सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ सूरसागर सार सटीक
वदन उधारि दिखायौ अपनौ, नाटक की परिपाटी । बड़ी वार भई लोचन उघरे, भ्रम-जवनिका फाटी । सूर निरखि नँदरानि भ्रमित भई, कहति न मीठी-खाटी ॥३८॥
अर्थ—(मां यशोदा कृष्ण को मिट्टी खाने से रोकती हैं) हे मोहन, तुम मिट्टी क्यो नही उगलते ? मां हाथ मे छडी लेकर मिट्टी खाने मे अरुचि उत्पन्न करती है किन्तु वे मां का कहना मानते ही नही और उन्होने अपनी कपटपूर्ण चतुरता को प्रदर्शित किया। अभिनय करते हुए उन्होने अपने मुँह को खोलकर दिखाया । (इस आश्चर्य को देखकर) मां यशोदा के नेत्र बहुत देर वाद खुले और भ्रम की यवनिका फट गई। सूर- दास कहते हैं कि कृष्ण के मुख को देखकर नन्दरानी भ्रमित हो गयी और उनके मुँह से मीठा-खट्टा (किसी प्रकार) का शब्द नही निकल सका ॥३८॥
नंद करत पूजा, हरि देखत । घट बजाइ देव अन्हवायौ, जल चंदन लै भेटत । पट अतर दै भोग लगायौ, आरति करी बनाई। कहत कान्ह, बाबा तुम अर्प्यौ, देव नहीँ कछु खाई । चितै रहे तब नंद महरि-मुख, सुनहु कान्ह की बात । सूर स्याम देवनि कर जोरहु, कुसल रहैं जिहिँ गात ॥३६॥
अर्थ—भगवान् (कृष्ण) नन्द को पूजा करते हुये देखते है। नन्द ने घण्टा बजाकर देवताओ को स्नान कराया तथा जल और चन्दन लेकर भेट स्वरूप समर्पित किया। वस्त्र की आड़ मे उनका भोग लगाया और सजाकर आरती की। कृष्ण ने कहा बाबा तुमने तो अर्पण कर दिया किन्तु भगवान् कुछ नही खाते । तब नन्द यशोदा के मुख की ओर देखने लगे और कहा कि कृष्ण की बात तो सुनो ! सूरदास कहते है (बाबा नन्द ने कहा) कि हे श्याम देवताओ को हाथ जोड़ो जिससे तुम्हारा शरीर कुशल पूर्वक रहे ॥३६॥
कहत नंद, जसुमति सोँ बात । कहा जानिए कह तै देख्यौँ, मेरौँ कान्ह रिसात । पाँच वरष को मेरौ कन्हैया, अचरज तेरी बात । बिनहीँ काज साँटि ले धावति, ता पाछै बिललात । कुसल रहैँ बलराम स्याम दोउ, खेलत-खात-अन्हात । सूर स्याम कौँ कहा लगावति, बालक कोमल गात ॥४०॥
अर्थ—नन्द यशोदा से बाते करते है कि तुमने मेरे कृष्ण को क्रोध करते हुए कहाँ से जाना और कहाँ से देखा। पाँच वर्ष का मेरा कृष्ण है और तुम्हारी बाते आश्चर्यजनक है। बिना किसी कार्य के ही बडबडाती हुई छडी लेकर उसके पीछे दौड़ती हो। बलराम और श्याम दोनो खेलते खाते नहाते कुशल-पूर्वक रहे। सूरदास