सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ६१ कहा जाता था उनकी श्रेष्ठ पत्नी जानकी जी थी । वे पिता की आज्ञा मानकर भाई (लक्ष्मण) और पत्नी सहित वन चले गये । कमलनेत्र वाले परम उदार रामचन्द्र जी स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते है इसी समय रावण ने सीता का हरण कर लिया । यह (कहानी) सुन कर नन्द सुत (कृष्ण) की नीद दूर हो गयी । सूरदास कहते हैं भगवान् कृष्ण चौंक कर यह कहने लगे कि 'लक्ष्मण धनुष दो, धनुष दो।' माँ को (कृष्ण की यह बात सुनकर) बहुत भ्रम हुआ ॥३०॥ जागौ, जागौ हो गोपाल । नाहिं इतौ सोइयत सुनि सुत, प्रात परम सुचि काल । फिरि-फिरि जात निरखि मुख छिन छिन, सब गोपनि के बाल । बिन बिकसे कल कमल-कोष तैं मनु मधुपनि की माल । जो तुम मोहिं न पत्याहु सूर प्रभु, सुन्दर स्याम तमाल । तौ तुमहीं देखौ आपुन तजि निद्रा नैन बिसाल ॥३१॥ अर्थ-(माँ यशोदा कृष्ण को जगाते हुए कहती है) हे गोपाल जागिये । हे पुत्र सुनो इस प्रातःकालीन अत्यन्त पवित्र समय मे नही सोना चाहिये । सभी बाल-गोपाल एक-एक क्षण पर तुम्हारा मुख देखकर (उसी प्रकार) वापस चले जाते है, जैसे कमल की कली के पराग कोष को खिला हुआ न पाकर भ्रमरो की पंक्तियां (निराश लौट जाती हैं) । सुन्दर तमाल वृक्ष की भाँति श्याम वर्ण वाले सूर के प्रभु यदि मेरा विश्वास न हो तो नीद छोड़कर अपने विशाल नेत्रो से तुम स्वय देखो ॥३१॥ कमल-नैन हरि करौ कलेवा ।' माखन-रोटी, सद्य जम्यौ दधि, भाँति-भाँति के मेवा । खारिक, दाख, चिरौंजी, किसमिस, उज्ज्वल गरी बदाम । सफरी, सेव, छुहारे, पिस्ता, जे तरबूजा नाम । अरु मेवा बहु भाँति-भाँति हैं षटरस के मिष्ठान्न । सूरदास प्रभु करत कलेवा, रीझे स्याम सुजान ॥३२॥ अर्थ-कमलनेत्र, भगवान् श्री कृष्ण प्रातःकालीन अल्पाहार कीजिये । मक्खन और रोटी, तुरन्त जमा हुआ दही, अनेक प्रकार के मेवे, छुहारा, द्राक्षा, चिरौंजी किशमिस, श्वेत गरी (नारियल), बादाम, अमरूद, सेव, छुहारा, पेश्ता, तरबूज और अन्य प्रकार के बहुत से मेवे छः रसों से युक्त मिष्ठानो को पाकर सर्वज्ञ भगवान् कलेवा करते हैं और मन-ही-मन प्रसन्न होते है ॥३२॥ मैया मोहिं दाउ बहुत खिजायौ । मोसों कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ । कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात ।