सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सूरसागर सार सटीक पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात। गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात। चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात। तू मोहीँ कौँ मारन सीखी, दाउहिँ कबहुँ न खीझै। मोहन मुख रिस की ये बातैँ, जसुमति सुनि-सुनि रीझै। सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत। सूर स्याम मोहि गोधन की सौँ, हौँ माता तू पूत ॥३३॥ अर्थ - (कृष्ण मां से बलराम की शिकायत करते हुए कहते है) मां मुझे बलराम ने बहुत चिढ़ाया। मुझसे कहते हैं कि तुम मोल लिए गये हो, तुम्हे यशोदा ने कब जन्म दिया। क्या करूं इसी क्रोध के कारण मैं खेलने नही जाता। (बलराम) बार-बार कहते है कि तुम्हारी मां कौन है और तुम्हारे पिता कौन है। नन्द गोरे हैं, यशोदा (भी) गोरी हैं तुम्ही क्यो सावले शरीर वाले हो ? सभी ग्वाले चुटकी बजाकर हंसते है और बलराम उन्हे (यही) सिखा देते है। तुम हमेशा मुझे ही मारना जानती हो भैया पर कभी क्रोध नही करती। श्री कृष्ण के मुख से ये क्रोधपूर्ण बाते सुनकर यशोदा (मन- ही-मन) प्रसन्न होती है और (कृष्ण से) कहती है कृष्ण, सुनो, बलराम चुगली करने वाला और जन्म से ही धूर्त है। सूरदास कहते है कि (मां यशोदा ने कहा कि) मुझे गोधन (गायो की सम्पत्ति) की शपथ है मैं (तुम्हारी) मां हूँ और तुम (मेरे) पुत्र हो ॥३३॥ खेलन दूरि जात कत कान्हा। आजु सुन्यौ मैं हाउ आयौ, तुम नहिँ जानत नान्हा। इक लरिका अबहीँ भजि आयौ, रोवत नहिँ देख्यौ ताहि। कान तोरि वह लेत सबनि के, लरिका जानत जाहि। चली न, बेगि सबारै जैये, भाजि आपनैं धाम। सूर स्याम यह बात सुनतही बोलि लिए बलराम ॥३४॥ अर्थ-हे कृष्ण, दूर खेलने क्यो जा रहे हो ? मैंने आज सुना है कि 'होवा' आया है तुम छोटे हो (इसलिए) नही जानते। एक लड़का अभी भागता हुआ आया है, मैंने उसे रोता हुआ देखा। जिसे लड़का समझता है वह (होवा) सबके कान तोड लेता है चलो न, आज सबेरे ही (शीघ्र हो) अपने घर भाग चले। सूरदास जी कहते हैं कि श्याम ने यह बात सुनते ही बलराम को (अपने साथ) बुला लिया ॥३४॥ खेलत मैँ को काको गुसैयाँ। हरि हारे जीते सुदामा, बरबस हीँ कत करत रिसैयाँ। जाति पाँति हमतैँ बड़ नाहीँ, नाहीँ बसत तुम्हारी छैयाँ। अति अधिकार जनावत यातै, जातैँ अधिक तुम्हारे गैयाँ। रूठहि करै तासौँ को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ ग्वैयाँ। सूरदास प्रभु खेल्यीइ चाहत, दाउँ दियौ करि नद-दुहैयाँ ॥३५॥