भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३६२ सूरसागर सार सटीक राधा माधव, भेंट भई । राधा माधव, माधव राधा, कीट भृङ्ग गति ह्रै जु गई । माधव राधा के रँग रांचे, राधा माधव रंग रई । माधव राधा प्रीति निरन्तर, रसना करि जो कहि न गई । बिहंसि कह्यो हम तुम नहिं अन्तर, यह कहिकै उन ब्रज पठई । सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रज-बिहार नित नई नई ॥५०॥ अर्थ - राधा और माधव से भेट हुई। राधा-माधव और माधव-राधा हो गये; भृङ्ग (नामक) कीडे (के समान उन) की दशा हो गई (अर्थात् दोनो एक ही हो गये) । माधव-राधा के रग मे रंग गये, राधा-माधव के रग मे रग गयी । माधव और राधा का प्रेम स्थायी (है), वाणी से (उसे) कहा नही जा सकता (वह अवर्णनीय है)। (कृष्ण ने) (राधा से) हँसकर कहा कि हममे तुममें अन्तर नही है यह कहकर उन्हे (राधा को) ब्रज भेज दिया। सूरदास के प्रभु राधा-माधव का ब्रज मे नित्य नया विहार (हुआ करता है) ॥५०॥ ब्रजबासिनि सौं कह्यो, सबनि तैं ब्रज-हित मेरौँ । तुमसोँ नाहीँ दूरि रहत हौँ, निपटहिं नेरौँ । भजै मोहिँ जो कोइ, भजौँ मैं तेहिँ ता भाई । मुकुर माहिँ, ज्यों रूप, आपनेँ सम दरसाई । यह कहि कै समदे सकल, नैन रहे जल छाइ । सूर स्याम कौ प्रेम कछु, मो पै कह्यो न जाइ ॥५१॥ अर्थ- (कृष्ण ने) सभी ब्रजवासियो से कहा (कि) ब्रज से मेरा प्रेम है। तुम लोगो से (हम) कभी दूर नही रहते हैं, (मै) बिलकुल निकट (ही) हूँ । मुझे जो (जिस भाव से) भजता है मैं उसे उसी भाव से भजता हूँ। जैसे शीशे मे (व्यक्ति का) रूप अपने समान (ही) (अर्थात् जैसा वह रूप होता है) (वैसा ही) सब को दिखाई देता है (वैसे ही घट-घट मे मैं अपना ही रूप देखता हूँ)। यह कहकर सब से (वे) मिले, (उनके) नेत्रो मे जल छा गया। सूरदास (कहते हैं) (कि) श्याम का प्रेम मुझसे कुछ (भी) नही कहा जाता ॥५१॥ सबहिनि तैँ हित है जन मेरौ । • जनम जनम सुनि सुबल सुदामा, निवहौँ यह प्रन बेरौ । ब्रह्मादिक इन्द्रादिक तेऊ, जानत बल सब केरौ । एकहि साँस उसास त्रास उड़ि, चलते तजि निज खेरौ । कहा भयौ जो देस द्वारिका, कीन्हौ दूर बसेरौ । आपुन ही या ब्रज के कारन, करिहौँ फिरि-फिरि फेरौ । इहाँ-उहाँ हम फिरत साधु हित, करत असाधु अहेरौ । सूर हृदय तैं टरत न गोकुल, अंग छुअत हौँ तेरौ ॥५२॥