सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारका चरित ३५७ से पुलकित (हुई) (तथा) उसकी चोली के बंद टूट गये । सूरदास (कहते हैं कि) नंद के पुत्र (से मिलने की) अभिलाषा से सुन्दर अनमोल स्त्री (राधा) हर्षित हो गयी ॥३८॥ राधा नैन नीर भरि आए । कब धौँ मिलैँ स्याम सुंदर सखि, जदपि निकट हैं आए । कहा करौँ किहिँ भाँति जाहुँ अब, पंख नहीं तन पाए । सूर स्याम सुन्दर घन दरसैँ, तन के ताप नसाए ॥३६॥ अर्थ—राधा के नेत्रों मे पानी भर आया। यद्यपि कृष्ण निकट आ गये हैं, (किन्तु) हे सखि ! श्यामसुन्दर न जाने कब मिलें । क्या करूँ किस तरह जाऊँ, शरीर में पंख (भी) (तो) नहीं हैं (कि उड़कर चली जाऊँ) । सूरदास (कहते है कि) श्याम सुंदर घन (कृष्ण) के देखने से (ही) (राधा के) शरीर का ताप नष्ट होगा ॥३६॥ अब हरि आइहैँ जनि सोचै । सुनु बिधुमुखी बारि नैननि तैँ, अब तू काहैँ मोचै । लै लेखनि मसि लिखि अपने, संदेसहिँ छाँड़ि सँकोचै । सूर सु बिरह जनाउ करत कत, प्रबल मदन रिपु पोचै ॥४०॥ अर्थ—अब हरि आयेगे (तू) चिन्ता मत कर । हे चन्द्रमुखी सुनो, अब तू नेत्रो से जल (आंसू) क्यो गिराती है ? लेखनी (तथा) स्याही लेकर अपने संदेश को संकोच छोड़कर लिख । सूरदास (कहते हैं कि) (अब) विरह शरीर मे क्यो प्रभाव जमा रहा है, (तथा) शत्रु, नीच कामदेव (क्यो) प्रबल (होता जा रहा है) ॥४०॥ पथिक, कहियौ हरि सौँ यह बात । भक्त बछल है बिरद तुम्हारौ, हम सब किए सनाथ । प्रान हमारे संग तिहारैँ, हमहूँ हैं अब आवत । सूर स्याम सौँ कहत संदेसौ, नैनन नीर बहावत ॥४१॥ अर्थ—हे पथिक ! हरि से यह बात कहना कि आपका यश भक्तवत्सलता का है, (आपने) हम सबों को सनाथ कर दिया है। हमारे प्राण तुम्हारे साथ (हैं), अब हम भी आती है। सूरदास (कहते है कि) श्याम से संदेश कहती हुई (गोपियाँ) नेत्रो से नीर बहाती हैं ॥४१॥ नंद जसोदा सब ब्रजवासी । अपने-अपने सकट साजिकै, मिलन चले अबिनासी । कोउ गावत कोउ बेनु बजावत, कोउ उतावल धावत । हरि दरसन की आसा कारन, बिबिध मुदित सब आवत । दरसन कियौ आइ हरि जू कौँ, कहत स्वप्न कै साँचौ । प्रेम मगन कछु सुधि न रही अँग, रहे स्याम रँग राँचौ ।