भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ६५ जी कहते हैं (नन्द ने यशोदा से कहा) कि कोमल अंग वाले श्रीकृष्ण को दोष क्यों लगाती हो ? ॥४०॥ माखन-चोरी मैया री, मोहिं माखन भावै । जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै । ब्रज-जुवती इक पाछै ठाढ़ी, सुनत स्याम की बात । मन-मन कहति कबहु अपने घर, देखौँ माखन खात । पैठे जाइ मथनियाँ कैं ढिग, मैं तब रहौं छपानी । सूरदास प्रभु अंतरजामीँ ग्वालिनि मन की जानी ॥४१॥ अर्थ- हे माँ, मुझे मक्खन ही अच्छा लगता है । यदि तू मेवा पकवान (आदि खाने के लिए) कहती हो तो मुझे नहीं रुचता । एक व्रजांगना पीछे खड़ी होकर कृष्ण की बात सुन रही है और अपने मन में ही कहती है कि मैं कभी इन्हें अपने घर माखन खाते हुए देखती (तो कितना अच्छा होता !) मैं तब छिपकर बैठ गयी और कृष्ण, मथानी के पास जाकर बैठ गये । सूरदास जी कहते हैं कि भगवान् अन्तर्यामी हैं उन्होने गोपी के मन की बात को जान लिया ॥४१॥ गए स्याम तिहिं ग्वालिनि कैं घर । देख्यौ द्वार नहीं कोउ, इत-उत चितैँ चले तब भीतर । हरि आवत गोपी जब जान्यौ, आपुन रही छपाइ । सूने सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ । माखन भरी कमोरी देखत लै-लै लागे खान । चितै रहे मनि-खंभ-छाँह तन, तासौँ करत सयान । प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग । आपु खात प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत, का रंग ? जौ चाहौ सब देउँ कमोरी, अति मीठो कत डारत । तुमहि देति मैं अति सुख पायौ,तुम जिय कहा बिचारत । सुनि-सुनि बात स्याम के मुख की उमँगि उठी ब्रजनारी । सूरदास प्रभु निरखि ग्वालि मुख तब भजि चले मुरारी ॥४२॥ अर्थ- श्याम उस गोपी के घर गये और उन्होने देखा कि दरवाजे पर कोई इधर-उधर है तो नहीं । यह देख कर घर के भीतर घुस गये । गोपी ने जब भगवान् को आते हुये जाना तो स्वयं भी छिप रही । सूने घर मे कृष्ण मथानी के पास चुप साध कर बैठ गये । उन्होंने मक्खन से भरा हुआ मटका देखा और उसे ले-लेकर खाने लगे । मणि के खम्भे में अपनी परछाईं देखी और उससे चतुरतापूर्वक बाते करने लगे । आज मैं पहली बार चोरी करने आया अच्छा साथ मिला । कृष्ण स्वयं खाते हैं, ५

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