भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३६६ सूरसागर सार सटीक ने क्रोध नही किया, धनुष वाण नही संभाला । सूरदास (कहते है कि) परशुराम प्रभु के रूप को समझ कर वन को चले गए ॥४॥ कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ? अद्भुत वधू लिये सँग डोलत, देखत त्रिभुवन मोहैँ । परम सुसील सुलच्छन जोरी, विधि की रची न होइ । काकी तिनकी उपमा दीजै, देह धरे धौँ कोइ । इनमें को पति आहिँ तिहारे, पुरजनि पूछैँ धाइ । राजिव नैन मैन की मूरति, सैननि दियौ बताइ । गईँ सकल मिलि संग दूरि लौँ, मन न फिरत पुर-वास । सूरदास स्वामी के बिछुरत, भरि-भरि लेति उसास ॥५॥ अर्थ— (वन जाते हुए रामादि को देखकर ग्रामीण स्त्रियां आपस मे पूछती हैं) हे सखी ! बताओ ये राही कौन हैं ? साथ मे अद्भुत वधू लेकर घूमते है, (जिसे) देखते ही तीनो लोक मोहित हो जाते हैं । (यह) जोडी परम सुशील (तथा) सुलक्षण है, ब्रह्मा की बनाई हुई नही जान पडती । इनकी उपमा किससे दी जाय ! (लगता है) कोई देहधारी (देवता) हैं, ग्रामवासिनी दौड़कर (सीता से) पूछती हैं इनमे तुम्हारा पति कौन है ? (सीता ने) इशारे से बता दिया कि कमलवत् नेत्र कामदेव की मूर्ति (के समान) (व्यक्ति) (हमारे पति है) । (सभी स्त्रियां) साथ मिलकर दूर तक गयी, (उनका) मन ग्राम मे निवास की ओर नही फिरता था । सूरदास के स्वामी (राम) से बिछुडने (के कारण) ग्राम वधुएं गम्भीर सांसें (लम्बी आहे) भरकर दौड़ती हैं ॥५॥ राम धनुष अरु सायक साँधे । सिय हित मृग पाछैँ उठि धाए, वलकल वसन, फेट दृढ़ बाँधे । नव-घन, नील-सरोज बरन बपु, विपुल, बाहु, केहरि-फल काँधे । इंदु बदन, राजीव नैन वर, सीस जटा सिव सम सिर बाँधे । पालत, सृजत, सँहारत, सैँतत, अंड अनेक अवधि पल आधे ! सूर भजन-महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन आराधे ॥६॥ अर्थ—राम धनुष और बाण को साधे, वल्कल वस्त्र (पहने) तथा कमरकस को दृढ़ता से बांधे सीता के स्नेह-वश मृग के पीछे उठकर दौड पड़े । नवीन वादल (तथा) नीले कमल (जैसे) (वर्ण) शरीर वाले, विशाल भुजाओं वाले (राम के) कंधे "केहरि- फल''* (वृषभ ?) (जैसे हैं) । चन्द्रवत् मुख, कमलवत् श्रेष्ठ आंखो, (वाले राम) शिव के समान सिर पर जटा बांधे है । आधे पल के समय में (ही) (वे) अनेक ब्रह्मांडो का पालन

  • अनेक हस्तलिखित प्रतियों मे "फल" के स्थान पर "गुन" शब्द मिलता है, जिसका अर्थ होगा जिन राम के स्कंधो के गुण जिनका सीना सिंह के सीने के समान प्रशस्थ (चौडा) है । 'गुन' शब्द से युक्त एक अन्य पाठ भी पाडुलिपियो मे प्राप्त है— विपुल बाहू छत्री गुन काधे ।