भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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परिशिष्ट (ख) ३७६

ध्रुव—राजा उत्तानपाद और सुनीति के विष्णु-भक्त पुत्र, जो अत्यन्त बाल्यावस्था में विमाता-पुत्र उत्तम के कारण पिता द्वारा अपमानित होने पर विरक्त होकर निर्जन वन में घोर तपस्या करने चले गए । इन्द्रादि देवो के प्रयत्न करने पर भी जब इनकी तपस्या खण्डित नही हुई, तब भगवान् ने इन्हे ध्रुवलोक का वरदान दिया जो अटल है और समस्त लोकों, ग्रहो और नक्षत्रो का आधार है । नामदेव—तेरहवी-चौदहवी शती मे हुए दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध सन्त जिन्होने घर में आग लग जाने पर उसे बुझाया नही, बल्कि बची-खुची वस्तुएँ भी उस अग्निदेव को अर्पित कर दी । कहते है, भगवान् ने प्रसन्न होकर रातों- रात उनका छप्पर अपने हाथों छा दिया था । नारद—ब्रह्मा के मानस-पुत्र, वीणा लेकर हरि कीर्तन करते हुए निरन्तर भ्रमण करने वाले श्रेष्ठ वैष्णव भक्त, जो पूर्व जन्म मे किसी दासी के पुत्र थे और वेदान्ती मुनियो की सेवा करने तथा उनका जूठा भोजन करने से जिनके हृदय मे पाँच वर्ष की अवस्था से ही वैराग्य पैदा हो गया था । सौभाग्य से इनकी माता भी मर गईं जिससे ये निर्जन वन मे जाकर भगवान् का ध्यान करने में सफल हुए । भगवान् ने इन्हे हृदय में तो दर्शन दिए, परन्तु इस जन्म में प्रत्यक्ष दर्शन होना असम्भव बताया । फिर भी भक्ति का परम वरदान पाकर ये कालांतर मे परम धाम के अधिकारी हुए । नारद भक्तों मे ही नही, विमुखो के बीच भी विचरते हैं। कंस को उसके अन्तिम परिणाम तक पहुँचाने के लिए नारद ही बराबर उसको सलाह देते रहे । नृग—इक्ष्वाकु वंश का एक दानी राजा, जो ब्राह्मण को दान मे दी हुई गाय भूल से पुनः दूसरे ब्राह्मण को दे देने के कारण गिरगिट हो गया था और जिसे श्री कृष्ण के स्पर्श मात्र से पुनः मनुष्य रूप मिला और जो भगवत्कृपा से श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर दिव्य लोक चला गया । पूतना—कंस की भेजी हुई एक राक्षसी, जो शिशु कृष्ण के प्रति वात्सल्य दिखाकर विष लगे स्तन का दूध पिलाकर उन्हे मार डालना चाहती थी, परन्तु जिसे उलटे कृष्ण ने दूध पीते-पीते मार डाला और इस तरह उसका उद्धार कर दिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ६; सू०, प० ६६७-६७३ । प्रलब—एक असुर, जो कृष्ण-बलराम को हर ले जाने के लिए गोप रूप धारण करके वृन्दावन मे गोचारण के समय गोपों के साथ मिल गया और उनके साथ खेलने लगा। खेल मे हारने पर जब वह बलराम को पीठ पर लादकर ले चला तो उसका असली उद्देश्य और रूप प्रकट हुआ। बलराम ने भयंकर असुर को एक ही मुष्टि-प्रहार से मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १८; सू०, प० १२२२ ।