भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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६८ सूरसागर सार सटीक रोक्यौ भवन-द्वार ब्रज-सुन्दरि, नूपुर मूँदि अचानक ही कै। अब कैसे, जैयतु अपने बल, भाजन भाँजि, दूध दधि पी कै? सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी कै। भरि गंडूप, छिरकि दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कीकै ॥४७॥ अर्थ—हे हरि आज मैं तुमको अच्छी तरह जान पाई हूँ। प्रतिदिन मेरा दही और मक्खन चुरा कर इस सीके पर परच गये हो। (ऐसा कहकर) ब्रज युवती ने अचानक ही नूपुर की आवाज बन्द करके (कृष्ण को) भवन के दरवाजे पर रोका। (और कहा) अब अपने बल पर दूध, दही पीकर तथा वर्तनो को तोडकर कैसे जाओगे। सूरदास कहते हैं (गोपी ने कहा) कि हे प्रभु आप अच्छे बन्धन मे पड़े, अब मैं (अपने) प्राणप्रिय को जाने नहीं दूँगी। कृष्ण ने चुल्लू (मे दही) भर कर (गोपी की) आंख पर छिडक दिया और कीक देकर (जोर से चिल्ला कर) भाग निकले ॥४७॥ अब ये झूठहु बोलत लोग। पांच बरष अरु कछुक दिननि कौ, कब भयो चोरी जोग। इहिं मिस देखन आवति ग्वालिनि, मुँह फाटे जु गँवारि। अनदोषे कौं दोष लगावतिं, दई देइगौ टारि। कैसेँ करि याकी भुज पहुँची, कौन वेग ह्याँ आयौ? ऊखल ऊपर आनि, पीठि दै, तापर सखा चढ़ायौ। जौ न पत्याहु, चलो सँग जसुमति, देखौ नैन निहारि। सूरदास प्रभु नैकुँ न बरजी, मन में महरि विचारि ॥४८॥ अर्थ—(मां यशोदा कृष्ण की शिकायत सुनकर कहती है) अब ये लोग झूठ भी बोलने लगे हैं। (मेरा कृष्ण) पांच वर्ष और कुछ ही दिनो का है, यह चोरी करने योग्य हुआ कब ? ये मुंहफट, गँवारिन गोपियां इसी बहाने कृष्ण को देखने आती हैं। निर्दोष को दोष लगाती हैं। क्या भगवान् इस दोष को छोड़ देगे? कैसे इसका हाथ (सीके पर) पहुँचा और कितनी जल्दी यह यहाँ भाग आया ? (तब गोपी कहती हैं कि) ऊखल के ऊपर आकर पीठ का सहारा देकर उस पर साथियो को चढा दिया। हे यशोदा यदि विश्वास न हो तो चल कर अपनी आंखो से देखो। सूरदास कहते हैं (गोपी ने कहा कि हे यशोदा) तुम कृष्ण को बिलकुल नही रोकती। तब यशोदा मन- ही-मन विचार करने लगी ॥४८॥ इन अखियनि आगैं तै मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे। हौं बलि गई, दरस देखें बिनु तलफत है नैननि के तारे। औरौ सखा बुलाइ आपने इहिं आँगन खेलौ मेरे बारे। निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं, सुन्दर बाल-विनोद तिहारे। मधु, मेवा, पकवान, मिठाई व्यंजन खाटे, मीठे, खारे। सूर श्याम जोइ-जोइ तुम चाहौ, सोइ-सोइ माँगि लेहु मेरे बारे ॥४६॥