भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

३६८ सूरसागर सार सटीक सो दिन त्रिजटी, कहु कव ऐहै ? जा दिन चरनकमल रघुपति के, हरषि जानकी हृदय लगैहै । कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा, माइ माइ कहि मोहिं सुनैहै । कबहुँक कृपावंत कौशिल्या, वधू-वधू कहि मोहिं बुलैहै । जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, विमल ध्वजा रथ पर फहरैहै । ता दिन जनम सफल करि मानौं, मेरी हृदय-कालिमा जैहै । जा दिन राम रावनहिं मारैं, ईसहिं लै दससीस चढ़ैहैं । ता दिन सूर राम पै सीता, सरवस वारि बधाई दैहैं ॥६॥ अर्थ—हे त्रिजटी ! कहो वह दिन कब आयेगा ? जिस दिन राम के चरण- कमलो को हर्षित होकर सीता हृदय से लगायेंगी। कभी लक्ष्मण सुमित्रा को पाकर 'माँ-माँ' कहकर मुझे सुनायेगे । कभी कृपालु कौशल्या "वधू-वधू" कहकर मुझे बुला- येगी । जिस दिन प्रभु (राम) रथ पर विमल ध्वजा फहराते हुए कंचनपुरी (लंका) आयेगे; उसी दिन (मैं सीता) जीवन को, सफल करके मानूंगी, (और) मेरी हृदय- कालिमा (मेरा दुःख) चली जायेगी, (तथा) जिस दिन राम रावण को मारेगे, (ओर) (उसके) दस सिर लेकर ईश पर चढ़ायेगे । सूरदास (कहते हैं) उसी दिन राम पर सीता सर्वस्व निछावर कर बधाई देगी ॥६॥ जननी, हौं अनुचर रघुपति कौ। मति माता करि कोप सरापैं, नहिं दानव ठग मति कौ । आज्ञा होइ देउँ कर मुँदरी, कहौँ संदेसौ पति कौ । मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ । कहौ तो लंक उखारि डारि देउँ, जहौँ पिता संपति कौ । कहौ तो मारि-सँहारि निसाचर, रावन करौं अगति कौ । सागर-तीर भीर बनचर की, देखि कटक रघुपति कौ । अबहिं मिलाउँ तुम्हैं सूर प्रभु, राम-रोष डर अति कौ ॥११०॥ अर्थ - हे माता ! मैं रघुपति का सेवक हूँ । माता, क्रोधित होकर (तुम) मुझे शाप न दे देना; मैं ठग बुद्धि वाला राक्षस नही हूँ । आज्ञा हो, तो (राम के) हाथ की मुंदरी (अंगूठी) दूँ, (और) पति का (राम का) संदेशा कहूँ । सीता ! हृदय मे दुख मत करो, राम दैत्यो के कुल को मार डालेगे । कहो (आज्ञा हो) तो लंका को उखाड कर (वहाँ) डाल (फेक) दूँ जहां (कैलाश पर्वत पर) संपत्ति के पिता (कुबेर) हैं । कहो तो निशाचरो को मार सहार कर रावण की दुर्गति कर हूँ । सागर के किनारे बदरो की भीड़ (है), रघुपति की (बन्दरो की) सेना को देखो । सूरदास (हनुमान् जी) (कहते हैं कि) तुमसे प्रभु (राम) को अभी मिला दूँ (मिलाने की सामर्थ्य रखता हूँ), (किन्तु) (मुझे) राम के क्रोध का बडा डर (है) (राम की आज्ञा के बिना यदि) मैं तुम्हे राम से मिला दूँ तो मुझे यह डर लगता है कि कही राम नाराज न हो जायें ॥११०॥