सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ सूरसागर सार सटीक हों कैसौँ के दरसन पाऊँ । सुनहु पथिक उहिँ देस द्वारिका, जौ तुम्हरैं सँग जाऊँ । बाहर भीर बहुत भूपनि की, बूझत वदन दुराऊँ । भीतर भीर भोग भामिनि की, तिहिँ ठाँ काहि पठाऊँ । बुधि बल जुक्ति जतन करि उहिं पुर, हरि पिय पै पहुँचाऊँ । अब वन वसि निसि कुंज रसिक बिनु, कौनैं दसा सुनाऊँ । श्रम कै सूर जाउँ प्रभु पासहिं, मन मैं भलैं मनाऊँ । नव-किसोर मुख मुरलि बिना, इन नैननि कहा दिखाऊँ ॥२७॥ अर्थ—मैं कैसे कृष्ण का दर्शन पाऊँ । हे पथिक ! सुनो, यदि तुम्हारे साथ उस द्वारिका देश को चलूं (तो) (वहाँ) बाहर (कृष्ण के प्रासाद के बाहर) बहुत से राजाओ की भीड (होगी); (उनके) पूछने पर (लज्जा से) मुख छिपा लूंगी (महल के) भीतर स्त्री (पत्नी-रुक्मिणी) के सुख-विलास ("भोग") की प्रचुरता (है), उस स्थान पर किसे भेजूँ । बुद्धि-बल (तथा) युक्तिपूर्ण यत्न करके उस नगर मे हरि प्रिय (कृष्ण) के पास अपना (संदेश) (कैसे) भेजूँ । (राधिका !) अब रसिक (कृष्ण) के बिना वन मे रहते हुए कुंज मे रात (के समय) अपनी दशा किसे सुनाऊँ । मुरली संयुक्त नव किशोर (कृष्ण) के मुख के बिना इन नेत्रो को क्या दिखाऊँ ? ॥२७॥ तातैं अति मरियत अपसोसनि । मधुराहू तैं गए सखी री, अब हरि कारे कोसनि । यह अचरज सु वड़ौ मेरैं जिय, यह छाँड़नि, वह पोषनि । निपट निकाम जानि हम छाँड़ी, ज्यौं कमान बिन गोसनि । इक हरि के दरसन बिनु मरियत, अरु कुविजा के ठोसनि । सूर सु जरनि कहा उपजी जो, दूरि होति करि ओसनि ॥२८॥ अर्थ—हे सखी ! अब मथुरा से भी काले कोसो (बहुत दूर) चले गये हैं, इसीलिए अफसोस (दुःख) से बहुत मर (बहुत कष्ट सह) रही हूँ। मेरे जी मे यह बड़ा आश्चर्य है कि (कहाँ तो) (कृष्ण का) वह पालन-पोषण (करना), (और कहाँ) अब इस प्रकार छोड़ देना ! बिना धनुपकोटि (दोनो नोको) के बिना जैसे धनुष कमान की भाँति उन्होंने हमे बिल्कुल निकम्मी समझकर छोड दिया है, एक तो हरि के दर्शन विना (मैं) मरती हूँ दूसरे कुब्जा के डाह (कुढन से) । सूरदास कहते हैं कि गोपियां कह रही हैं कि जो जलन उत्पन्न हो गई क्या वह ओस से दूर हो सकती ? ॥२८॥ माई री कैसे बनै हरि कौ ब्रज आवन । कहियत है मधुबन तैं सजनी, कियौ स्याम कहुँ अनत गवन । अगम जु पंथ दूरि दच्छिन दिसि, तहँ सुनियत सखि सिंधु लवन । अब हरि ह्वाँ परिवार सहित गए, मग मै मार्यौ कालजवन ।