सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ सूरसागर सार सटीक और अपनी परछायी को खिलाते हैं। जब मक्खन गिर जाता है तो कहते हैं, "क्या बात है ? यदि चाहो (मन में कहते है) तो पूरा मटका ही दे दूँ। बहुत मीठा है, क्यों गिराते हो ? तुम्हे देते हुये मुझे बहुत सुख हो रहा है, तुम अपने मन मे क्या सोच रहे हो ?" श्याम के मुख के इन बातो को सुनकर ब्रजांगना उमंग से भर उठी। सूरदास कहते हैं कि गोपी के मुख को देखकर मुरारि प्रभु श्रीकृष्ण भाग चले ॥४२॥ प्रथम करी हरि माखन-चोरी । ग्वालिनि मन इच्छा करि पूरन, आपु भजे ब्रज खोरी । मन मैँ यहै विचार करत हरि, ब्रज घर-घर सब जाऊँ । गोकुल जनम लियौ सुख-कारन, सबकैँ माखन खाऊँ । बाल-रूप जसुमति मोहिं जानै, गोपिनि मिलि सुख भोग । सूरदास प्रभु कहत प्रेम सौँ, ये मेरे ब्रज-लोग ॥४३॥ अर्थ—पहली बार भगवान् ने चोरी की। गोपी के मन की इच्छा पूरी करके वे ब्रज की गलियो मे भागे। भगवान् अपने मन में यही विचार करते हैं कि मैं ब्रज के सभी घरो मे जाऊँ तथा गोकुल मे जन्म लेने के सुख के फलस्वरूप सबका मक्खन खाऊँ । यशोदा मुझे बाल-रूप मे ही जाने और गोपियो मे मिलकर सुख का भोग करूँ । सूरदास कहते हैं कि भगवान् प्रेम से कहते हैं कि सभी ब्रजवासी अपने लोग है ॥४३॥ गोपालहिँ माखन खान दै । सुनि री सखी, मौन ह्वैँ रहिए, बदन दही लपटान दै । गहि बहियाँ हौँ लैके जैहैँ, नैननि तपति बुझान दै । याकौ जाइ चौगुनौ लैहौँ मोहिँ जसुमति लौ जान दै । तू जानति हरि कछु न जानत, सुनत मनोहर कान दै । सूर स्याम ग्वालिनि बस कीन्हो, राखतिँ तन मन प्रान दै ॥४४॥ अर्थ—(हे सखि) गोपाल श्रीकृष्ण को मक्खन खाने दो। हे सखी, सुनो मौन रहो, मुँह मे दही लिपटा रहने दो। मै बाँह पकड कर (यशोदा के पास) ले जाऊँगी (अभी) नेत्रो की जलन शान्त होने दो। मैं जाकर इसका (माखन का) चौगुना लूंगी मुझे यशोदा (के पास) तक जाने तो दो। तुम समझती हो कि कृष्ण कुछ नही जानते वे मन को हरने वाले कान लगाकर सुन रहे हैं। सूरदास कहते है कि श्याम ने गोपियो को अपने वश मे कर लिया है और वे तन मन और प्राण देकर (भी) उनकी रक्षा करती हैं ॥४४॥ जसुदा कहँ लैँ कीजै कानि । दिन प्रति कैसे सही परति है, दूध-दही की हानि । अपने या बालक की करनी, जौ तुम देखी आनि ।