भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारका चरित ३५८

हूँ । (कृष्ण के) रोम पुलकित (हो गये), शरीर गदगद (हो गया) तथा नेत्रों से जल की तेज (तीक्ष्ण) धारा बरस पडी । (वे) पिता-माता, तथा सभी बंधुओं से मिले (तथा) (सब से) कुशल प्रश्न की (चर्चा) की (सब से अलग अलग कुशलता की बात पूछी) । (उन्हे) आसन देकर (बिठाकर) (कृष्ण ने) बहुत विनती की (और कहा) उस समय- जब हम (ब्रज में थे) तब पुत्र के भ्रम मे (अर्थात् मुझे पुत्र मान लेने के कारण) (तुम्हारी) बुद्धि खो गई थी । सूरदास के प्रभु (कृष्ण) ने अब कृपा की, (नंद-यशोदा को) चित्त मे धारण किया; पुनः (उनकी) प्रशंसा की ॥४३॥ माधव या लगि है जग जीजत । जातैं हरि सौं प्रेम पुरातन, बहुरि नयौ करि लीजत । कहँ ह्वौ तुम जदुनाथ सिंधु तट, कहँ हम गोकुल बासी । वह बियोग, यह मिलन कहाँ अब, काल चाल औरासी । कहँ रबि राहु कहाँ यह अवसर, बिधि संयोग बनायौ । उहिँ उपकार आजु इन नैननि, हरि दरसन सचुपायौ । तब अरु अब यह कठिन परम अति, निमिषहुँ पीर न जानी । सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी ॥४४॥ अर्थ—हे माधव ! इसीलिए संसार जीता है (संसार अभी तक स्थित है) । चूंकि हरि से (हमारा) प्रेम पुराना है (जन्म-जन्मान्तर का है), (इसलिए) (हम) (उसे) फिर नया कर लेते हैं । कहां तुम सिंधु के किनारे (रहने वाले) (महाराजा) यदुनाथ; (और) कहां हम गोकुल (गांव) के निवासी ! कहां वह (महान्) (दुखदायी) वियोग, (और) कहां अब यह (अत्यन्त सुखदायक) मिलन ! (सचमुच) काल की गति विलक्षण है। कहां सूर्य (और) राहु (दोनों) मे कोई सम्बन्ध नही (तथा) कहां (आज) यह अवसर (जब सूर्य राहु द्वारा ग्रसित हो रहा है); ब्रह्मा ने (यह) संयोग (सूर्यग्रहण) बनाया है। उसी (ब्रह्मा) की कृपा से आज (हमारे) इन नेत्रो ने कृष्ण के दर्शन पाकर सुख पाया । तब और अब (दोनो अवसरों पर) यह अत्यधिक कठिन है (आसानी से समझ में नही आता), (किन्तु अब तो) क्षण मात्र के लिए भी पीडा नही जान पड़ी । सूरदास के प्रभु ने (उन्हे) अपना जन (भक्त) जानकर सभी से रुचिकर व्यवहार किया (प्रेम प्रदर्शित किया) ॥४४॥ राधा कृष्ण मिलन हरि सौं बूझति रुकमिनी इनमैं, को बृषभानु किसोरी । बारक हमैं दिखावहु अपने, बालापन की जोरी । जाकौ हेत निरंतर लीन्हे, डोलत ब्रज की खोरी । अति आतुर ह्वै गाइ दुहावन, जाते पर-घर चोरी । रचते सेज स्वकर सुमननि की, नव-पल्लव पुट तोरी । बिन देखें ताके मन तरसैं, छिन बीतै जुग कोरी ।