भारतकोश
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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

३६८ सूरसागर सार सटीक सो दिन त्रिजटी, कहु कव ऐहै ? जा दिन चरनकमल रघुपति के, हरषि जानकी हृदय लगैहै । कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा, माइ माइ कहि मोहिं सुनैहै । कबहुँक कृपावंत कौशिल्या, वधू-वधू कहि मोहिं बुलैहै । जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, विमल ध्वजा रथ पर फहरैहै । ता दिन जनम सफल करि मानौं, मेरी हृदय-कालिमा जैहै । जा दिन राम रावनहिं मारैं, ईसहिं लै दससीस चढ़ैहैं । ता दिन सूर राम पै सीता, सरवस वारि बधाई दैहैं ॥६॥ अर्थ—हे त्रिजटी ! कहो वह दिन कब आयेगा ? जिस दिन राम के चरण- कमलो को हर्षित होकर सीता हृदय से लगायेंगी। कभी लक्ष्मण सुमित्रा को पाकर 'माँ-माँ' कहकर मुझे सुनायेगे । कभी कृपालु कौशल्या "वधू-वधू" कहकर मुझे बुला- येगी । जिस दिन प्रभु (राम) रथ पर विमल ध्वजा फहराते हुए कंचनपुरी (लंका) आयेगे; उसी दिन (मैं सीता) जीवन को, सफल करके मानूंगी, (और) मेरी हृदय- कालिमा (मेरा दुःख) चली जायेगी, (तथा) जिस दिन राम रावण को मारेगे, (ओर) (उसके) दस सिर लेकर ईश पर चढ़ायेगे । सूरदास (कहते हैं) उसी दिन राम पर सीता सर्वस्व निछावर कर बधाई देगी ॥६॥ जननी, हौं अनुचर रघुपति कौ। मति माता करि कोप सरापैं, नहिं दानव ठग मति कौ । आज्ञा होइ देउँ कर मुँदरी, कहौँ संदेसौ पति कौ । मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ । कहौ तो लंक उखारि डारि देउँ, जहौँ पिता संपति कौ । कहौ तो मारि-सँहारि निसाचर, रावन करौं अगति कौ । सागर-तीर भीर बनचर की, देखि कटक रघुपति कौ । अबहिं मिलाउँ तुम्हैं सूर प्रभु, राम-रोष डर अति कौ ॥११०॥ अर्थ - हे माता ! मैं रघुपति का सेवक हूँ । माता, क्रोधित होकर (तुम) मुझे शाप न दे देना; मैं ठग बुद्धि वाला राक्षस नही हूँ । आज्ञा हो, तो (राम के) हाथ की मुंदरी (अंगूठी) दूँ, (और) पति का (राम का) संदेशा कहूँ । सीता ! हृदय मे दुख मत करो, राम दैत्यो के कुल को मार डालेगे । कहो (आज्ञा हो) तो लंका को उखाड कर (वहाँ) डाल (फेक) दूँ जहां (कैलाश पर्वत पर) संपत्ति के पिता (कुबेर) हैं । कहो तो निशाचरो को मार सहार कर रावण की दुर्गति कर हूँ । सागर के किनारे बदरो की भीड़ (है), रघुपति की (बन्दरो की) सेना को देखो । सूरदास (हनुमान् जी) (कहते हैं कि) तुमसे प्रभु (राम) को अभी मिला दूँ (मिलाने की सामर्थ्य रखता हूँ), (किन्तु) (मुझे) राम के क्रोध का बडा डर (है) (राम की आज्ञा के बिना यदि) मैं तुम्हे राम से मिला दूँ तो मुझे यह डर लगता है कि कही राम नाराज न हो जायें ॥११०॥

परिशिष्ट (क) ३६८ सुनु कपि, वै रघुनाथ नहींँ ? जिन रघुनाथ पिनाक पिता-गृह तोरयौ निमिष महीँ । जिन रघुनाथ फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीँ । जिन रघुनाथ-हाथ खर-दूषन-प्रान हरे सरहीँ । कै रघुनाथ तज्यौ प्रन अपनौ, जोगिन दसा गहीँ ? कै रघुनाथ दुखित कानन, कै नृप भए रघुकुलहीँ । कै रघुनाथ अतुल बल राच्छस दसकंधर डरहीँ ? छाँड़ी नारि बिचारि पवन-सुत लंक बाग बसहीँ । कै हौँ कुटिल, कुचील, कुलच्छनि, तजी कंत तबहीँ । सूरदास स्वामी सौँ कहियौ अब बिरमाहिँ नहीं ॥११॥ अर्थ — सुनो कपि ! (क्या) वे रघुनाथ (अब) नहीं हैं ? जिन रघुनाथ ने (मेरे) पिता (जनक) के घर मे क्षण भर मे (ही) धनुष तोड दिया था । जिन रघुनाथ ने भृगु- पति की गति को वही काट कर (उन्हें) वापस भेज दिया । जिन रघुनाथ के हाथ के बाणों ने खर-दूषण के प्राण हरे (थे) । या तो राम ने अपना प्रण (भक्तो की रक्षा) छोड दिया, (या फिर) योगियों की दशा प्राप्त की (विरक्त हो गये) । या तो दुखी होकर राम कही जंगल मे (घूम रहे हैं) (या फिर) (अयोध्या मे) रघुकुल के राजा हो गये । या तो रघुनाथ राक्षस रावण के अतुल बल से डरते हैं तथा विचार करके उन्होने अपनी स्त्री को त्याग दिया और कही लका के बगीचे मे रहते है । या तो मै कुटिल, गंदी कुलक्षिणी हूँ, तभी कंत (राम) ने (मुझे) त्याग दिया । सूरदास के स्वामी से कहना (कि) अब (कही) रुके नही (जल्द आ जायें) ॥११॥ मैं परदेसिन नारि अकेली । बिनु रघुनाथ और नहिँ कोऊ, मातु-पिता न सहेली । रावन भेष, धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली । अति अज्ञान मूढ़ि-मति मेरी, राम-रेख पग पेली । बिरह-ताप तन अधिक जरावत, जैसेँ दव द्रुम बेली । सूरदास प्रभु वेगि मिलावौ प्रान जात हैं खेली ॥१२॥ अर्थ - मैं परदेशी स्त्री अकेली हूँ । रघुनाथ के बिना (मेरी सहायता करने वाला) और कोई नही (है); न माता-पिता, (ओर) न (कोई) सखियाँ (है) । रावण ने तपस्वी का वेष धारणा किया; मैंने उसे भिक्षा क्यो दी ! (मैं) बहुत अज्ञानी (हूँ) मेरी मति मंद (है), (तभी तो) राम की (बनाई हुई) रेखा (का) (मैंने) उल्लघन किया (मैं उसके बाहर गयी) । विरह का ताप शरीर को अत्यधिक जलाता है; जैसे दावाग्नि पेडो (और) लताओ को (जलाती है) । सूरदास (कहते हैं) (सीता कहती हैं) (कि) प्रभु से जल्द मिलाओ, नही तो प्राण खेल-खेल (मे ही) (व्यर्थ ही) जा रहे हैं ॥१२॥ २४

३७० सूरसागर सार सटीक तब हौं नगर अयोध्या जैहौं। एक बात सुनि निश्चय मेरी, राज्य विभीषन दैहौं। कपि-दल जोरि और सब सेना, सागर सेतु बँधैहौं। काटि दसौ सिर, बीस भुजा तब दसरथ सुत जु कहैहौं। छिन इक माहिं लंक गढ़ तोरौँ, कंचन-कोट ढहैहौं। सूरदास प्रभु कहत विभीषन, रिपु हति सीता लैहौं ॥१३॥ अर्थ—(राम कहते हैं) तभी मैं अयोध्या जाऊँगा। मेरे निश्चय (संकल्प) की एक बात सुनो (कि) (मैं) (लंका का राज्य) विभीषण को दूंगा। कपियो का दल तथा अन्य सभी (प्रकार की) सेना जोड़कर समुद्र पर पुल बनाऊँगा। (रावण के) दसों सिरो तथा बीसो भुजाओ को काटकर (ही) दशरथ का पुत्र कहाऊँगा। एक क्षण-मात्र मे (ही) लंका के किले को तोडकर कंचन के कंगूरों को ढाह (गिरा) दूंगा। सूरदास के (राम) कहते है (कि) हे विभीषण ! मैं शत्रु को मार कर सीता को ले लूंगा (प्राप्त करूँगा) ॥१३॥ दूसरैं कर वान न लैहौं। सुनु सुग्रीव, प्रतिज्ञा मेरी, एकहिं बान असुर सब हैहौं। सिव-पूजा जिहिँ भाँति करी है, सोइ पद्धति परतच्छ दिखैहौं। दैत्य प्रहार पाप-फल-प्रेरित, सिर माला सिव सीस चढ़ैहौं। मनौ तूल-गन परत अगिनि-मुख, जारि जड़न जम-पंथ पठैहौं। करिहौँ नाहिँ विलंब कछू अब, उठि रावन सम्मुख ह्वै धैहौँ। इमि दमि दुष्ट देव द्विज मोचन, लंक विभीषन, तुमकौं दैहौँ। लछिमन, सिया समेत सूर कपि, सब सुख सहित अयोध्या जैहौँ ॥१४॥ अर्थ—हाथ मे दूसरा बाण नही लूंगा। सुग्रीव मेरी प्रतिज्ञा सुनो, एक ही बाण मे सभी असुरो को मार डालूंगा। जिस तरह रावण ने शिव की पूजा की है उस पद्धति को प्रत्यक्ष ही दिखा दूंगा। पाप-फल से प्रेरित दैत्यो का विनाश करके (उनके) सिर की माला शिव के सिर पर चढ़ाऊँगा। जिस प्रकार रूई का समूह आग पर पड़ रहा हो, (उसी तरह इन) मूर्खो को (राक्षसो को) जलाकर यमराज (मृत्यु) के रास्ते पर भेज दूंगा। अब कुछ भी देर नही करूँगा, उठकर रावण के सम्मुख दौड़ पडूँगा (टूट पडूँगा)। इस तरह दुष्टो का दमन करके ब्राह्मण तथा देवताओ को मुक्त करके, हे विभीषण ! लंका तुम्हे दूंगा। सूरदास (कहते हैं) (राम कहते हैं) (कि) लक्ष्मण, सीता (तथा) वानरो (आदि) सब के साथ सुख-पूर्वक अयोध्या जाऊँगा ॥१४॥ आजु अति कोपे हैं रन राम। ब्रह्मादिक आरूढ़ विमाननि, देखत हैं संग्राम। घन तन दिव्य कवच सजि करि, अरु कर धारयौ सारंग। सुचि करि सकल बान सूधे करि, कटि-तट कस्यौ निषंग।

परिशिष्ट (क) ३७१ सुरपुर तैं आयौ रथ सजि कैं रघुपति भए सवार। काँपी भूमि कहा अब ह्वै है, सुमिरत नाम मुरारि। छोभित सिंधु, सेप-सिर कंपित, पवन भयौ गति पंग। इंद्र हँस्यौ, हर हिय विलखान्यौ, जानि वचन कौं भंग। धर-अंवर, दिसि-विदिस, बढ़े अति सायक किरन-समान। मानौ महा-प्रलय के कारन, उदित उभय षट भान। टूटत धुजा-पताक-छत्र-रथ, चाप-चक्र-सिरत्रान। जूझत सुभट जरत ज्यौं नवद्रुम, विनु साखा विनु पान। स्रोनित छिछ उछरि आकासहिं, गज-वाजिनि-सिर लागि। मानौ निकरि तरनि रंध्रनि तैं, उपजी है अति आगि। परि कबंध भहराइ रथनि तैं, उठत मनौ झर जागि। फिरत सृगाल सज्यौ सव काटत, चलत सो सिर लै भागि। रघुपति रिस पावक प्रचंड अति, सीता स्वास समीर। रावन-कुल अरु कुंभकरन वन, सकल सुभट रनधीर। भए भस्म कछु वार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट चीर। सूरदास प्रभु आपु बाहुबल, कियौ निमिष मैं कीर ॥१५॥ अर्थ—आज युद्ध मे राम अत्यधिक क्रुद्ध है। ब्रह्मादि विमान पर आरूढ़ होकर (राम-रावण के) संग्राम को देखते हैं। (राम ने अपने) वादल (के समान) (सांवले) शरीर पर कवच सजाकर हाथ मे धनुष धारण किया। समस्त वाणो को पवित्र करके (तथा) सीधा करके, कटि (कमर) में तरकस कसा। देवपुरी से सजकर रथ आया; (उस पर) राम सवार हुए। पृथ्वी कांप गयी, अव (न जाने) क्या होगा ! (सभी लोग घबड़ाकर) मुरारी के नाम का स्मरण करने लगे। सागर क्षुब्ध हो गया, शेषनाग का सिर काँपने लगा। (तथा) हवा की गति पंगु हो गयी (हवा चलना बंद हो गया)। इन्द्र हँस पडे; शंकर जी वचन भंग होता जान हृदय मे दुःखी हुए। पृथ्वी (और) आकाश (तथा) देश-विदेश मे किरण के समान (तेज) वाण वहुत अधिक फैल गये; मानो महा प्रलय के कारण (समुपस्थित जानकर) दोनों षट्भानु (छः सूर्य) अर्थात् २ × ६ = १२, द्वादश आदित्य उदित हो गये है। ध्वजा, पताका, छत्र, रथ, धनुष, चक्र (पहिये) तथा सिरस्त्राण (सिर पर पहनने का टोप) टूटते हैं। जूझने वाले वीर (वैसे ही) जलते हैं जैसे दावाग्नि से विना शाखा तथा पत्तों वाले (होकर) वृक्ष। खून के छींटे आकाश की ओर उछलकर (तथा) हाथियों (और) घोड़ो के सिर पर लग कर (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं) मानों सूर्य के छिद्रों से निकलकर आग, वहुत धधक रही हो। रथो से धड़ भहराकर गिरते हैं, मानो वडी ज्वाला उत्पन्न हुई हो। शृगाल घूमते है, (योद्धाओ के) सुसज्जित शव को काटते और सिर को लेकर भागते है। राम की अति प्रचंड क्रोध रूपी आग तथा सीता की सांस रूपी समीर से रावण का कुल, कुंभकर्ण (तथा) समस्त रणधीर

३७२ सूरसागर सार सटीक वीर रूपी वन (जलकर) भस्म हो गये, कुछ (भी) देर नही लगी जैसे ज्वाला से किवाड़े (तथा) वस्त्र (आदि) (जल जाते हैं) सूरदास के प्रभु (राम) ने अपने बाहुवल से पलभर मे (ही) (सबको) कीडा बना दिया ॥१५॥ वैठी जननि करति सगुनौती । लछिमन-राम मिलैँ अव मोकौँ, दोऊ अमोलक मोती । इतनी कहत सुकाग उहाँ तैँ हरी डार उड़ि बैठ्यौ । अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यौँ, सुख जु आनि उर पैठ्यौ । जब लौं हौं जीवौं जीवन भर, सदा नाम तव जपियौँ । दधि-ओदन दोना भरि दैहौं, अरु भाइन मैँ थपियौँ । अव कैँ जौ परचौ करि पावौँ, अरु देखौँ भरि आँखि । सूरदास सोने कैँ पानी, मढ़ीं चोंच अरु पाँखि ॥१६॥ अर्थ—माता बैठकर सगुन मनाती है, दोनो अमोल मोती राम (और) लक्ष्मण अब मुझे मिले । इतना कहते ही वहाँ से कौआ उड़कर हरी डाल पर बैठा (माता ने) अंचल मे गांठ दे दी, (उनका) दुख भाग गया, सुख आकर हृदय मे बैठ गया । (माता कौए से कहती हैं) जब तक हम जियेगी जीवन भर सदैव तुम्हारा नाम जपूँगी । दोना भरकर दही तथा चावल दूंगी (और) भाइयो मे, (अन्य पक्षियों में तुझे ही) स्थापित करूंगी (श्रेष्ठ मानूंगी) । अबकी बार यदि (इस शकुन की सत्यता का) परिचय कर पाऊँ, (इसका परीक्षण कर सकूँ) (और) (पुत्रो को) भर आंख देख पाऊँ तो सूरदास (कहते है) (माता कहती है) (कि हे कौए !) तुम्हारी चोंच और पंखों को सोने के पानी से मढाऊंगी ॥१६॥ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ । सुनहु सखा सुग्रीव-विभीषन, अवनि अयोध्या नाउँ । देखत वन-उपवन-सरिता-सर, परम मनोहर ठाउँ । अपनी प्रकृति लिए बोलत हौं, सुरपुर मैँ न रहाउँ । ह्याँ के वासी अवलोकत हौं, आनँद उर न समाउँ । सूरदास जौ बिधि न संकोचै, तौ वैकुंठ न जाउँ ॥१७॥ अर्थ-यह गांव हमारी जन्म भूमि (है) । मित्र सुग्रीव तथा विभीषण, सुनो ! यह पृथ्वी पर अयोध्या नाम (से प्रसिद्ध है) । वन, उपवन, नदी तथा सरोवर (से युक्त) यह स्थान बहुत मनोहर (है) । अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप कहता हूँ (कि) (मैं) सुरपुर मे (कभी न) रहूँ (ऐसी मेरी इच्छा है) । यहां के निवासियो को देखते ही मेरे हृदय मे आनन्द नही समाता । सूरदास (राम) (कहते हैं) (कि) यदि ब्रह्मा का संकोच न हो तो (मैं) बैकुंठ न जाऊँ ॥१७॥ विनती किहिँ बिधि प्रभुहिँ सुनाऊँ ? महाराज रघुवीर धीर कौँ, समय न कबहुँ पाऊँ ।

परिशिष्ट (क) ३७३ जाम रहत जामिनि के बीतै, तिहिँ अवसर उठि धाऊँ। सकुच होत सुकुमार नीँद मैं, कैसेँ प्रभुहिँ जगाऊँ । दिनकर-किरनि-उदति, ब्रह्मादिक-रुद्रादिक इक ठाऊँ। अगनित भीर अमर-मुनि गन की, तिहिँ तैं ह ठौर न पाऊँ । उठत सभा दिन मधि, सैनापति भीर देखि फिरि आऊँ । न्हात खात सुख करत साहिबी, कैसेँ करि अनखाऊँ । रजनी-मुख आवत गुन-गावत, नारद तुवुर नाऊँ। तुमहीँ कहौ कृपानिधि रघुपति किहिँ गिनती मैँ आऊँ। एक उपाय करौ कमलापति, कहौ तौ कहि समुझाऊँ । पतित उधारन नाम सूर प्रभु, यह रुक्का पहुँचाऊँ ॥१८॥ अर्थ--प्रभु (राम) को किस प्रकार विनती सुनाऊँ ! (विनती सुनाने के लिए) महाराज धीर रघुवीर का (खाली) समय कभी नही पाता हूँ। रात बीतने मे एक याम (३ घंटे का समय) रह जाने पर उस समय उठकर दौड़कर (उनके पास) जाता हूँ। लेकिन संकोच होता है कि प्रभु सुकुमार नीद मे है, (उन्हे) कैसे जगाऊँ। सूर्य की किरण उदित होते (ही) ब्रह्मादि, रुद्रादि अगणित देवता तथा मुनि गण एक जगह एकत्र हो जाते हैं, जिससे (वहां धँसने का) स्थान नही मिलता । दिन के मध्य मे सभा से उठते ही सेनापतियो की भीड़ देखकर वापस चला आता हूँ। नहाते, खाते (तथा) सुख करते (समय) साहब को कैसे नाराज करूँ। सन्ध्या आते ही नारद (तथा) तुंबुरु गुण गाते हुए आते हैं। कृपा निधि ! तुम्ही कहो, (मैं) जिस गिनती मे आऊँ । कमला- पति ! एक उपाय करो । (यदि) कहो तो कहकर समझाऊँ । सूर के प्रभु (राम) का नाम "पतितो का उद्धार करने वाला" (है), यही रुक्के (कागज) पर (लिखकर) पहुँचा दूँ ॥१८॥

परिशिष्ट (ख) अंतर्कथाएँ संकेत सूचना—द्र० = द्रष्टव्य । भा० = भागवत । स्कं० = स्कंध । पू० = पूर्वार्द्ध । उ० = उत्तरार्द्ध । अ० = अध्याय । सू० = सूरसागर (सभा) । प० = पद । अंबरीष—अयोध्या के एक प्रसिद्ध वैष्णव राजा । एकादशी व्रत के पारण का समय निकलते देख व्रत खंडित होने के डर से इन्होंने दुर्वासा ऋषि को भोजन कराने के पहले ही भोजन कर लिया, जिससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इन्हें मारने के लिए कृत्या राक्षसी उत्पन्न की । परन्तु विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उसे मारकर दुर्वासा का पीछा किया । दुर्वासा रक्षा के लिए विष्णु के पास गए, परन्तु विष्णु ने उन्हें अंबरीष के ही पास क्षमा मांगने के लिए भेज दिया । नारद ने भी उन्हें एक बार भ्रमवश क्रुद्ध होकर अंधकारावृत होने का शाप दिया था । परन्तु सुदर्शन चक्र ने अंधकार का नाश करके नारद का पीछा किया । नारद को विष्णु की शरण मे पहुँचकर ही रक्षा प्राप्त हुई । देखो दुरवासा । द्र० भा०, स्क० ६, अ० ४-५, सू०, प० ४४८ । अक्रूर—कंस की राज-सभा मे अनिच्छा से रहने वाले एक कृष्ण-भक्त यादव जो वसुदेव के भाई भी कहे जाते हैं । जब कंस ने इन्हें धनुष-यज्ञ के अवसर पर कृष्ण- बलराम को मथुरा लाने के लिए भेजा तो इन्हें कृष्ण-दर्शन की लालसा पूर्ण होने का अवसर जान बहुत प्रसन्नता हुई । उसके बाद ये निरंतर कृष्ण के ही निकट रहे । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ३८-३६, ४८-४६; सू०, प० ३५५७-३५७१, ३६३०-३६३३, ४७७८ । अघासुर—बकासुर और पूतना का छोटा भाई एक असुर जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिए ब्रज भेजा था । इसने इतने विशालकाय अजगर का रूप धारण किया कि उसका मुख पर्वत की गुफा के समान लगता था । कृष्ण के गोपसखाओं ने उसे गोचारण के समय देखा और उसके मुख की अजगर के मुख से तुलना करते हुए भी वे उसमें बछड़ों के साथ प्रविष्ट हो गए । पीछे से स्वयं श्रीकृष्ण ने जाकर अपना शरीर विस्तृत करके अघासुर का ब्राह्मांड विदीर्ण कर दिया और मृत गोपों और बछडो को अमृत से जिला लिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १२; सू०, प० १०४६ ।

परिशिष्ट (ख) ३७५ अजामिल (अजामील)—कन्नोज निवासी एक कुकर्मी, दासीपति ब्राह्मण जिसने दासी से उत्पन्न अपने सबसे छोटे और सबसे प्रिय पुत्र 'नारायण' का नाम लेने मात्र से यम-दूतों से छुटकारा पाया । नाम की महिमा से उसका जीवन पवित्र हो गया और उसका उद्धार हो गया । द्र० भा०, स्कं० ६, अ० १; सू०, प० ४१५ । अर्जुन—पांडवों में तृतीय, श्रीकृष्ण के सबसे अधिक कृपा-पात्र जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना प्रिय सखा करके माना । अर्जुन ने महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण की विशाल सेना न लेकर केवल श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत सहायता माँगी थी । श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन के सारथी बनकर उनकी सहायता की थी तथा अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए उन्हें गीता का उपदेश दिया था । अहि—सर्प, परन्तु यहाँ कालियानाग के लिए प्रयुक्त । देखो 'कालियनाग' । इन्द्र—प्रधान वैदिक देवता जिन्हें अपदस्थ करके पुराणों ने विष्णु की महत्ता स्थापित , की । कृष्ण-लीला मे इस विषय का मुख्य प्रसंग गोवर्धन लीला है । ब्रज में इन्द्र की पूजा मिटाकर गोवर्धन पूजा कराने पर कुपित होकर जब इन्द्र ने घोर जल- वृष्टि की, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को हाथ पर धारण करके ब्रजवासियों की रक्षा की तथा इन्द्र का गर्व-प्रहार किया । इन्द्र कृष्ण की शरण में आया और उसने उनसे क्षमायाचना की । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० २४-२५; सू०, प० १४२८-१५०१, १५८१-१६०० । उग्रसेन—मथुरा के यदुवंशी राजा जिन्हें उनके ज्येष्ठ पुत्र कंस ने अपने श्वसुर जरासंध की सहायता से कारागार में डाल दिया था और स्वयं राजा बन बैठा था । श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें फिर राज्याधिकार दिलाया । उपंग सुत (उपंग सुत)—उद्धव, उपंग नामक एक यादव के पुत्र, जो श्रीकृष्ण के सखा थे और मथुरा से उनका संदेश गोपियों के पास ले गए थे । देखो उद्धव । ऋषि पत्नी—गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या, भूल से अपराध हो जाने के कारण जिसे गौतम ने पत्थर हो जाने का शाप दिया था । श्रीराम की चरण-रज के स्पर्श से उसे पुनः मनुष्य शरीर मिला तथा उसका उद्धार हो गया । द्र० सू०, प० ४१८ । ऐरावत—इन्द्र का श्वेत रंग का हाथी जो चौदह रत्नों में एक था । कंस—मथुरा के राजा उग्रसेन का क्षेत्रज ज्येष्ठ पुत्र जिसने अपने श्वसुर जरासंध की सहायता से पिता को कारागार में डालकर राज्य हस्तगत कर लिया था । कृष्ण को मारने के उसने अनेक असफल उपाय किए और अन्त में जब उसने धनुष-यज्ञ के बहाने कृष्ण-बलराम को मारने के लिए मथुरा बुलाया तब वह स्वयं कृष्ण के द्वारा मारा गया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १-४, ४२- ४४; सू०, प० ६२२, ३६५२-३७०६ ।

३७६ सूरसागर सार सटीक काल जवन (कालयवन) -- एक निःसंतान यवन द्वारा पाला हुआ, महर्षि गार्ग्य और गोपाली अप्सरा का पुत्र, जो इतना पराक्रमी राजा हुआ कि उसने जरासंध के साथ मथुरा पर आक्रमण करके यादवो को वहां से भगा दिया। श्रीकृष्ण उसके डर से हिमालय की एक गुफा मे भाग गए, जहाँ मांधाता-पुत्र मुचकुन्द सो रहा था। कालयवन कृष्ण का पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा तो उसने सोते हुए मुचकुन्द को ही कृष्ण समझकर उसे लात मारकर जगाया। मुचकुन्द ने ज्यों ही उसे नेत्र खोलकर देखा त्यो ही कालयवन भस्म हो गया। देखो मुचकुन्द द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ५२; सू०, प० ४७८१। काली (कालिय नाग) - कद्रू-पुत्र, नागो का राजा, जो गरुड के भय से अपना निवास स्थान रमणक द्वीप छोड़कर ब्रज के निकट यमुना के एक दह मे रहता था, जहाँ सौभरि ऋषि के शाप के कारण गरुड की गति नही थी। इससे काली दह (कालिय दह) का जल अत्यन्त विषैला हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस दह में, 'सूरसागर' के अनुसार गेंद खेलने के प्रसंग मे, प्रविष्ट करके कालिय को नाथ लिया। श्रीकृष्ण का प्रभुत्व जान कालिय ने उनकी स्तुति की। अन्त मे उसे रमणक द्वीप मे निर्भय रहने का वरदान मिल गया। देखो खगराइ तथा रिषि- साप। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १६; सू०, प० ११३८-१२०७। कालीदह--ब्रज के निकट यमुना का एक दह जिसमे कालिय नाग रहता था। देखो काली तथा रिपिसाप। कालीनाग (कालिया नाग) - नागों का राजा। देखो काली। कुवलया पीर (कुवलया पीड) - हाथी के रूप में कंस का सहायक असुर, जिसे श्रीकृष्ण ने मथुरा मे मल्लयुद्ध देखने जाते समय रास्ते में ही मार दिया था। द्र० भा०, स्क० १० पू०, अ० ४३; सू०, प० ३६७०-३६७८। कुविजा -- देखो कुब्जा। कुब्जा - कंस की एक (त्रिवक्रा) तीन जगह से टेढ़ी, किन्तु रूपवती दासी जो श्रीकृष्ण को मथुरा-प्रवेश के समय मिली और जिसने वह अगराज जो वह कंस के लिए ले जा रही थी श्रीकृष्ण के मांगने पर उन्हे प्रेमपूर्वक भेट किया। श्रीकृष्ण ने उसका कूबर नष्ट करके उसे परम सुन्दरी बनाया। श्रीकृष्ण से वह प्रेम करने लगी तथा श्रीकृष्ण ने उसके आग्रह पर मथुरा में अपना कार्य-सिद्ध कर लेने के बाद उसके घर आने का वचन देकर उसे विदा किया। 'सूरसागर' मे वर्णन है कि श्रीकृष्ण उसके प्रेम को स्वीकार करके उसके यहाँ गए। उसने भी उद्धव के हाथ राधा और गोपियो के लिए पाती दी थी। भ्रमर-गीत मे गोपियो ने उसके प्रेम पर व्यंग्य किए हैं। द्र० भा०, स्क० १० पू०, अ० ४२; सू०, प० ३६६८-३६६६, ४२५६-४२६८। केसी (केशी) - श्रीकृष्ण को मारने के लिए कंस द्वारा भेजा हुआ एक अश्वरूपधारी

परिशिष्ट (ख) ३७७ असुर जो कृष्ण द्वारा मारा गया। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ३७; सू०, प० २०१४ । खगराज—गरुड पक्षी, जो विष्णु का वाहन माना जाता है और जो कश्यप की पत्नी विनता से उत्पन्न है। उनकी दूसरी पत्नी कद्रू से उत्पन्न सर्पों से इसकी जन्मजात शत्रुता है। एक बार सर्पों ने अपना भारी संहार देखकर प्रति मास बारी से एक सर्प देने का निश्चय किया, परन्तु कालीय नाग ने गर्ववश अपना हिस्सा नही दिया तथा गरुड़ से युद्ध किया। परन्तु अन्त में घायल होकर रमणक द्वीप छोड़ ब्रज मे यमुना के एक गम्भीर दह में जाकर रहने लगा, जहां ऋषि शाप के कारण गरुड नही जा सकता था। देखो रिषिसाप तथा काली। गज—हाथी (१) त्रिकूट पर्वत का एक प्रसिद्ध हाथी जो पूर्व जन्म में राजा इन्द्रद्युम्न था और अगस्त मुनि के शाप से पशु योनि को प्राप्त हुआ था। जलाशय मे स्नान करते समय एक बार एक ग्राह द्वारा पकडे जाने पर इसने भगवान् को सहायतार्थ पुकारा। भगवान् ने उसे ग्राहपाश से ही नही, पशु योनि से भी मुक्त कर दिया। द्र० भा०, स्कं० ८, अ० २-४; सू०, प० ४२८-४३३ । (२) कुवलया पीड। देखो कुवलया पीर। गजराज—देखो गज । गणिका—जीवन्ती नाम की एक वेश्या जो बिना समझे हुए भी तोते को राम नाम पढ़ाने के कारण मोक्ष पा गई । गर्ग—यादवो के पुरोहित; जिन्हे वसुदेव ने कृष्ण का नामकरण करने के लिए गोकुल भेजा था। कृष्ण-बलराम के अन्य संस्कारो में भी गर्ग मुनि के पौरोहित्य का उल्लेख हुआ है। गर्ग ने नामकरण के ही अवसर पर कृष्ण-बलराम के अलौ- किक व्यक्तित्व की सूचना दी थी। गुरु-सुत—कृष्ण-बलराम के गुरु सांदीपिनि का पुत्र, जो प्रभास क्षेत्र के सागर में डूब गया था और जिसे श्रीकृष्ण ने यमपुरी से लाकर गुरु-दक्षिणा मे गुरु को भेंट किया था। ग्राह—मगर, घड़ियाल, यहाँ पर इस ग्राह के लिए प्रयुक्त जिसने त्रिकूट पर्वत पर रहने वाले गजेन्द्र को सरोवर मे स्नान करते समय पकड़ा था। भगवान् विष्णु ने गज की पुकार पर उसे तो संकट-मुक्त किया ही, ग्राह का सर काट कर उसे भी पशुयोनि से मुक्त कर दिया। ग्राह पूर्व जन्म मे हू हू नामक गंधर्व था जो देवल ऋषि के शाप से ग्राह हो गया था। देखो गज । चानूर—(चाणूर)—कंस का एक असुर मल्ल, जिसे श्रीकृष्ण ने धनुष यज्ञ के अवसर पर आयोजित मल्ल-युद्ध में मारा था। पूर्व जन्म मे यह मय दानव था। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ४४; सू०, प० ३६८३-३६८५ ।

३७८ सूरसागर सार सटीक चौरासी -- चौरासी लाख योनियां, जन्म-जन्मान्तर मे आवागमन का चक्र । जमलार्जुन—(यमलाईुन)— यमल और अर्जुन नामक दो वृक्ष, जो पूर्व जन्म मे नल- कूबर और मणिग्रीव नामक कुवेर के दो पुत्र थे और नारद के शाप से वृक्ष हो गये थे। श्रीकृष्ण ने उलूखन-बंधन लीला मे उन्हें गिराकर शाप-मुक्त किया था। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ६; सू०, प० १०००-१००६ । तृनावर्त - (तृणावर्त) - एक असुर जो भयंकर वात-चक्र के साथ-तिनके के शिशु रूप में कृष्ण को मारने आया और उन्हें ऊपर आकाश में उड़ा ले गया। कृष्ण ने उसका संहार कर महाकाय राक्षस के रूप मे एक शिला पर पटक दिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ७; सू०, प० ६६४-६६८ । दावाग्नि - (दावाग्नि) - वह अग्नि जो वन में अपने आप प्रकट हो जाती है। यहां कृष्ण-लीला मे वर्णित वह दवानल जिसे ब्रजवासियो के रक्षार्थ श्रीकृष्ण पी गए थे। 'भागवत' मे दावानल-पान की लीला दो बार वर्णित है -- एक, जब कालिय-दमन के वाद सब ब्रजवासी रात मे यमुना के तट पर ही सो रहे थे, तब आधी रात को दावानल के प्रकट होने पर कृष्ण ने उसका पान करके भयात्तुर ब्रजवासियो को आश्वस्त किया था तथा दूसरी बार गोचारण के समय उसी प्रकार उन्होने गोपसखाओ की रक्षा की थी। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १७, १६; सू०, प० १२०८-१२१६, १२१२-१२३३ । दावानल - देखो दावाग्नि । दुरवासा- (दुर्वासा) - एक क्रोधी स्वभाव के ऋषि, जिन्हें राजा अम्बरीष ने एकादशी- पारण पर भोजन करने के लिए निमंत्रित किया था, परन्तु पारण का समय निकल जाने के डर से ऋषि को भोजन कराने के पहले ही भोजन करके उन्हे कुपित कर दिया था। देखो अंबरीष । दुस्सासन = (दुःशासन) - दुर्योधन का छोटा भाई, जिसने पांडवो के जुए मे हार जाने पर सभा मे द्रोपदी के वस्त्र खीचे थे । देखो द्रुपद-सुता । द्रुपदसुता- (द्रौपदी) - पजाव के राजा द्रुपद की पुत्री कृष्णा जो पांचों पाडवों की पत्नी थी और जिसे पांडव कौरवो के साथ जुए में हार गए थे । दुःशासन ने सबके सामने उसको बलात् नग्न करने का प्रयत्न किया । परन्तु संकट में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को स्मरण किया । श्रीकृष्ण योगमाया से उसका वस्त्र इतना बढ़ाते गये कि दुःशासन उसे खींचते-खींचते हार गया । द्रौपदी-देखो द्रुपद-सुता । धेनुक - तालाव मे रहने वाला एक गर्दभ रूपी असुर, जिसे बलभद्र ने पिछली टांगें पकड़, पटककर मार डाला था। उसके साथी अन्य गर्दभ रूपी राक्षसों ने जब आक्रमण किया तो उन्हे भी कृष्ण-बलराम ने पटक-पटककर मार डाला। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १५; सू०, प० १११७ ।

परिशिष्ट (ख) ३७६

ध्रुव—राजा उत्तानपाद और सुनीति के विष्णु-भक्त पुत्र, जो अत्यन्त बाल्यावस्था में विमाता-पुत्र उत्तम के कारण पिता द्वारा अपमानित होने पर विरक्त होकर निर्जन वन में घोर तपस्या करने चले गए । इन्द्रादि देवो के प्रयत्न करने पर भी जब इनकी तपस्या खण्डित नही हुई, तब भगवान् ने इन्हे ध्रुवलोक का वरदान दिया जो अटल है और समस्त लोकों, ग्रहो और नक्षत्रो का आधार है । नामदेव—तेरहवी-चौदहवी शती मे हुए दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध सन्त जिन्होने घर में आग लग जाने पर उसे बुझाया नही, बल्कि बची-खुची वस्तुएँ भी उस अग्निदेव को अर्पित कर दी । कहते है, भगवान् ने प्रसन्न होकर रातों- रात उनका छप्पर अपने हाथों छा दिया था । नारद—ब्रह्मा के मानस-पुत्र, वीणा लेकर हरि कीर्तन करते हुए निरन्तर भ्रमण करने वाले श्रेष्ठ वैष्णव भक्त, जो पूर्व जन्म मे किसी दासी के पुत्र थे और वेदान्ती मुनियो की सेवा करने तथा उनका जूठा भोजन करने से जिनके हृदय मे पाँच वर्ष की अवस्था से ही वैराग्य पैदा हो गया था । सौभाग्य से इनकी माता भी मर गईं जिससे ये निर्जन वन मे जाकर भगवान् का ध्यान करने में सफल हुए । भगवान् ने इन्हे हृदय में तो दर्शन दिए, परन्तु इस जन्म में प्रत्यक्ष दर्शन होना असम्भव बताया । फिर भी भक्ति का परम वरदान पाकर ये कालांतर मे परम धाम के अधिकारी हुए । नारद भक्तों मे ही नही, विमुखो के बीच भी विचरते हैं। कंस को उसके अन्तिम परिणाम तक पहुँचाने के लिए नारद ही बराबर उसको सलाह देते रहे । नृग—इक्ष्वाकु वंश का एक दानी राजा, जो ब्राह्मण को दान मे दी हुई गाय भूल से पुनः दूसरे ब्राह्मण को दे देने के कारण गिरगिट हो गया था और जिसे श्री कृष्ण के स्पर्श मात्र से पुनः मनुष्य रूप मिला और जो भगवत्कृपा से श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर दिव्य लोक चला गया । पूतना—कंस की भेजी हुई एक राक्षसी, जो शिशु कृष्ण के प्रति वात्सल्य दिखाकर विष लगे स्तन का दूध पिलाकर उन्हे मार डालना चाहती थी, परन्तु जिसे उलटे कृष्ण ने दूध पीते-पीते मार डाला और इस तरह उसका उद्धार कर दिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ६; सू०, प० ६६७-६७३ । प्रलब—एक असुर, जो कृष्ण-बलराम को हर ले जाने के लिए गोप रूप धारण करके वृन्दावन मे गोचारण के समय गोपों के साथ मिल गया और उनके साथ खेलने लगा। खेल मे हारने पर जब वह बलराम को पीठ पर लादकर ले चला तो उसका असली उद्देश्य और रूप प्रकट हुआ। बलराम ने भयंकर असुर को एक ही मुष्टि-प्रहार से मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १८; सू०, प० १२२२ ।

३८० सूरसागर सार सटीक प्रह्लाद—एक आदर्श वैष्णव भक्त जो अपने पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु द्वारा सर्प से कटवाए जाने, हाथी से कुचलवाए जाने, पहाड़ से गिराए जाने तथा अग्नि मे जलाए जाने, पर भी विष्णु की भक्ति से विचलित नही हुआ । सर्वव्यापक भगवान् ने उसकी निरन्तर रक्षा की और इसी हेतु खम्भे से नृसिंह रूप मे प्रकट होकर पापी हिरण्यकशिपु का वध कर दिया । बक, बका (बकासुर)—बगले के रूप मे कृष्ण को निगलकर मारने के लिए आया एक असुर, जिसने गोचारण के समय (अपनी तीक्ष्ण चोच से पकड़कर) कृष्ण को निगल लिया, परन्तु तालू जलने के कारण उन्हे उगलना पडा । कृष्ण ने उसकी चोच को विदीर्ण कर उसे मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ११; सू०, प० १२४५ । बकासुर—देखो बक, बका ! बकी—बकासुर और अघासुर की वहन, पूतना । देखो पूतना । वरुन-फाँस—(वरुण-पाश)—एकादशी व्रत के वाद एक बार नन्द आसुरी वेला मे ही यमुना-स्नान करने चले गए । इस पर जल-देवता वरुण का किंकर उन्हे वरुण के पास ले गया । श्रीकृष्ण को जब यह मालूम हुआ तो वे स्वयं वरुणालय जाकर पिता को पाश से छुड़ा लाए । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० २८; सू०, प० १६०२ । बलि—एक दानशील, तपस्वी और पुण्यात्मा दैत्यराज जो प्रह्लाद के पौत्र और विरो- चन के पुत्र थे । अपने पुण्यबल से ये इन्द्र का पद लेने ही वाले थे कि इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान् विष्णु ने वटुक वामन का रूप धारणकर दैत्यराज से तीन पद पृथ्वी माँग ली और फिर वृहदाकार धारण करके समस्त भूमण्डल और स्वर्ग को दो पदो से तथा स्वयं बलि के शरीर को तीसरे पद से नाप लिया । अन्त में भगवान् ने प्रह्लाद की अनुनय-विनय तथा बलि के पुण्यकृत्यो से प्रसन्न होकर उन्हें रोग-जरा-मृत्युहीन सुतल मे रहने का तथा इन्द्र पद प्राप्ति का वरदान दिया । बसुद्यौ—(वसुदेव)—श्रीकृष्ण-बलराम के पिता । बासुदेव —(वासुदेव)—भागवत (पांचरात्र या वैष्णव) धर्म के आदि देव जो प्रारम्भ में वृष्णिवंशीय सात्वतो के पूज्य थे । 'हरिवंश' तथा पुराणो के अनुसार श्रीकृष्ण ही असली और द्वितीय वासुदेव हुए । स्वयं श्रीकृष्ण ने अन्य राजाओं (शृंगाल, पौड्रक) के मिथ्या वासुदेवत्व को सिद्ध करके इसे प्रमाणित किया था । वसुदेव के पुत्र होने के कारण भी श्रीकृष्ण वासुदेव कहलाते हैं। बिदुर—(विदुर) —दासी के गर्भ से उत्पन्न व्यास के ओरस पुत्र तथा धृतराष्ट्र और पांडु के भाई, जो अत्यन्त न्यायशील, विवेकशील और भक्त-हृदय थे। महा- भारत युद्ध के पहले समझौता कराने के लिए जब कृष्ण दुर्योधन के यहाँ गये

थे तब विदुर के घर ही ठहरे थे । दुर्योधन के अभिमान भरे राजसी आतिथ्य के स्थान पर उन्हे विदुर का प्रेमभरा साग-पात का भोजन अधिक रुचा था । विभीषण—(विभीषण)—रावण का भाई, जो राक्षस कुल का होते हुए भी अत्यन्त न्यायशील, धर्मात्मा और राम-भक्त था । राम ने उसके योग-क्षेम के लिए तथा उसे लंकापति बनाने के लिए सीता को लौटाने या शक्ति बाण से आहत मरणासन्न लक्ष्मण को जिलाने से भी अधिक चिंता प्रकट की थी । व्याध — (व्याध) — आदिकवि वाल्मीकि जो प्रारम्भ मे अनाथ ब्राह्मण बालक होने के कारण भीलो द्वारा पाले गए थे । जीव हत्या और डकैती ही इनका व्यवसाय था । इनकी स्त्री भी एक भीलनी थी । एक बार सप्तर्षियों पर डाका डालने के बाद ये 'मरा' 'मरा' जपने लगे, जो 'राम' 'राम' का मन्त्र हो गया । इसी से इन्हे सद्बुद्धि मिली और इन्होने घोर तपस्या करके उद्धार पाया । व्योम— (व्योमासुर)—मयासुर का पुत्र एक असुर, जो एक बार पर्वत शिखरो पर 'निलायन' नामक खेल खेलते हुए गोपो मे गोप बनकर मिल गया और खेल मे पशु बने हुए बालको को एक-एक करके ले जाने लगा । श्रीकृष्ण उसकी माया ताड़ गए और उन्होने उसे दबोचकर तथा पटककर मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १०, अ० ३७; सू०, प० २०१५ । ब्रह्मा — त्रिदेव में से एक, परन्तु पुराणो मे विष्णु की अपेक्षा उन्हे सदैव नीचा चित्रित किया गया है । विष्णु ने इन्हे नाभि-कमल से उत्पन्न करके सृष्टि रचना का भार इन्ही को सौंपा तथा सर्वप्रथम इन्हीं को वेद का ज्ञान दिया । 'भागवत' के अनुसार सर्वप्रथम ब्रह्मा ने ही चतुश्लोकी 'भागवत' विष्णु भगवान् के मुख से सुनी थी, वही उन्होने अपने मानस पुत्र नारद को सुनाई तथा नारद ने उसे व्यास को सुनाया । 'भागवत' मे ब्रह्मा की अपेक्षा कृष्ण की महिमा अधिक सिद्ध करने के लिए ब्रह्मा द्वारा अज्ञानवश गोचारण के अवसर पर गो-वत्स हरण का प्रसंग वर्णित है । श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा का मोह और गर्व मिटाने के लिए हरण किए गए गो-वत्स की ही तरह नवीन गो-वत्स की सृष्टि कर ली । तब ब्रह्मा ने शरण मे जाकर कृष्ण की स्तुति की । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १३-१४; सू०, प० १०५४-१०५६, ११०१-११०६, १११० । भृगु — एक ऋषि, जो शिव के पुत्र कहे गये हैं । एक बार यह जानने के लिए कि त्रिदेव मे सबसे बड़ा कौन है, इन्होने तीनो का अपमान किया । ब्रह्मा और महेश तो क्रुद्ध हो गए; परन्तु जब उन्होने विष्णु को लात मारकर सोते से जगाया, तब उन्होने क्रोध करने के बजाय इनसे पूछा कि आपके पैर मे चोट तो नही लगी तथा उनके पद-चिन्ह को सदैव अपने वक्ष पर धारण किया । द्र० भा०, स्कं० १० उ, अ० ८६; सू०, प० ४८२६ ।

३८२ , सूरसागर सार सटीक ' भृगु-पद - विष्णु भगवान् के वक्ष-स्थल पर स्थायी रूप से स्थापित भृगु-ऋषि का पद- चिन्ह । देखो भृगु । मुचकुन्द - अयोध्या का एक प्राचीन राजा, मांधाता का पुत्र, जो देवासुर संग्राम मे देवो की ओर से लड़ते-लड़ते थककर हिमालय की एक गुफा में सो गया था । कालयवन द्वारा खदेड़े जाकर श्रीकृष्ण जब उस गुफा में पहुँचे तो उन्होने अपना पीतांबर उसे ओढा दिया । पीछे से कालयवन ने आकर उसी को कृष्ण समझा और उस पर आक्रमण किया । मुचकुन्द के नेत्र खोलते ही कालयवन भस्म हो गया । देखो कालयवन । मुष्टिक - कंस का एक असुर मल्ल जिसे धनुष-यज्ञ पर आयोजित मल्लकीड़ा मे बलराम ने मारा था । दूसरे मल्ल, चाणूर को कृष्ण ने मारा था । देखो चाणूर । रंभा - एक अति रूपवती अप्सरा, चौदह रत्नो मे से एक, जो इन्द्र-सभा की शोभा बढ़ाती है । रजक - धोबी, यहाँ कंस का विशिष्ट धोबी, जिसे मथुरा में प्रवेश करते समय, कृष्ण ने धुले कपड़े ले जाते देखा और माँगने पर कपड़े देना अस्वीकार करने के कारण एक तमाचे के प्रहार से मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ४१; सू०, प० ३६५५-३६६० । राजसूय -- चक्रवर्ती सम्राट् द्वारा किया जाने वाला यज्ञ, जिसमे अन्य राजागण सेवक बनते है। यहाँ युधिष्ठिर द्वारा किया गया राजसूय यज्ञ जिसमे श्रीकृष्ण ने अभ्यागत जनो के पैर धोने का सेवक-कार्य स्वेच्छा से ग्रहण किया था । इसी यज्ञ मे सबसे पहले श्रीकृष्ण के पूजे जाने पर कुपित होकर शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को गालियां दी तथा श्रीकृष्ण ने सुदर्शनचक्र से उसका वध किया । इसी यज्ञ के अवसर पर अभिमानी और ईर्ष्यालु दुर्योधन ने जब भाइयो सहित प्रवेश किया तो सूखे मे जल का तथा जल मे सूखे का भ्रम होने से वह हास्यास्पद आचरण करने लगा । जिससे पांडव, उनकी स्त्रियां आदि सभी हँसने लगे तथा दुर्योधन अत्यन्त लज्जित हुआ । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ७५-७६; सू०, प० ४८३७-४८३८ । राहु - सिंहि का पुत्र, एक असुर । समुद्र-मथन के बाद देवताओं मे सम्मिलित होकर अमृत-पान करने के अपराध मे विष्णु ने इसका सर काट डाला था । परन्तु अमृत के प्रभाव से वह राहु (सर) तथा केतु (धड) के रूप में अमर रहा । सूर्य और चन्द्रमा ने ही पहचानकर उसकी शिकायत कर दी थी, अतः वह उनसे शत्रुता मानकर उन्हे 'ग्रहण' के रूप मे ग्रसता रहता है । रिषि-साप (ऋषि-शाप) - सोभरि ऋषि का गरुड को शाप । एक बार ब्रज मे यमुना के एक गम्भीर दह मे - जो बाद में कालियदह नाम से प्रसिद्ध हुआ - सौभरि ऋषि के रोकने पर भी गरुड ने एक भारी मच्छ खा डाला । उसके वियोग मे

परिशिष्ट (ख) ३८३ तड़पती मछलियों के दुख से द्रवित होकर ऋषि ने शाप दिया कि यदि गरुड यहां किसी मछली को खाएगा तो तुरन्त उसकी मृत्यु हो जायगी । कालियनाग इस रहस्य को जानता था । अतः वह गरुड से बचने के लिए वहीं जाकर रहता था । देखो काली तथा खगराइ । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १७ । लाक्षा-गृह (लाक्षा-गृह) - पांडवो के जलाने के लिए दुर्योधन ने लाख का एक घर बनवाया था परन्तु भगवत्कृपा से पांडव उससे जीवित निकल आए थे । श्रीदामा - श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय और प्रधान गोप-सखा जो बाल-केलि और गोचारण की लीला मे सदैव उनके साथ रहे । 'सूरसागर' के अनुसार कालियदमन लीला का तत्काल कारण उस कंदुक-क्रीड़ा मे आ उपस्थित होता है जिसमे श्रीकृष्ण ने श्रीदामा की गेंद कालियदह मे फेक दी थी और श्रीदामा ने वापस देने का आग्रह किया था । तभी श्रीकृष्ण गें लेने के लिए कालियदह में कूद पड़े थे । ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्म खण्ड) के अनुसार श्रीदामा के शाप के कारण ही राधा और कृष्ण को अवतार लेना पड़ा था । संकर्षण (संकर्षण) - बलराम, वसुदेव के ज्येष्ठ पुत्र, जो पहले देवकी के गर्भ में आए थे, परन्तु विष्णु की माया से देवकी का गर्भ संकर्षित होकर रोहिणी में स्थापित हो गया था ! इसलिए जब ये नन्द के यहाँ रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए, तब गर्ग ने इनका नाम संकर्षण रखा । ये चार व्यूहो - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - मे से एक हैं जो दुष्टो का संहार करते है । बलराम उद्धत- स्वभाव और मद्यप्रिय कहे गये हैं । हल और मूसल इनके अस्त्र है । इसी कारण ये हलधर भी कहे जाते है । सकट (शकट) - छकड़ा या गाड़ी, परन्तु यहाँ वह छकड़ा जिसे पालने मे लेटे शिशु कृष्ण ने पैर से उछालकर गिरा दिया था जिससे वह चूर-चूर हो गया था और उसमें रखे दूध-दही आदि के अनेक बर्तन टूट-फूट गए थे । इस विस्मय- जनक कार्य पर किसी को विश्वास हुआ, किसी को नही । यशोदा ने उसे ग्रहो का उत्पात समझा और स्वस्तिवाचन कराया । 'सूरसागर' मे इसे भी कस का भेजा एक असुर (शकटासुर) कहा गया है । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ७; सू०, प० ६७६-६८० । सनक - सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार मे से एक । ये ब्रह्मा के मानस पुत्र तथा विष्णु के परम भक्त विख्यात हैं । इन लोगो के भक्ति में निरत हो जाने के कारण ब्रह्मा को अन्य पुत्रों की उत्पत्ति करनी पड़ी थी । ये विष्णु के सभासद भी कहे जाते हैं ! विष्णु के द्वारपाल जय-विजय द्वारा रोके जाने पर इन्होने ही उन्हें असुर होने तथा तीसरे जन्म मे उद्धार पाने का शाप और वरदान दिया था । इन चारों में सनत्कुमार सबसे अधिक प्रसिद्ध है । चारो को प्रायः सनकादि कहकर अभिहित किया जाता है ।

३८४ सूरसागर सार सटीक सनकादि—देखो सनक । सिंधु-सुता—लक्ष्मी जो समुद्रमंथन के समय निकले हुए १४ रत्नो मे से एक थी । सुक (शुक, शुकदेव)—व्यास के पुत्र, महान् पौराणिक कथाकार, जिन्होने परीक्षित को 'भागवत' की कथा सुनाई थी । जिस समय शिव जी एकांत मे उमा को विष्णुसहस्रनाम सुना रहे थे, एक शुक भी उसे सुन रहा था । शिव जी ने जब यह जाना तो वे शुक को मारने दौडे । शुक आत्म-रक्षार्थ व्यास पत्नी के मुंह मे चला गया और १२ वर्ष तक उनके गर्भ मे रहा । इस बीच वेदव्यास ने भागवतादि की समस्त कथाएँ अपनी पत्नी को सुनाई । शुक भी सुनता रहा । भगवान् ने इसे गर्भ मे ही तत्वज्ञानी और मायारहित होने का वरदान दिया था । जो कथा व्यास ने शुकदेव को सुनाई, वही शुकदेव से परीक्षित ने सुनी । सुदामा—गुरु सांदीपिनि के यहां श्रीकृष्ण के सहपाठी, उनके एक प्रसिद्ध बालसखा, जो एक अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण थे । पत्नी के बार-बार कहने पर वे अपनी दारुण दरिद्रता दूर करने की आशा मे श्रीकृष्ण के यहाँ द्वारकापुरी मे गए । मित्र को भेट देने के लिए वे केवल थोड़े से चावल ले जा सके थे, परन्तु वे उसे छिपा रहे थे । श्री.कृष्ण ने चावलों की पोटली उनसे आग्रहपूर्वक छीन ली और उसमे से दो मुट्ठी चावल फांक लिए । तीसरी मुट्ठी भरते समय रुक्मिणी जी ने उन्हे रोक दिया । सुदामा जब लौटे तो सोचने लगे कि किसी भलाई के लिए ही श्रीकृष्ण ने मुझे यथेष्ट धन नही दिया । परन्तु जब घर पहुँचे तो वे चकित हो गए । उनके यहां अपार वैभव हो गया था । दो मुट्ठी चावल फांककर ही भगवान् ने उन्हे लोक-परलोक की सम्पत्ति दे डाली । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ८०, ८१; सू०, प० ४८४२-४८६३ । सुफलकसुत—अक्रूर । देखो अक्रूर । हरिश्चन्द्र—सूर्यवंश के एक प्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञ राजा, जिनसे राजसूय-यज्ञ की दक्षिणा के बहाने विश्वामित्र ने सर्वस्व हर लिया था । उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा की सबसे कठोर परीक्षा तब हुई जब वे एक चाडाल के क्रीतदास के रूप मे श्मशान पर पहरा दे रहे थे । उसी समय उनकी पत्नी शैव्या, जो एक ब्राह्मण को बेच दी गई थी, अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का अन्तिम संस्कार करने आई । हरि- श्चन्द्र के श्मशान-कर मांगने पर जब शैव्या ने अपनी असमर्थता प्रकट की, तो इन्होने उस कर के बदले मे अपनी आधी साड़ी फाड़कर देने के लिए विवश किया । इसी समय भगवान् प्रकट हो गए ।

पदानुक्रमणी अंक पृष्ठ-संख्या के द्योतक हैं। अँखियन तब तैं बेर घरची । १४५ अब यह बरषो बीति गई । २५३ अँखियां हरि कैं हाथ बिकानीं । १४५ अब या तनहिं राखि कह कीजे । २५५ अँखियां हरि दरसन की प्यासी । २८५ अब ये झूठहु बोलत लोग । ६८ अंतरजामी कुँवर कन्हाई । २६० (अलि हों) कैसें कहाँ हरि के अंतर तैं हरि प्रगट भए । ११७ रूप रसहिं । २८२ अचंभो इन लोगनि की आवै । ४२ अब वै वातैं उलटि गई । २३६ अति कोमल तनु घरच्यो कन्हाई । ८१ अब हरि आइहैं जनि सोचै । ३५७ अति मलीन वृषभानु-कुमारी । ३२४ अबहीं तैं हम सबनि बिसारी । ८७ अद्भुत एक अनूपम बाग । १८६ अविगत-गति कछु कहत न आवै । १७ अधर-रस मुरली लूटन लागी । ८६ आंखिनि मैं वसी, जिय मैं बसे, १७१ अनत सुत गोरस कौं कत जात ? ७२ आए जोग सिखावन पांडे । २८७ अपने सगुन गोपालहिं माई, ३०७ आछी गात अकार गारची । २६ अपने स्वारथ के सब कोऊ । ३१४ आजु अति कोपे हैं रन राम । ३७० अपनौ गाउँ लेउ नंदरानी । ७१ आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री । ८३ अपुनपौ आपुन ही बिसरयौ । ४४ आजु कोउ नीकी बात सुनावै । २७० अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ । ४५ आजु घनस्याम की अनुहारि । २५१ अब अति चकितवंत मन मेरौ । ३२५ आजु जसोदा जाइ कन्हैया, ८२ अब कैं राखि लेहु गोपाल । ८३ आजु नंद के द्वारैं भीर । ४६ अब कैं राखि लेहु भगवान । २६ आजु मैं गाइ चरावन जैहौं । ८० अब घर काहूँ कें जनि जाहु । ७७ आजु रैनि नहिं नींद परी । २१५ अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम । १८७ आजु सखी अरुनोदय मेरे, १८१ अब तौ प्रगट भई जग जानी । १३४ आजु हरि अद्भुत रास उपायौ । ११८ अब नंद गाइ लेहु संभारि । २१४ आजु हौं एक-एक करि टरिहौं । २७ अब बरषा कौ आगम आयौ । २४६ आनंदै आनंद बढ़यो अति । ५७ अब मैं जानी, देह बुढानी । ३६ आपु गए हारूएँ सूनैं घर । ६७ अब मैं तोसौं कहा दुराऊँ । १८४ आपुन भईं सबै अब चोरी । १२४ अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल । २८ आयौ घोष बड़ो व्योपारी । ३१४ २१

३८६ सूरसागर सार सटीक आवत उरग नाथे स्याम । ६३ ऊधौ कही सांची बात । २७४ आवत मोहन धेनु चराए । १३८ ऊधौ कहौ हरि कुसलात । २७५ आवहु री मिलि मंगल गावहु । ३४१ ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत । ३०४ इक दिन नंद चलाई बात । २३३ ऊधौ कोउ नाहींन अधिकारी । ३०८ इत-उत देखत जनम गयौ । ३४ ऊधौ कोकिल कूकत कानन । ३१३ इततैं राधा जाति जमुन-तट, १७२ ऊधौ क्यौं बिसरत वह नेह । ३१७ इतनी बात अलि कहियो हरि सौं, ३२१ ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । ३२७ इन अखियन आगैं तैं मोहन, ६८ ऊधौ जात ब्रजहिं सुने । २६६ इनकौं ब्रजहीँ क्यौं न बुलावहु । १८१ ऊधौ जू, कहियो तुम हरि सौं, ३२१ इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ । १४२ ऊधौ जोग कहा है कीजतु । ३१४ इहिँ अंतर मधुकर इक आयौ । २७८ ऊधौ जोग जोग हम नाहीं । ३११ इहिँ उर माखन चोर गडे । २८८ ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु । ३०४ इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए । ३१८ ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे । ३०६ इहिँ दुख तन तरफत मरि जैहैं । २५७ ऊधौ तिहारे पा लागति हौं, ३२५ इहिँ विधि पावस सदा हमारैं । ३१२ ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारी । २८१ इहिँ विधि वेद-मारग सुनो । १११ ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ । २६३ उग्रसेन कौं दियौ हरि राज । २२३ ऊधौ तुम हौ निकट के बासी । २८४ उठे कहि माधौ इतनी बात । २२७ (ऊधौ) ना हम विरहिनि ना तुम उत नंदहिं सपनौ भयौ, २११ दास । ३०४ उती दूर तैं को आवै री । ३५१ ऊधौ पा लागति हौं कहियौ, ३२५ उनकौं ब्रज बसिबौ नहिं भावै । २५८ ऊधौ बानी कौन ठहरैगौ, २८० उपमा नैन न एक रही । २८६ ऊधौ भली भई ब्रज आए । ३०२ उपमा हरि तनु देख लजानी । १३८ ऊधौ भलो ज्ञान समुझायौ । ३३१ उमगीं ब्रजनारि सुभग, ५४ ऊधौ मन अभिमान बढायौ । २६३ उरग लियो हरि को लपटाइ । ६१ ऊधौ मन न भए दस बीस । २८८ उलटि पग कैसैं दीन्हौ नद । २२८ ऊधौ मन नहिं हाथ हमारैं । २८८ उलटी रीति तिहारी ऊधौ, २८४ ऊधौ मन माने की बात । ३१८ ऊधौ अँखियां अति अनुरागी । २८६ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इक पतिया हमरी लीजे । ३२२ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इतनी कहियो जाइ । २६८ ऊधौ मौन साधि रहे । ३०८ ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । ३२४ ऊधौ ले चल लै चल । ३०५ ऊधौ इतनी कहियो बात । ३२३ ऊधौ सुधि नाहीं या तन की । ३१६ ऊधौ कहा करैं लै पाती । २७७ ऊधौ सुनहु नैकु जो बात । ३१० ऊधौ कही सु फेरि न कहिए । २८८ ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी । २८२

पदानुक्रमणी ३८७ ऊधो हमरी सौं तुम जाहु । ३०८ ऊधो हमहिं न जोग सिखैये। २६७ ऊधो हरि काहे के अंतरजामी । २८१ ऊधो हरि गुन हम चकडोर । २८४ एक गाउँ के वास वसो हौं, १३५ एक द्यौस कुंजनि मैं माई । २५६ एई सुत नंद अहीर के । २२० ऐसी कुंवरि कहां तुम पाई । १६२ ऐसी प्रीति की बलि जाउँ । ३४५ ऐसी बात कही जनि ऊधो । २८६ ऐसी रिस मैं जो धरि पाऊँ । ७४ ऐसे आपु स्वारथी नैन । १४२ ऐसैं जनि वोलहु नंद लाला । १२४ ऐसी जोग न हम पै होइ । ३०३ ऐसी दान मांगिये नहिं जौ, १२३ ऐसौ सुनियत द्वै वैसाख । ३१२ और सकल अंगनि तैं ऊधो, २८५ कंत सिधारौ मधुसूदन पे, ३४४ कंस नृपति अक्रूर बुलाये । २११ कंस वध्यौ कुविजा कैं काज । २३२ कंस बुलाइ दूत इक लीन्हो । ८७ कन्हैया तू नहिं मोहिं डरात । ७३ कपट करि ब्रजहिं पूतना आई । ५० कपटी नैननि तैं कोउ नाहीँ । १४४ कब देखौँ इहिं भांति कन्हाई । २४० कब री मिले स्याम नहिं जानौँ । १६७ कबहुँ सुधि करत गुपाल हमारी । २७३ कमल-नैनि हरि करो कलेवा । ६१ कर कंपै, कंपन नहिं छूटै । ३६५ करत अचगरी नंद महर की । १२३ करत कान्ह ब्रज-घरनि अचगरी । ७१ करतल-सोभित बान धनुहियां । ३६४ करति अवसेर वृषभानु-नारी । १८० करन दै लोगनि कौं उपहास । १३५ कर पग गहि, अँगुठा मुख मेलत । ५१ करि गए थोडे दिन की प्रीति । २३७ करिहौ मोहन कहूँ संभारि, २५८ करी गोपाल की सब होइ । ३१ कहत नंद जसुमति सौं बात । ६४ कहत स्याम श्रीमुख यह वानी । ११२ कहन लागे मोहन मैया-मैया । ५७ कहाँ रह्यो मेरी मनमोहन । २३० कहा कहति तू मोहिं री माई । १३३ कहा तुम इतनैं हि कौं गरवानी । २०१ कहा भई धनि बावरी, १६३ कहा भयो जो घर कैं लरिका, ७५ कहा भयो मेरो गृह माटी कौ । ३४७ कहा होत जो हरि हित चित धरि, ३१६ कहा हौ ऐसे ही मरि जैहौं । २१६ कहि धौँ री वन बेलि कहूँ तैं, ११४ कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ? ३६६ कहिवे मैं न कछू सक राखी । ३३२ कह्यौ कान्ह सुनि जसुदा मैया । २७३ कहियो जसुमति की आसीस । ३२७ कहियो ठकुराइति हम जानी । २४२ कहि राधा हरि कैसे हैं । १६३ कहि राधा ये को है री । १८० कहि राधिका बात अब सांची । १६६ कहै भामिनी कंत सौं, ११५ (कहौं कहा) अंगनि की सुधि बिसरि गईँ । ८५ काको काको मुख माई बातनि कौं गहिये । १५८ काग-रूप इक दनुज घरचो । ५१ कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? १२५ कान्ह कह्यो वन रैनि न कीजै, १७८ कान्ह कुंवर की करहु पासनी, ५३ कान्हहिं वरजति किन नंदारानी । ६८