सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ सूरसागर सार सटीक काल जवन (कालयवन) -- एक निःसंतान यवन द्वारा पाला हुआ, महर्षि गार्ग्य और गोपाली अप्सरा का पुत्र, जो इतना पराक्रमी राजा हुआ कि उसने जरासंध के साथ मथुरा पर आक्रमण करके यादवो को वहां से भगा दिया। श्रीकृष्ण उसके डर से हिमालय की एक गुफा मे भाग गए, जहाँ मांधाता-पुत्र मुचकुन्द सो रहा था। कालयवन कृष्ण का पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा तो उसने सोते हुए मुचकुन्द को ही कृष्ण समझकर उसे लात मारकर जगाया। मुचकुन्द ने ज्यों ही उसे नेत्र खोलकर देखा त्यो ही कालयवन भस्म हो गया। देखो मुचकुन्द द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ५२; सू०, प० ४७८१। काली (कालिय नाग) - कद्रू-पुत्र, नागो का राजा, जो गरुड के भय से अपना निवास स्थान रमणक द्वीप छोड़कर ब्रज के निकट यमुना के एक दह मे रहता था, जहाँ सौभरि ऋषि के शाप के कारण गरुड की गति नही थी। इससे काली दह (कालिय दह) का जल अत्यन्त विषैला हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस दह में, 'सूरसागर' के अनुसार गेंद खेलने के प्रसंग मे, प्रविष्ट करके कालिय को नाथ लिया। श्रीकृष्ण का प्रभुत्व जान कालिय ने उनकी स्तुति की। अन्त मे उसे रमणक द्वीप मे निर्भय रहने का वरदान मिल गया। देखो खगराइ तथा रिषि- साप। द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १६; सू०, प० ११३८-१२०७। कालीदह--ब्रज के निकट यमुना का एक दह जिसमे कालिय नाग रहता था। देखो काली तथा रिपिसाप। कालीनाग (कालिया नाग) - नागों का राजा। देखो काली। कुवलया पीर (कुवलया पीड) - हाथी के रूप में कंस का सहायक असुर, जिसे श्रीकृष्ण ने मथुरा मे मल्लयुद्ध देखने जाते समय रास्ते में ही मार दिया था। द्र० भा०, स्क० १० पू०, अ० ४३; सू०, प० ३६७०-३६७८। कुविजा -- देखो कुब्जा। कुब्जा - कंस की एक (त्रिवक्रा) तीन जगह से टेढ़ी, किन्तु रूपवती दासी जो श्रीकृष्ण को मथुरा-प्रवेश के समय मिली और जिसने वह अगराज जो वह कंस के लिए ले जा रही थी श्रीकृष्ण के मांगने पर उन्हे प्रेमपूर्वक भेट किया। श्रीकृष्ण ने उसका कूबर नष्ट करके उसे परम सुन्दरी बनाया। श्रीकृष्ण से वह प्रेम करने लगी तथा श्रीकृष्ण ने उसके आग्रह पर मथुरा में अपना कार्य-सिद्ध कर लेने के बाद उसके घर आने का वचन देकर उसे विदा किया। 'सूरसागर' मे वर्णन है कि श्रीकृष्ण उसके प्रेम को स्वीकार करके उसके यहाँ गए। उसने भी उद्धव के हाथ राधा और गोपियो के लिए पाती दी थी। भ्रमर-गीत मे गोपियो ने उसके प्रेम पर व्यंग्य किए हैं। द्र० भा०, स्क० १० पू०, अ० ४२; सू०, प० ३६६८-३६६६, ४२५६-४२६८। केसी (केशी) - श्रीकृष्ण को मारने के लिए कंस द्वारा भेजा हुआ एक अश्वरूपधारी