सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ६६ अर्थ - (मां यशोदा कृष्ण से कहती हैं) हे मोहन, तुम इन आंखो के आगे से एक पल के लिये भी अलग न रहो । मेरी आंखों के तारे कृष्ण तुम्हें देखे बिना मेरे नेत्र तडपते हैं। मेरे प्रिय श्रीकृष्ण अपने अन्य साथियों को भी बुला कर इसी आंगन मे खेला करो जिससे तुम्हारी बाल क्रीडाओ को मैं सांप की मणि की भांति देखती रहूँ । सूरदास कहते हैं कि (मां यशोदा ने कहा कि) हे श्याम मधु, मेवा, पकवान, मिठाइयां, खट्टे-मीठे और खारे भोजन (पटरस-व्यंजन) तुम जो-जो चाहो वही मुझसे मांग लो ॥४६॥ चोरी करत कान्ह धरि पाए । निसि-बासर मोहिं बहुत सतायौ अब हरि अरि हाथहिं आए । माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही । अब तो घात परे हौ लालन, तुम्हैं भलैं मैं चीन्ही । दोउ भुज पकरि, कह्यौ कहँ जैहौ माखन लेउँ मँगाइ । तेरी सौं मैं नेकुँ न खायौ, सखा गये सब खाइ । मुख तन चितै, विहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ । लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ ॥५०॥ अर्थ—एक गोपी ने कृष्ण को चोरी करते हुये पकड़ लिया । (वह कहने लगी) हे हरि तुमने मुझे रात-दिन बहुत सताया और अब हाथ मे आये हो । तुम मेरा सारा दही और मक्खन खा गये, तुमने बहुत शरारतें की । हे लाल, अब तुम मौके से मिले हो और मैंने तुम्हे भली-भांति पहचान लिया है । तब गोपी ने कृष्ण की दोनों भुजाये पकड़ कर कहा अब तुम कहां जाओगे ? तुमने जितना मक्खन खाया है उतना (अभी तुम्हारे घर से) मँगा लूं । कृष्ण उत्तर देते है तुम्हारी सौगन्ध मैंने विलकुल नही खाया, सभी साथी खा गये । उसके मुंह की ओर देखकर भगवान् (कृष्ण) ने मुस्करा दिया तब उस (गोपी) का क्रोध समाप्त हो गया । ग्वालिन ने श्याम को हृदय से लगा लिया, सूरदास (उस शोभा पर) बलि जाते हैं ॥५०॥ कान्हहिं बरजति किन नँदरानी । एक गाउँ कैं बसत कहाँ लौं करैं नंद की कानी । तुम जो कहति हौ, मेरो कन्हैया, गङ्गा कैसो पानी । बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट घाट कौ दानी । बचन विचित्र, कमल-दल लोचन, कहत सरस बर बानी । अचरज महरि तुम्हारे आगैं अबै जीभ तुतरानी । कहँ मेरी कान्ह, कहाँ तुम ग्वारिनि, यह विपरीति न जानी । आवति सूर उरहने कैं मिस, देखि कुँवर मुसुकानी ॥५१॥