सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ६७ गोरस खाइ, खवावै लरिकनि, भाजत भाजन भानि। मैंँ अपने मंदिर के कौनै राख्यो माखन छानि। सोई जाइ तिहारैं ढोटा, लीन्हौ है पहिचानि। बूझि ग्वालि निज गृह मैंँ आयौ, नैंकुन संका मानि। सूर स्याम यह उत्तर बनायौ, चीँटी काढत पानि ॥४५॥ अर्थ—हे यशोदा कहाँ तक संकोच किया जाय। प्रतिदिन दूध और दही की यह हानि कैसे सही जाय। अपने इस बालक का कर्त्तव्य तुम आकर तो देखो। गोरस खाता है, लड़को को खिलाता है और बर्तन तोड़ कर भाग जाता है। मैंने अपने घर के कोने में मक्खन छिपाकर रखा था, उस स्थान को तुम्हारे लड़के ने जाकर पहचान लिया है। जब गोपी ने उनसे (दूसरे के घर मे आने का कारण) पूछा (तो उन्होंने) बिना किसी शंका के कहा कि मैं अपने घर मे आया हूँ। सूरदास कहते हैं कि (जब गोपियों ने यह पूछा कि मटके मे हाथ क्यो डाला तो) श्रीकृष्ण ने यह उत्तर बना लिया कि मैं हाथ से चीटियां निकाल रहा हूँ ॥४५॥ आपु गए हरुएँ सुनैं घर। सखा सबै बाहिर ही छोड़ै, देख्यौ दधि-माखन हरि भीतर। तुरत मथ्यौ दधि-माखन पायौ, लै-लै खात, धरत अधरनि पर। सैन देइ सब सखा बुलाए, तिनहिं देत भरि-भरि अपनैं कर। छिटकी रहीं दधि-बूँदि हृदय पर, इत-उत चितवत करि मन मैंँ डर। उठत ओट लै लखत सबनि कौं, पुनि लै खात लेत ग्वालनि बर। अंतर भई ग्वालि वह देखति मगन भई, अति उर आनंद भरि। सूर स्याम मुख निरखि थकित भई, कहत न बनै, रही मन दै हरि ॥४६॥ अर्थ—श्रीकृष्ण धीरे से सूने घर में प्रवेश कर गये। भगवान् ने सभी साथियों को बाहर छोड़ दिया और घर के भीतर जाकर दही और मक्खन देखा। तुरन्त का मथा हुआ (ताजा) दही और मक्खन पाया तो उसे लेकर खाने लगे और होठों पर रखने लगे। कृष्ण ने संकेत दे कर अपने सभी साथियो को बुला लिया और उन्हे अपने हाथ से भर-भर कर देने लगे। दही की बूंदें हृदय पर छिटक गयी हैं इसीलिये कृष्ण इधर-उधर देखकर मन मे बहुत भयभीत होते है। वे उठकर ओट लेकर चारो ओर सबको देख लेते हैं तथा फिर (दही आदि) लेकर खाने लगते हैं। पुनः ग्वालो से भी वलात् (मांखन) लेते है। गोपी को यह देखते हुए कुछ समय बीता और वह हृदय मे आनन्दित होकर मग्न हो गयी। सूरदास कहते हैं कि गोपी श्याम के मुख को देख कर स्तब्ध हो गयी, उससे कुछ कहते नही बना और उसने श्याम को अपना मन ही समर्पित कर दिया ॥४६॥ जान जु पाए हौं हरि नीकैं। चोरि-चोरि दधि माखन मेरौ, नित प्रति गीधि रहे हो छीकैं।