सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ सुरसागर सार सटीक जासों जैसी भाँति चाहिये, ताहि मिले त्यों धाइ । देस-देस के नृपति देखि यह, प्रीति रहे थरगाइ । उमँग्यौ प्रेम समुद्र दुहूँ दिसि, परिमिति कही न जाइ । सूरदास यह सुख सो जानैँ, जाकैँ हृदय समाइ ॥४२॥ अर्थ—नंद, यशोदा और सब ब्रजवासी अपनी-अपनी गाड़ियां सजाकर अविनाशी (कृष्ण) से मिलने चल पडे । कोई गाता है, कोई वंशी बजाता है (तथा) कोई उतावला (मस्त) होकर दौडता है। हरि दर्शन की आशा के लिए सभी प्रसन्न (होकर) आते हैं। (जब उन्होने) आकर हरि जी के दर्शन किये (तब वे) कहते हैं (कि) (यह) स्वप्न (है) या वास्तविकता (है) । प्रेम मे मग्न (होने के कारण) अंग की कुछ स्मृति (शेष) न रही; (वे सब) श्याम के रंग मे रंग गये । जिससे जिस तरह उचित था उससे उसी तरह (कृष्ण) दौड़कर मिले । देश-देश के राजा यह प्रेम देखकर चुप हो गये (किकर्तव्य हो गये) । दोनो दिशाओ से प्रेम का (ऐसा) समुद्र उमडा (कि) उसकी सीमा अकथ- नीय है। सूरदास कहते है (कि) इस सुख को वही जान सकता है जिसके हृदय मे (यह प्रेम) समा जाय (जो इसे मनोगत या समझ सके) ॥४२॥ तेरी जीवन मूरि मिलहि किन माई । महाराज जदुनाथ कहावत, तबहिँ हुते सिसु कुँवर कन्हाई । पानि परे भुज धरे कमल मुख, पेखत पूरव कथा चलाई । परम उदार पानि अवलोकत, हीन जानि कछु कहत न जाई । फिर-फिर अब सनमुखही चितवति, प्रीतिसकुच जानी जदुराई । अब हँसि भेंटहु कहि मोहिं निज-जन, बाल तिहारौ नंद दुहाई । रोम पुलक गदगद तन तीछन, जलधारा नैननि वरषाई । मिले सु तात, मात, बांधव सब, कुसल-कुसल करि प्रस्न चलाई । आसन देइ बहुत करी बिनती, सुत धोखै तब बुद्धि हिराई । सूरदास प्रभु कृपा करी अब, चितहिँ धरे पुनि करी बड़ाई ॥४३॥ अर्थ—(हे सखी !) तेरी जीवन बूटी (जिलाने वाली जडी : कृष्ण) क्यो नही मिलती ? (कारण यह है कि) तब (गोकुल मे जब थे) तो (वे) शिशु (रूप मे) "कन्हाई" (ही) थे, (किन्तु) (अब) (वे) महाराज यदुनाथ कहे जाते है ! (कृष्ण के) हाथ पडने (मिलने) पर (सभी ब्रजवासियों ने) (उनकी) भुजाओं (तथा) कमल मुख का स्पर्श किया; (उन्हें) देखते (ही) पूर्व-लीलाओं की चर्चा चलाई । (वे कृष्ण के) अत्यन्त श्रेष्ठ हाथों को देखते है, (अपने को) हीन (छोटा) जानकर (उनसे) (संकोच वश) कुछ कहते नही बनता । अब (वे) बार-बार (कृष्ण के) सम्मुख ही देखते हैं; (तब) यदुराय (कृष्ण) ने (उनका) प्रेम (पूर्ण) संकोच जान लिया । (कृष्ण ने कहा) अब हंसकर मुझे अपना जन कहकर भेंटो; नंद की दुहाई देकर (तुम से) कहता हूँ (कि) मैं तुम्हारा बालक (ही)