सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूर सोच सुख करि भरि लोचन, अंतर प्रीति न थोरी। सिथिल गात मुख बचन फुरत नहिं, ह्वै जु गई मति भोरी ॥४५॥ अर्थ—हरि से रुक्मिणी पूछती हैं (कि) इनमें वृषभानु की पुत्री (राधा) कौन है ? एक बार (तो) जरा हमे अपने बचपन की जोड़ी (संगिनी) दिखाओ; जिस (राधा) के प्रेम को लिए (प्रेम में मग्न) (तुम) निरन्तर ब्रज की गलियो मे डोला करते थे। दूसरों के घर चोरी (करने) (तथा) बहुत आतुर होकर (ग्वालों की) गाय दुहाने जाते थे। नवीन पल्लव तोड़कर, (उनका) पुट (देकर) अपने हाथो से फूलो की सेज रचते थे। बिना देखे (तुम्हारा) मन तरसता था तथा एक क्षण युग के समान बीतता था । सूरदास (कहते हैं) (कृष्ण ने) उस सुख को सोचकर नेत्रो मे आंसू भर लिए; उनके हृदय मे (राधा के प्रति) कम प्रेम न था। उनका शरीर शिथिल (हो गया) मुख से बात नही फूटती (निकलती) थी, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥४५॥ बूझति है रुकमिनी पिय इनमैं, को वृषभानु किसोरी । नैंकु हमैं दिखरावहु अपनी, बालापन की जोरी। परम चतुर जिन कीन्हे मोहन, अल्प वैस ही थोरी। बारे तैं जिहिं यहै पढ़ायौ, बुधि बल कल विधि चोरी। जाके गुन गनि ग्रंथित माला, कबहुँ न उत तैं छोरी। मनसा सुमिरन, रूप ध्यान उर, दृष्टि न इत उत मोरी। वह लखि जुवति वृन्द मैं ठाढ़ी, नील वसन तन गोरी । सूरदास मेरौ मन बाकी, चितवनि बंक हरयौ री ॥४६॥ अर्थ—रुक्मिणी (कृष्ण से) पूछती हैं (कि) हे प्रिय ! इनमे वृषभानु की बेटी (राधा) कौन है ? हमे थोड़ा अपने बचपन की जोड़ी (तो) दिखाओ ! जिसने अल्प- आयु ही मे कृष्ण को परम चतुर बना दिया। बचपन से ही जिसने यही पढ़ाया कि बुद्धि के बल से (तथा) फल (कौतुक) के बल से चोरी (कैसे की जाय) जिसके गुणो के समूह से ग्रन्थित माला (तुमने) कभी भी हृदय से नही हटायी (जिसके गुण तुम कभी नहीं भूले) एकाग्रचित्त होकर (तुमने) स्मरण किया तथा हृदय मे जिसके रूप का ध्यान किया। (कृष्ण ने उत्तर दिया :) वह देखो, नीले वस्त्रो (से युक्त) गोरे शरीर वाली (राधा) युवतियों के समूह मे खड़ी है। सूरदास (कृष्ण) (कहते हैं) उसी की तिरछी नजर ने मेरे चित्त को हर लिया ॥४६॥ हरि जू इते दिन कहाँ लगाए। तबहिं अवधि मैं कहत न समुझी, गनत अचानक आए। भली करी जु बहुरि इन नैननि, सुदर दरस दिखाए। जानी कृपा राज काजहु हम, निमिष नहीं बिसराए। बिरहिनि बिकल बिलोकि सूर प्रभु, धाइ हृदै करि लाए। कछु इक सारथि सौं कहि पठयौ, रथ के तुरँग छुड़ाए ॥४७॥