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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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तीनों लोक मे नही है जो प्रभु के पास है। सूरदास (कहते हैं कि) हरि भक्तों को बुलाकर बांह पकड़कर (उनका) निर्वाह करते हैं ॥२॥ कर कंपै, कंपन नहिँ छूटै। राम सिया-कर परस मगन भए, कौतुक निरखि सखी सुख लूटै। गावत नारि गारि सब दै दै, तात-भ्रात का कौन चलावै। तब कर-डोरि छूटै रघुपति जू, जब कौसिल्या माता आवै। पूँगीफल-जुत जल निरमल धरि, आनी भरि कुँडि जो कनक की। खेलत जूप सकल जुवतिनि मैं, हारे रघुपति, जिती जनक की। धरे निसान अजिर गृह मंगल, बिप्र-वेद-अभिषेक करायौ। सूर अमित आनंद जनकपुर, सोइ सुकदेव पुराननि गायौ ॥३॥ अर्थ—हाथ कंपता है (और) कंपन नही छूटता। राम सीता के हाथ को स्पर्श करके आनंदित (पुलकित) हो गये ! इस कौतुक को देखकर सखियां सुख को लूट रही है। नारियां सभी (को) गालियां दे-केर गाती हैं, पिता (तथा) भाई (की) कौन चलाए ! (स्त्रियां व्यंग्य करती हैं) हे रघुनंदन ! ककन के हाथ की डोरी तभी छूटेगी जब माता कौशल्या (स्वयं) आएं। सुपारी से युक्त निर्मल जल भर कर सोने का छोटा कलश (कुंडी) लाया गया। समस्त युवतियो के बीच जुआ खेलते हुए राम हार गये, जनकपुत्री सीताजी जीत गयीं ! (स्वस्तिक आदि) मंगल चिह्न (निशान) आंगन में धरे (बनाये) गये। वेद विहित विधियो से विप्रो (ब्राह्मणों) ने अभिषेक कराया। सूरदास (कहते है कि) जनकपुर मे अत्यधिक आनन्द है। उसे ही शुकदेव (मुनि) ने पुराणो मे गाया है ॥३॥ परसुराम तेहिँ औसर आए। कठिन पिनाक कहाँ किन तोर्यौ, क्रोधित बचन सुनाए। विप्र जानि रघुबीर धीर दोउ, हाथ जोरि, सिर नायौ। बहुत दिननि कौ हुतौ पुरातन, हाथ छुअत उठि आयौ। तुम तौ द्विज, कुल-पूज्य हमारे, हम-तुम कौन लराई ? क्रोधवंत कछु सुन्यौ नहीं, लियौ सायक धनुप चढ़ाई। तबहूँ रघुपति क्रोध न कीन्हौ, धनुष न बान सँभार्यौ। सूरदास प्रभु रूप समझि, बन परसुराम पग धार्यौ ॥४॥ अर्थ—उसी समय परशुराम आ गये। (बोले) मुझे "बताओ ! कठिन धनुष को किसने तोड़ा ?" इस (प्रकार के) क्रोधित वचन (उन्होने) सुनाये। (परशुराम को) ब्राह्मण जानकर धैर्यवान् राम ने दोनो हाथ जोड़कर सिर झुकाया (प्रणाम किया)। (राम ने कहा) धनुष बहुत दिन का पुराना था, हाथ से छूते ही उठ आया। आप तो ब्राह्मण (हैं), हमारे कुल के पूज्य; हमारे और तुम्हारे बीच लडाई कैसी ? क्रोध युक्त (परशुराम न) कुछ सुना नही, (उन्होने) बाण को धनुष पर चढा लिया। तब भी राम