भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारका चरित ३६१ अर्थ—हरि जी ने इतना समय कहाँ लगा दिया ! उस समय (जब कृष्ण मथुरा गए थे कि) अवधि बताने पर मैं समझी नही; गिनते-गिनते (अब अवधि का हिसाब लगा रही थी कि) अचानक (हरि) आ गये । अच्छा ही किया जो (हरि ने) इन नेत्रों को (अपने) सुन्दर दर्शन दिये । (हमने आपकी) कृपा जान ली, राज-काज में (राज- काज करते हुए) भी क्षण-मात्र के लिए (भी) हमे (आपने) नही भुलाया । विरहिणी को विकल देखकर सूर के प्रभु (कृष्ण ने) दौडकर (उसे) हृदय से लगा लिया । कुछ कहकर सारथी (रथ चलाने वाले) को भेज दिया (तथा) घोड़ों को छुडा दिया (पांव- पैदल ही जाने का निश्चय किया) ॥४७॥ हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ । जदपि नैन निरखत वह मूरति, फिरि मन जात तहाँ । मुख मुरली सिर मोर पखौवा, गर घुँघचिनि कौ हार । आगैं धेनु रेनु तन मंडित, तिरछी चितवनि चार । राति दिवस सब सखा लिए सँग, हँसि मिलि खेलत खात । सूरदास प्रभु इत उत चितवत, कहि न सकत कछु बात ॥४८॥ अर्थ—(किसी ने कहा;) हे हरि जी वे सुख फिर कहाँ (नसीब होंगे) । यद्यपि नयनो से (तुम्हारी) वही मूर्ति देखते है, (किन्तु) मन फिर वही चला जाता है (ब्रज की लीलाओ की ओर खिंच जाता है) । (जब आपके) मुख में मुरली, सिर पर मोर के पंख (मोर मुकुट), (तथा) गले घुंघुचियों का हार (हम देखा करते थे) । आगे गाये (चलती थी) (पीछे) धूल से शोभित (आपका) शरीर (ओर) सुन्दर तिरछी चितवन से आपका देखना रात-दिन (आप) सब मित्रों को साथ लिए हँस-मिलकर खेला-खाया करते थे । सूरदास के प्रभु (इन बातों को टालने या भूल जाने के लिए) इधर-उधर देखने लगे; कुछ बात कह नही पाते (कोई जवाब न दे पाये !) ॥४८॥ रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी । जैसैं बहुत दिननि की बिछुरी, एक बाप की बेटी । एक सुभाव एक वय दोऊ, दोऊ हरि कौं प्यारी । एक प्रान मन एक दुहुनि कौ, तन करि दीसति न्यारी । निज मंदिर लै गई रुकमिनी, पहुनाई बिधि ठानी । सूरदास प्रभु तहँ पग धारे, जहाँ दोऊ ठकुरानी ॥४६॥ अर्थ—रुक्मिणी तथा राधा इस प्रकार मिली (मानो) बहुत दिनों के बिछुड़ने के बाद एक बाप की दो बेटियां (हों) । दोनों का एक ही स्वभाव, एक ही आयु तथा दोनों कृष्ण को प्यारी हैं । दोनों एक ही प्राण (तथा) एक ही मन है; (केवल) शरीर से (ही) भिन्न दिखाई देती हैं । रुक्मिणी (राधा को) अपने भवन ले गयी (तथा) विधिपूर्वक (राधा का) आतिथ्य किया । सूरदास (कहते हैं कि) प्रभु (कृष्ण) वहाँ गए जहाँ दोनो ठकुराइने (रानियाँ) थी ॥४६॥