आपुन रही छपाइ । सूने सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ । माखन भरी कमोरी देखत लै-लै लागे खान । चितै रहे मनि-खंभ-छाँह तन, तासौँ करत सयान । प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग । आपु खात प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत, का रंग ? जौ चाहौ सब देउँ कमोरी, अति मीठो कत डारत । तुमहि देति मैं अति सुख पायौ,तुम जिय कहा बिचारत । सुनि-सुनि बात स्याम के मुख की उमँगि उठी ब्रजनारी । सूरदास प्रभु निरखि ग्वालि मुख तब भजि चले मुरारी ॥४२॥ अर्थ- श्याम उस गोपी के घर गये और उन्होने देखा कि दरवाजे पर कोई इधर-उधर है तो नहीं । यह देख कर घर के भीतर घुस गये । गोपी ने जब भगवान् को आते हुये जाना तो स्वयं भी छिप रही । सूने घर मे कृष्ण मथानी के पास चुप साध कर बैठ गये । उन्होंने मक्खन से भरा हुआ मटका देखा और उसे ले-लेकर खाने लगे । मणि के खम्भे में अपनी परछाईं देखी और उससे चतुरतापूर्वक बाते करने लगे । आज मैं पहली बार चोरी करने आया अच्छा साथ मिला । कृष्ण स्वयं खाते हैं, ५
६६ सूरसागर सार सटीक और अपनी परछायी को खिलाते हैं। जब मक्खन गिर जाता है तो कहते हैं, "क्या बात है ? यदि चाहो (मन में कहते है) तो पूरा मटका ही दे दूँ। बहुत मीठा है, क्यों गिराते हो ? तुम्हे देते हुये मुझे बहुत सुख हो रहा है, तुम अपने मन मे क्या सोच रहे हो ?" श्याम के मुख के इन बातो को सुनकर ब्रजांगना उमंग से भर उठी। सूरदास कहते हैं कि गोपी के मुख को देखकर मुरारि प्रभु श्रीकृष्ण भाग चले ॥४२॥ प्रथम करी हरि माखन-चोरी । ग्वालिनि मन इच्छा करि पूरन, आपु भजे ब्रज खोरी । मन मैँ यहै विचार करत हरि, ब्रज घर-घर सब जाऊँ । गोकुल जनम लियौ सुख-कारन, सबकैँ माखन खाऊँ । बाल-रूप जसुमति मोहिं जानै, गोपिनि मिलि सुख भोग । सूरदास प्रभु कहत प्रेम सौँ, ये मेरे ब्रज-लोग ॥४३॥ अर्थ—पहली बार भगवान् ने चोरी की। गोपी के मन की इच्छा पूरी करके वे ब्रज की गलियो मे भागे। भगवान् अपने मन में यही विचार करते हैं कि मैं ब्रज के सभी घरो मे जाऊँ तथा गोकुल मे जन्म लेने के सुख के फलस्वरूप सबका मक्खन खाऊँ । यशोदा मुझे बाल-रूप मे ही जाने और गोपियो मे मिलकर सुख का भोग करूँ । सूरदास कहते हैं कि भगवान् प्रेम से कहते हैं कि सभी ब्रजवासी अपने लोग है ॥४३॥ गोपालहिँ माखन खान दै । सुनि री सखी, मौन ह्वैँ रहिए, बदन दही लपटान दै । गहि बहियाँ हौँ लैके जैहैँ, नैननि तपति बुझान दै । याकौ जाइ चौगुनौ लैहौँ मोहिँ जसुमति लौ जान दै । तू जानति हरि कछु न जानत, सुनत मनोहर कान दै । सूर स्याम ग्वालिनि बस कीन्हो, राखतिँ तन मन प्रान दै ॥४४॥ अर्थ—(हे सखि) गोपाल श्रीकृष्ण को मक्खन खाने दो। हे सखी, सुनो मौन रहो, मुँह मे दही लिपटा रहने दो। मै बाँह पकड कर (यशोदा के पास) ले जाऊँगी (अभी) नेत्रो की जलन शान्त होने दो। मैं जाकर इसका (माखन का) चौगुना लूंगी मुझे यशोदा (के पास) तक जाने तो दो। तुम समझती हो कि कृष्ण कुछ नही जानते वे मन को हरने वाले कान लगाकर सुन रहे हैं। सूरदास कहते है कि श्याम ने गोपियो को अपने वश मे कर लिया है और वे तन मन और प्राण देकर (भी) उनकी रक्षा करती हैं ॥४४॥ जसुदा कहँ लैँ कीजै कानि । दिन प्रति कैसे सही परति है, दूध-दही की हानि । अपने या बालक की करनी, जौ तुम देखी आनि ।
गोकुल लीला ६७ गोरस खाइ, खवावै लरिकनि, भाजत भाजन भानि। मैंँ अपने मंदिर के कौनै राख्यो माखन छानि। सोई जाइ तिहारैं ढोटा, लीन्हौ है पहिचानि। बूझि ग्वालि निज गृह मैंँ आयौ, नैंकुन संका मानि। सूर स्याम यह उत्तर बनायौ, चीँटी काढत पानि ॥४५॥ अर्थ—हे यशोदा कहाँ तक संकोच किया जाय। प्रतिदिन दूध और दही की यह हानि कैसे सही जाय। अपने इस बालक का कर्त्तव्य तुम आकर तो देखो। गोरस खाता है, लड़को को खिलाता है और बर्तन तोड़ कर भाग जाता है। मैंने अपने घर के कोने में मक्खन छिपाकर रखा था, उस स्थान को तुम्हारे लड़के ने जाकर पहचान लिया है। जब गोपी ने उनसे (दूसरे के घर मे आने का कारण) पूछा (तो उन्होंने) बिना किसी शंका के कहा कि मैं अपने घर मे आया हूँ। सूरदास कहते हैं कि (जब गोपियों ने यह पूछा कि मटके मे हाथ क्यो डाला तो) श्रीकृष्ण ने यह उत्तर बना लिया कि मैं हाथ से चीटियां निकाल रहा हूँ ॥४५॥ आपु गए हरुएँ सुनैं घर। सखा सबै बाहिर ही छोड़ै, देख्यौ दधि-माखन हरि भीतर। तुरत मथ्यौ दधि-माखन पायौ, लै-लै खात, धरत अधरनि पर। सैन देइ सब सखा बुलाए, तिनहिं देत भरि-भरि अपनैं कर। छिटकी रहीं दधि-बूँदि हृदय पर, इत-उत चितवत करि मन मैंँ डर। उठत ओट लै लखत सबनि कौं, पुनि लै खात लेत ग्वालनि बर। अंतर भई ग्वालि वह देखति मगन भई, अति उर आनंद भरि। सूर स्याम मुख निरखि थकित भई, कहत न बनै, रही मन दै हरि ॥४६॥ अर्थ—श्रीकृष्ण धीरे से सूने घर में प्रवेश कर गये। भगवान् ने सभी साथियों को बाहर छोड़ दिया और घर के भीतर जाकर दही और मक्खन देखा। तुरन्त का मथा हुआ (ताजा) दही और मक्खन पाया तो उसे लेकर खाने लगे और होठों पर रखने लगे। कृष्ण ने संकेत दे कर अपने सभी साथियो को बुला लिया और उन्हे अपने हाथ से भर-भर कर देने लगे। दही की बूंदें हृदय पर छिटक गयी हैं इसीलिये कृष्ण इधर-उधर देखकर मन मे बहुत भयभीत होते है। वे उठकर ओट लेकर चारो ओर सबको देख लेते हैं तथा फिर (दही आदि) लेकर खाने लगते हैं। पुनः ग्वालो से भी वलात् (मांखन) लेते है। गोपी को यह देखते हुए कुछ समय बीता और वह हृदय मे आनन्दित होकर मग्न हो गयी। सूरदास कहते हैं कि गोपी श्याम के मुख को देख कर स्तब्ध हो गयी, उससे कुछ कहते नही बना और उसने श्याम को अपना मन ही समर्पित कर दिया ॥४६॥ जान जु पाए हौं हरि नीकैं। चोरि-चोरि दधि माखन मेरौ, नित प्रति गीधि रहे हो छीकैं।
६८ सूरसागर सार सटीक रोक्यौ भवन-द्वार ब्रज-सुन्दरि, नूपुर मूँदि अचानक ही कै। अब कैसे, जैयतु अपने बल, भाजन भाँजि, दूध दधि पी कै? सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी कै। भरि गंडूप, छिरकि दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कीकै ॥४७॥ अर्थ—हे हरि आज मैं तुमको अच्छी तरह जान पाई हूँ। प्रतिदिन मेरा दही और मक्खन चुरा कर इस सीके पर परच गये हो। (ऐसा कहकर) ब्रज युवती ने अचानक ही नूपुर की आवाज बन्द करके (कृष्ण को) भवन के दरवाजे पर रोका। (और कहा) अब अपने बल पर दूध, दही पीकर तथा वर्तनो को तोडकर कैसे जाओगे। सूरदास कहते हैं (गोपी ने कहा) कि हे प्रभु आप अच्छे बन्धन मे पड़े, अब मैं (अपने) प्राणप्रिय को जाने नहीं दूँगी। कृष्ण ने चुल्लू (मे दही) भर कर (गोपी की) आंख पर छिडक दिया और कीक देकर (जोर से चिल्ला कर) भाग निकले ॥४७॥ अब ये झूठहु बोलत लोग। पांच बरष अरु कछुक दिननि कौ, कब भयो चोरी जोग। इहिं मिस देखन आवति ग्वालिनि, मुँह फाटे जु गँवारि। अनदोषे कौं दोष लगावतिं, दई देइगौ टारि। कैसेँ करि याकी भुज पहुँची, कौन वेग ह्याँ आयौ? ऊखल ऊपर आनि, पीठि दै, तापर सखा चढ़ायौ। जौ न पत्याहु, चलो सँग जसुमति, देखौ नैन निहारि। सूरदास प्रभु नैकुँ न बरजी, मन में महरि विचारि ॥४८॥ अर्थ—(मां यशोदा कृष्ण की शिकायत सुनकर कहती है) अब ये लोग झूठ भी बोलने लगे हैं। (मेरा कृष्ण) पांच वर्ष और कुछ ही दिनो का है, यह चोरी करने योग्य हुआ कब ? ये मुंहफट, गँवारिन गोपियां इसी बहाने कृष्ण को देखने आती हैं। निर्दोष को दोष लगाती हैं। क्या भगवान् इस दोष को छोड़ देगे? कैसे इसका हाथ (सीके पर) पहुँचा और कितनी जल्दी यह यहाँ भाग आया ? (तब गोपी कहती हैं कि) ऊखल के ऊपर आकर पीठ का सहारा देकर उस पर साथियो को चढा दिया। हे यशोदा यदि विश्वास न हो तो चल कर अपनी आंखो से देखो। सूरदास कहते हैं (गोपी ने कहा कि हे यशोदा) तुम कृष्ण को बिलकुल नही रोकती। तब यशोदा मन- ही-मन विचार करने लगी ॥४८॥ इन अखियनि आगैं तै मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे। हौं बलि गई, दरस देखें बिनु तलफत है नैननि के तारे। औरौ सखा बुलाइ आपने इहिं आँगन खेलौ मेरे बारे। निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं, सुन्दर बाल-विनोद तिहारे। मधु, मेवा, पकवान, मिठाई व्यंजन खाटे, मीठे, खारे। सूर श्याम जोइ-जोइ तुम चाहौ, सोइ-सोइ माँगि लेहु मेरे बारे ॥४६॥
गोकुल लीला ६६ अर्थ - (मां यशोदा कृष्ण से कहती हैं) हे मोहन, तुम इन आंखो के आगे से एक पल के लिये भी अलग न रहो । मेरी आंखों के तारे कृष्ण तुम्हें देखे बिना मेरे नेत्र तडपते हैं। मेरे प्रिय श्रीकृष्ण अपने अन्य साथियों को भी बुला कर इसी आंगन मे खेला करो जिससे तुम्हारी बाल क्रीडाओ को मैं सांप की मणि की भांति देखती रहूँ । सूरदास कहते हैं कि (मां यशोदा ने कहा कि) हे श्याम मधु, मेवा, पकवान, मिठाइयां, खट्टे-मीठे और खारे भोजन (पटरस-व्यंजन) तुम जो-जो चाहो वही मुझसे मांग लो ॥४६॥ चोरी करत कान्ह धरि पाए । निसि-बासर मोहिं बहुत सतायौ अब हरि अरि हाथहिं आए । माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही । अब तो घात परे हौ लालन, तुम्हैं भलैं मैं चीन्ही । दोउ भुज पकरि, कह्यौ कहँ जैहौ माखन लेउँ मँगाइ । तेरी सौं मैं नेकुँ न खायौ, सखा गये सब खाइ । मुख तन चितै, विहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ । लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ ॥५०॥ अर्थ—एक गोपी ने कृष्ण को चोरी करते हुये पकड़ लिया । (वह कहने लगी) हे हरि तुमने मुझे रात-दिन बहुत सताया और अब हाथ मे आये हो । तुम मेरा सारा दही और मक्खन खा गये, तुमने बहुत शरारतें की । हे लाल, अब तुम मौके से मिले हो और मैंने तुम्हे भली-भांति पहचान लिया है । तब गोपी ने कृष्ण की दोनों भुजाये पकड़ कर कहा अब तुम कहां जाओगे ? तुमने जितना मक्खन खाया है उतना (अभी तुम्हारे घर से) मँगा लूं । कृष्ण उत्तर देते है तुम्हारी सौगन्ध मैंने विलकुल नही खाया, सभी साथी खा गये । उसके मुंह की ओर देखकर भगवान् (कृष्ण) ने मुस्करा दिया तब उस (गोपी) का क्रोध समाप्त हो गया । ग्वालिन ने श्याम को हृदय से लगा लिया, सूरदास (उस शोभा पर) बलि जाते हैं ॥५०॥ कान्हहिं बरजति किन नँदरानी । एक गाउँ कैं बसत कहाँ लौं करैं नंद की कानी । तुम जो कहति हौ, मेरो कन्हैया, गङ्गा कैसो पानी । बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट घाट कौ दानी । बचन विचित्र, कमल-दल लोचन, कहत सरस बर बानी । अचरज महरि तुम्हारे आगैं अबै जीभ तुतरानी । कहँ मेरी कान्ह, कहाँ तुम ग्वारिनि, यह विपरीति न जानी । आवति सूर उरहने कैं मिस, देखि कुँवर मुसुकानी ॥५१॥