भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

गोकुल लीला ६३ अर्थ-खेलने में कौन किसका स्वामी होता है। भगवान् कृष्ण हार गये और श्रीदामा जीत गये, (इस पर श्रीकृष्ण हार नही मानते और क्रोध करते हैं। श्रीदामा भी रुष्ट हो-हो कर कहते हैं कि) बलपूर्वक क्रोध क्यों करते हो जाति-पांति मे भी तो हमसे बड़े नही हो न तो हम तुम्हारी छाया मे ही रहते हैं। क्या तुम्हारे पास कुछ अधिक गाएँ है इसीलिए अधिक अधिकार दिखा रहे हो। जो खेल मे रूठता है उसके साथ कौन खेले ? (ऐसा कहकर) सभी साथी जहां-तहां बैठ गये। सूरदास कहते हैं कि भगवान् खेलना चाहते थे इसलिए नन्द की दुहाई देकर दाँव दिया (पारी दी) ॥३५॥ हरि कौँ टेरति है नँदरानी । बहुत अवार भई कहँ खेलत रहे, मेरे सारँग पानी ? सुनतहिँ टेर, दौरि तहँ आए, कब के निकसे लाल । जेँवत नहीँ नंद तुम्हरै बिनु, बेगि चलौ, गोपाल । स्यामहिँ ल्‍याई महरि जसोदा, तुरतहिँ पाइँ पखारे । सूरदास प्रभु संग नंद कैँ, बैठे हैं, दोउ वारे ॥३६॥ अर्थ-नन्दरानी (यशोदा) भगवान् कृष्ण को पुकारती है। मेरे सारंगपाणि, बहुत देर हुयी कहाँ खेल रहे हो ? माता की पुकार सुनकर (कृष्ण) वहाँ दौड़कर आ गये। (यशोदा ने कहा) हे लाल कब से निकले हो ? तुम्हारे बिना नन्द भोजन नही कर रहे हैं। हे गोपाल शीघ्र चलो। श्याम को लाकर मां यशोदा ने तुरन्त ही उनका पैर धोया। सूरदास कहते है कि नन्द के साथ (उनके) दोनो बालक (बलराम और कृष्ण) बैठे है ॥३६॥ जेँवत कान्ह नद इकठौरे । कछुक खात लपटात दोऊ कर, बालकेलि अति भोरे । वरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे । तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे । फूँकति वदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाइ अँकोरे । सूर स्याम कौँ मधुर कौर दै, कीन्हे तात निहोरे ॥३७॥ अर्थ--कृष्ण और नन्द एक ही स्थान पर भोजन कर रहे है। अत्यन्त भोले, शीघ्र ही कृष्ण कुछ खाते हैं, और दोनो हाथो मे लपेट लेते हैं। वरो का कौर उन्होने मुख मे डाला (और उसमे पड़ी हुई) मिर्च को दाँतो ने टटोल लिया। मिर्च तेज लगी उनकी आंखे डबडबा आईं और वे रोते हुये बाहर दौड पडे। रोहिणी उन्हे गोद मे उठाकर खड़ी होकर उनका मुँह फूंकती है। सूरदास कहते है कि पिता ने (नन्द ने) मीठा ग्रास देकर उनको अनुकूल किया ॥३७॥ मोहन काहेँ न उगिलौ माटी । वार-वार अनरुचि उपजावति, महरि हाथ लिए साँटी । महतारी सौँ मानत नाहीं, कपट-चतुरई ठाटी । १