भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

परिशिष्ट (क) ३६७ सृजन, विनाश (तथा उन्हें समेट लेते) (मिटा देते) हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) (वे) भजन की महिमा दिखाते हैं; इस प्रकार (उनके) चरणो की आराधना करने पर (संसार से छुटकारा पाना) अत्यन्त सरल है ॥६॥ सुनहु अनुज, इहिँ बन इतननि मिलि, जानकी प्रिया हरी। कछु इक अंगनि की सहिदानी, मेरी दृष्टि परी। कटि केहरि, कोकिल कल बानी, ससि मुख प्रभा-धरी। मृग मूसी नैननि की सोभा, जाति न गुप्त करी। चंपक-बरन, चरन-कर कमलनि, दाड़िम दसन लरी। गति मराल अरु बिंब अधर-छबि, अहि अनूप कवरी। अति करुना रघुनाथ गुसाईँ, जुग ज्यौँ जाति घरी। सूरदास प्रभु प्रिया प्रेम-बस, निज महिमा बिसरी ॥७॥ अर्थ—हे अनुज (लक्ष्मण) ! सुनो इस वन में इतने लोगो ने मिलकर प्रिया (सीता) का हरण किया (है)। (सीता के) कुछ अंगो की निशानी मेरी नजरों मे पडी (है)। सिंह ने कमर, कोयल ने मधुर वाणी (तथा) चन्द्रमा ने मुख की कान्ति धारण कर ली। मृग ने नेत्रो की शोभा चुरा ली, जिसे छिपाना (उससे) बन नही पा रहा है। चंपा ने (शरीर का) रंग, कमल ने चरण (तथा) हाथ, (और) दांतो की लड़ियो की दाड़िम (आकार) ने (हर लिया)। हंस ने (चरणो की) गति और बिम्बाफल (कुंदरू) ने ओठो की छवि (लालिमा) तथा सांप ने अनुपम कवरी वेणी, चोटी (की छवि) (चुरा ली)। अत्यधिक करुणा युक्त राम का (एक) घडी समय (एक) युग के समान बीतता है। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (राम) प्रिया (सीता) के प्रेम के कारण अपनी महिमा (भी) भूल गये ॥७॥ बिछुरी मनौ संग तैँ हिरनी। चितवति रहत चकित चारोँ दिसि, उपजि बिरह तन जरनी। तरुवर-मूल अकेली ठाढ़ी, दुखित राम की घरनी। बसन कुचील, चिहुर लपटाने, बिपति जाति नहिँ बरनी। लेति उसास नयन जल भरि- भरि, धुकि सो परै धरि धरनी। सूर सोच जिय पोच निसाचर, राम नाम की सरनी ॥८॥ अर्थ-मानो साथ से हरिणी बिछुड गयी। चकित होकर (सीता) चारो दिशाओ में देखती रहती है, (तथा) शरीर मे विरह की जलन उत्पन्न हो गयी। वृक्ष के नीचे राम की दुखी पत्नी (सीता) अकेली खड़ी है। (उनके) वस्त्र मैले है, बाल उलझे हैं, (उनकी) विपत्ति का वर्णन नही किया जाता। नेत्रो मे जल भर-भर कर गहरी उसांसे लेती हैं, (कभी तो) पृथ्‍वी पर गिर पड़ती हैं। सूरदास (कहते हैं कि) (उनके) मन मे नीच राक्षसो की चिन्ता है, (अब) केवल एक मात्र रामनाम की शरण (ही उनके लिए) (बाकी) (है) ॥८॥