सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ सूरसागर सार सटीक चौरासी -- चौरासी लाख योनियां, जन्म-जन्मान्तर मे आवागमन का चक्र । जमलार्जुन—(यमलाईुन)— यमल और अर्जुन नामक दो वृक्ष, जो पूर्व जन्म मे नल- कूबर और मणिग्रीव नामक कुवेर के दो पुत्र थे और नारद के शाप से वृक्ष हो गये थे। श्रीकृष्ण ने उलूखन-बंधन लीला मे उन्हें गिराकर शाप-मुक्त किया था। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ६; सू०, प० १०००-१००६ । तृनावर्त - (तृणावर्त) - एक असुर जो भयंकर वात-चक्र के साथ-तिनके के शिशु रूप में कृष्ण को मारने आया और उन्हें ऊपर आकाश में उड़ा ले गया। कृष्ण ने उसका संहार कर महाकाय राक्षस के रूप मे एक शिला पर पटक दिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ७; सू०, प० ६६४-६६८ । दावाग्नि - (दावाग्नि) - वह अग्नि जो वन में अपने आप प्रकट हो जाती है। यहां कृष्ण-लीला मे वर्णित वह दवानल जिसे ब्रजवासियो के रक्षार्थ श्रीकृष्ण पी गए थे। 'भागवत' मे दावानल-पान की लीला दो बार वर्णित है -- एक, जब कालिय-दमन के वाद सब ब्रजवासी रात मे यमुना के तट पर ही सो रहे थे, तब आधी रात को दावानल के प्रकट होने पर कृष्ण ने उसका पान करके भयात्तुर ब्रजवासियो को आश्वस्त किया था तथा दूसरी बार गोचारण के समय उसी प्रकार उन्होने गोपसखाओ की रक्षा की थी। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १७, १६; सू०, प० १२०८-१२१६, १२१२-१२३३ । दावानल - देखो दावाग्नि । दुरवासा- (दुर्वासा) - एक क्रोधी स्वभाव के ऋषि, जिन्हें राजा अम्बरीष ने एकादशी- पारण पर भोजन करने के लिए निमंत्रित किया था, परन्तु पारण का समय निकल जाने के डर से ऋषि को भोजन कराने के पहले ही भोजन करके उन्हे कुपित कर दिया था। देखो अंबरीष । दुस्सासन = (दुःशासन) - दुर्योधन का छोटा भाई, जिसने पांडवो के जुए मे हार जाने पर सभा मे द्रोपदी के वस्त्र खीचे थे । देखो द्रुपद-सुता । द्रुपदसुता- (द्रौपदी) - पजाव के राजा द्रुपद की पुत्री कृष्णा जो पांचों पाडवों की पत्नी थी और जिसे पांडव कौरवो के साथ जुए में हार गए थे । दुःशासन ने सबके सामने उसको बलात् नग्न करने का प्रयत्न किया । परन्तु संकट में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को स्मरण किया । श्रीकृष्ण योगमाया से उसका वस्त्र इतना बढ़ाते गये कि दुःशासन उसे खींचते-खींचते हार गया । द्रौपदी-देखो द्रुपद-सुता । धेनुक - तालाव मे रहने वाला एक गर्दभ रूपी असुर, जिसे बलभद्र ने पिछली टांगें पकड़, पटककर मार डाला था। उसके साथी अन्य गर्दभ रूपी राक्षसों ने जब आक्रमण किया तो उन्हे भी कृष्ण-बलराम ने पटक-पटककर मार डाला। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १५; सू०, प० १११७ ।