सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० सूरसागर सार सटीक (यह कह कर मां यशोदा ने) उवटन और तेल का सामान पीछे रख दिया । मां यशोदा अनेक प्रकार से विनती करती है, किन्तु कृष्ण नहीं मानते । सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण (स्नान करने के बिलकुल) विरुद्ध हो गये तथा उनका अन्त सुर और मुनि भी नही पा सके ॥२८॥ ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, हरिहिं लिए चंदा दिखरावत । रोवत कत बलि जाऊँ तुम्हारी, देखौँ धौ भरि नैन जुड़ावत । चितै रहै तब आपुन ससि-तन अपने कर लै-लै जु बतावत । मीठौ लगत किधौं यह खाटौ, देखन अति सुन्दर मन भावत । मनहीँ मन हरि बुद्धि करत हैं, माता सौँ कहि ताहिं मँगावत । लागी भूख, चंद मैँ खैहौँ; देहि देहि रिस करि विरुझावत । जसुमति कहति कहा मैँ कीनौँ रोवत मोहन अति दुख पावत । सूर स्याम कौँ जसुमति बोधति, गगन चिरैया उड़त दिखावत ॥२६॥ अर्थ - यशोदा अपने आँगन मे खडी होकर भगवान् को (गोद मे) लेकर चन्द्रमा दिखाती हैं। (और उनसे कहती हैं कि) क्यो रो रहे हो मै तुम्हारी बलिहारी हूँ तुम्हे देखकर मेरे नेत्र शीतल (तृप्त) हो जाते है। तब श्री कृष्ण स्वयं चन्द्रमा की ओर देखकर हाथ (से इशारा) बनाकर कहते है कि यह मीठा हो अथवा खट्टा, देखने मे अत्यन्त सुन्दर तथा मन को मोहित करने वाला है। मन-ही-मन (भगवान् श्री कृष्ण) बाल- बुद्धि (का स्वाग) रचते है और माँ (यशोदा) से कहकर उस (चन्द्रमा) को (पृथ्वी पर) मँगाते है। मुझे भूख लगी है मैं चन्द्रमा खाऊँगा इस प्रकार (कृत्रिम) क्रोध करके (माँ यशोदा को) उलझन मे डाल देते हैं। यशोदा कहती हैं कि यह मैने क्या किया कृष्ण रोते हुए बहुत दुख पा रहे है। सूरदास कहते हैं कि (इस प्रकार हठ मे पडे हुए) श्याम को यशोदा समझाती हैं और आकाश मे उडती चिडियाँ उन्हे दिखला रही हैं ॥२६॥ सुनि सुत, एक कथा कहौँ प्यारी । कमल-नैन मन आनंद उपज्यों, चतुर सिरोमनि देत हुँकारी । दसरथ नृपति हुतौ रघुबंसी, ताकै प्रगट भए सुत चारी । तिनमैँ मुख्य राम जो कहियत, जनक सुता ताकी बर नारी । तात-बचनलगि राज तज्योतिन, अनुज घरनिसँग गए बनचारी । धावत कनक मृगा के पाछै, राजिव लोचन परम उदारी । रावन हरन-सिया कौ कीन्हौ, सुनि नंद-नंदन नींद निंवारी । चाप चाप कहि उठे सूर प्रभु, लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी ॥३०॥ अर्थ - (मां यशोदा कृष्ण से कहती है कि) हे पुत्र मैं एक अच्छी कहानी कह रही हूँ। कमलनेत्र (श्री कृष्ण) के मन मे (अत्यन्त) आनन्द प्राप्त हुआ और चतुर शिरोमणि (श्रीकृष्ण) हुँकारी (कथा सुनते समय हां, हां की उक्ति) देते हैं। रघुवश मे दशरथ नाम के एक राजा हुये उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये । उनमे मुख्य जिन्हे राम