सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० सूरसागर सार सटीक प्रह्लाद—एक आदर्श वैष्णव भक्त जो अपने पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु द्वारा सर्प से कटवाए जाने, हाथी से कुचलवाए जाने, पहाड़ से गिराए जाने तथा अग्नि मे जलाए जाने, पर भी विष्णु की भक्ति से विचलित नही हुआ । सर्वव्यापक भगवान् ने उसकी निरन्तर रक्षा की और इसी हेतु खम्भे से नृसिंह रूप मे प्रकट होकर पापी हिरण्यकशिपु का वध कर दिया । बक, बका (बकासुर)—बगले के रूप मे कृष्ण को निगलकर मारने के लिए आया एक असुर, जिसने गोचारण के समय (अपनी तीक्ष्ण चोच से पकड़कर) कृष्ण को निगल लिया, परन्तु तालू जलने के कारण उन्हे उगलना पडा । कृष्ण ने उसकी चोच को विदीर्ण कर उसे मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ११; सू०, प० १२४५ । बकासुर—देखो बक, बका ! बकी—बकासुर और अघासुर की वहन, पूतना । देखो पूतना । वरुन-फाँस—(वरुण-पाश)—एकादशी व्रत के वाद एक बार नन्द आसुरी वेला मे ही यमुना-स्नान करने चले गए । इस पर जल-देवता वरुण का किंकर उन्हे वरुण के पास ले गया । श्रीकृष्ण को जब यह मालूम हुआ तो वे स्वयं वरुणालय जाकर पिता को पाश से छुड़ा लाए । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० २८; सू०, प० १६०२ । बलि—एक दानशील, तपस्वी और पुण्यात्मा दैत्यराज जो प्रह्लाद के पौत्र और विरो- चन के पुत्र थे । अपने पुण्यबल से ये इन्द्र का पद लेने ही वाले थे कि इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान् विष्णु ने वटुक वामन का रूप धारणकर दैत्यराज से तीन पद पृथ्वी माँग ली और फिर वृहदाकार धारण करके समस्त भूमण्डल और स्वर्ग को दो पदो से तथा स्वयं बलि के शरीर को तीसरे पद से नाप लिया । अन्त में भगवान् ने प्रह्लाद की अनुनय-विनय तथा बलि के पुण्यकृत्यो से प्रसन्न होकर उन्हें रोग-जरा-मृत्युहीन सुतल मे रहने का तथा इन्द्र पद प्राप्ति का वरदान दिया । बसुद्यौ—(वसुदेव)—श्रीकृष्ण-बलराम के पिता । बासुदेव —(वासुदेव)—भागवत (पांचरात्र या वैष्णव) धर्म के आदि देव जो प्रारम्भ में वृष्णिवंशीय सात्वतो के पूज्य थे । 'हरिवंश' तथा पुराणो के अनुसार श्रीकृष्ण ही असली और द्वितीय वासुदेव हुए । स्वयं श्रीकृष्ण ने अन्य राजाओं (शृंगाल, पौड्रक) के मिथ्या वासुदेवत्व को सिद्ध करके इसे प्रमाणित किया था । वसुदेव के पुत्र होने के कारण भी श्रीकृष्ण वासुदेव कहलाते हैं। बिदुर—(विदुर) —दासी के गर्भ से उत्पन्न व्यास के ओरस पुत्र तथा धृतराष्ट्र और पांडु के भाई, जो अत्यन्त न्यायशील, विवेकशील और भक्त-हृदय थे। महा- भारत युद्ध के पहले समझौता कराने के लिए जब कृष्ण दुर्योधन के यहाँ गये