भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ५६ काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुइँ लोटी। काचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी। सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥२६॥ अर्थ - (कृष्ण यशोदा से शिकायत करते हैं) माँ (मेरी) चोटी कब बड़ी होगी ? मुझे कितना समय दूध पीते हो गया और यह आज भी छोटी ही है। तुम तो कहती हो कि यह बलराम की वेणी की भांति लम्बी और मोटी होगी। काढ़ते, गुहते तथा स्नान करते समय नागिन की तरह पृथ्वी पर लोटने लगेगी। तुम बार-बार मुझे कच्चा दूध पिलाती हो तथा मक्खन और रोटी नही देती हो। सूरदास कहते है कि कृष्ण और बलराम दोनो भाइयो की जोड़ी चिरंजीवी हो ॥२६॥ हरि अपनैं आँगन कछु गावत । तनक-तनक चरननि सौँ नाचत, मनहिँ मनहिँ रिझावत । बाँह उठाइ काजरी-धौरी, गैयनि टेरि बुलावत । कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत । माखन तनक अपनैं कर लै, तनक बदन मैं नावत । कबहुँक चितै प्रतिबिंब खंभ मैं, लौनी लिए खवावत । दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष आनंद बढ़ावत । सूर स्याम के बाल चरित, नित नितही देखत भावत ॥२७॥ अर्थ- कृष्ण अपने आँगन मे कुछ गा रहे हैं। छोटे-छोटे चरणो से वह नाचते हैं तथा मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं। बांह उठाकर कजरी (काले रंग की) और धौरी (सफेद रंग की) नाम की गायों को जोर से बुलाते हैं। कभी नन्द बाबा को पुकारते है और कभी घर मे आते हैं। (कभी) अपने छोटे-छोटे हाथो मे मक्खन लेकर अपने छोटे मुँह में डालते हैं। कभी खम्भे मे अपनी परछाईं देखकर नवनीत लेकर उसे खिलाते हैं। यशोदा छिपकर उनकी यह लीला देखती है जो कि हर्ष और आनन्दवर्द्धक है। सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण का बालचरित्र प्रतिदिन ही देखने मे अच्छा लगता है ॥२७॥ जसुमति जबहि कह्यौ अन्हवावन, रोइ गए हरि लोटत री । तेल उबटनौ लै आगैं धरि, लालहिँ चोटत पोटत री । मैं बलि जाऊँ न्हाउ जनि मोहन, कत रोवत बिनु काजैं री । पाछे धरि राख्यो छपाइ कै, उबटन-तेल-समाजें री । महरि बहुत बिनती करि राखति, मानत नहीँ कन्हैया री । सूर स्याम अतिहीँ बिरझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री ॥२८॥ अर्थ - यशोदा ने जब कृष्ण को नहलाने की बात कही तो वे रोते हुए (पृथ्वी पर) लोट गये । तेल और उबटन आगे रखकर (माँ यशोदा) लाल श्री कृष्ण को लाड- प्यार करती है। मोहन मैं बलिहारी हूँ तुम मत नहाओ, व्यर्थ में ही क्यों रो रहे हो।