सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० सूरसागर सार सटीक जब वह सुरति होति उर अंतर, लागत काम वान की भाली। सूरदास प्रभु प्रीति पुरातन, सुमिरत दुसह सूर उर साली ॥२२॥ अर्थ-हे (पथिक) ! फिर (कृष्ण) ब्रज की बात नही चलायी। वही एक वार कमल नेत्र (कृष्ण) ने उद्धव के हाथ पत्रिका देकर भेजी थी। हे पथिक ! तुम्हारे पैर लगती हूँ; मथुरा जाओ जहां वनमाली (कृष्ण) हैं। द्वार पर से प्रत्यक्ष पुकार कर कहना (कि) यमुना में (कालीदह मे) पुनः काली (नाग) आ गया ! उस समय (कृष्ण की) वैसी (गहरी) कृपा थी, (उन) रसिक (कृष्ण ने) रुचि लेकर प्रेम का निर्वाह किया था। (हे सखी !) ऊँचे वृक्ष मे लगे पुष्प को मांगने पर गोद मे उठाकर अपने उत्संग (ऊपरी भाग, कंधो पर) बिठा लेते हैं (ताकि हम स्वयं अपने हाथ से तोड़ ले) ! जब हृदय मे वह स्मृति होती है (वह घटना याद आती है) तो काम के बाण की नोक (भाली) चुभती हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (कृष्ण) की प्रीति पुरानी (है) स्मरण करते ही असह्य पीड़ा (शूल) हृदय मे सालती (चुभती) है ॥२२॥ तुम्हरे देस कागद मसि खूटी। भूख प्यास अरु नीँद गई सब, विरह लरी तन लूटी। दादुर मोर पपीहा बोले, अवधि भई सब झूठी। पाछैं आइ तुम कहा करोगे, जब तन जैहै छूटी। राधा कहति संदेश स्याम सौं, भई प्रीति की टूटी। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, सखी करति है कूटी ॥२३॥ अर्थ- (जान पड़ता है) तुम्हारे देश में कागज (और) स्याही समाप्त हो गयी। (हमारी) भूख, प्यास, नींद, सब चली गई, विरह ने शरीर को लूट लिया। दादुर, मोर (तथा) पपीहा बोलने लगे; आने की अवधि सब झूठी हो गयी। बाद में आकर तुम क्या करोगे, जब शरीर छूट जायेगा। राधा श्याम से संदेश कहती है (कि) प्रेम खंडित हो रहा है। सूरदास के प्रभु ! तुम्हारे मिलन के विना सखियां (तुम्हारे विषय मे) कूट करती हैं (उपहास करती हैं) ॥२३॥ पथिक कह्यौ ब्रज जाइ, सुने हरि जात सिंधु तट। सुनि सब अँग भए सिथिल, गयौ नहिँ बज्र हियौ फट। नर नारी घर-घरनि सबै, यह करति बिचारा। मिलिहैं कैसी भाँति हमैं, अब नन्द कुमारा। निकट वसत हुती आस, कियौ अब दूरि पयाना। विना कृपा भगवान, उपाइ न सूरज आना ॥२४॥ अर्थ-(किसी) पथिक ने ब्रज जाकर कहा (कि), (उसने) सुना है (कि) हरि सिंधु के तट (द्वारिका) जा रहे है। (यह) सुनकर (गोपियो के) सब अंग शिथिल हो गये, (किन्तु) (उनका) वज्र (सा) (कठोर) हृदय फट नही गया। सभी घरों मे नर (तथा) नारियां यहो विचार करती है (कि) अब नन्द-कुमार (कृष्ण) किस तरह