भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारिका चरितं ३५३ मिलेंगे। (जब वे) निकट बसते थे तो मिलने की (कुछ) आशा थी, (किन्तु) अब तो (उन्होंने) दूर प्रस्थान कर दिया। कृष्ण की कृपा के बिना सूर अब कोई दूसरा उपाय नही ॥२४॥ नैना भए अनाथ हमारे । मदनगुपाल उहाँ तैं सजनी, सुनियत दूरि सिधारे । वै समुद्र हम मीन बापुरी, कैसेँ जीवैँ न्यारे । हम चातक वै जलद-स्याम-घन, पियतिँ सुधा-रस प्यारे । मधुरा बसत आस दरसन की, जोइ नैन मग हारे । सूरदास हमकौँ उलटी बिधि, मृतकहूँ, तैँ पुनि मारे ॥२५॥ अर्थ-गोपियां सोचती हैं कि हमारे नेत्र अनाथ हो गये। सुनती हूँ (कि) मदन गोपाल वहाँ से (भी) (कही) दूर चले गये। वे (कृष्ण) समुद्र हैं, हम वेचारी मछलियां हैं, (उनसे) अलग (होकर) कैसे जीवित रहे। हम चातक हैं, वे श्याम बादल हैं, (हम) प्रिय का अमृत-रस पीती रहती हैं। मथुरां में बसते हुए दर्शन की आशा थी, (किन्तु) रास्ता देखते नेत्र (अब) हार गये। सूरदास (कहते हैं) (कि) विधाता ने हमारे लिए उल्टी (स्थिति) (पैदा कर दी), मरे हुए को पुनः मारा (कृष्ण बिरह) में हम मरी सी थी ही, विधाता को इससे संतोष न हुआ, उसने हमें मार ही डाला ॥२५॥ उती दूर तैँ को आवै री । जासौँ कहि संदेस पठाऊँ, सो कहि कहन कहा पावै री । सिंधु कूल इक देस बसत है, देख्यौ सुन्यौ न मन धावै री । तहँ नव-नगर जु रच्यौ नंद-सुत, द्वारावति पुरी कहावै री । कंचन के बहु भवन मनोहर, रंक तहाँ नहिँ त्रन छावै री । ह्वाँ के बासी लोगनि कौँ क्यौं, ब्रज कौ बसिबौ मन भावै री । बहु बिधि करतिँ विलाप विरहिनी, बहुत उपायनि चित लावैँ री । कहा करौँ कहँ जाऊँ सूर प्रभु, को हरि पिय पै पहुँचावै री ॥२६॥ अर्थ - हे सखी ! उतनी दूर से (द्वारिका से) (भला) कौन आता है; जिससे कह कर (हम) (कृष्ण के पास) संदेश भेजे, वह (विधि) कहो, (हम) (अपना संदेश) कैसे कह पाये । समुद्र के किनारे एक देश बसता है । (उसे) न तो देखा है न सुना है (और) न मन (वहाँ तक) दौड़ पाता है (मन द्वारिका की कल्पना ही नही कर पाता) वहाँ नन्द के पुत्र (कृष्ण ने) नवीन नगर बसाया है जो द्वारिका पुरी कहलाता है। वहाँ सोने के बहुत से मनोहर भवन हैं, (वहाँ) (कोई व्यक्ति) दरिद्र (ही) नही है (जो) तृण से घर छाये । वहाँ के निवासी लोगो को ब्रज मे बसना क्यों अच्छा लगे । विरहिणियां बहुत प्रकार से विलाप करती हैं तथा बहुत (से) उपायों को (सोचने मे) चित्त लगाती हैं। सूर के प्रभु (को पाने के लिए) क्या करें, कहाँ जाये; हरि प्रिय (कृष्ण) के पास कौन पहुँचाए ॥२६॥