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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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परिशिष्ट (ख) ३८३ तड़पती मछलियों के दुख से द्रवित होकर ऋषि ने शाप दिया कि यदि गरुड यहां किसी मछली को खाएगा तो तुरन्त उसकी मृत्यु हो जायगी । कालियनाग इस रहस्य को जानता था । अतः वह गरुड से बचने के लिए वहीं जाकर रहता था । देखो काली तथा खगराइ । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १७ । लाक्षा-गृह (लाक्षा-गृह) - पांडवो के जलाने के लिए दुर्योधन ने लाख का एक घर बनवाया था परन्तु भगवत्कृपा से पांडव उससे जीवित निकल आए थे । श्रीदामा - श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय और प्रधान गोप-सखा जो बाल-केलि और गोचारण की लीला मे सदैव उनके साथ रहे । 'सूरसागर' के अनुसार कालियदमन लीला का तत्काल कारण उस कंदुक-क्रीड़ा मे आ उपस्थित होता है जिसमे श्रीकृष्ण ने श्रीदामा की गेंद कालियदह मे फेक दी थी और श्रीदामा ने वापस देने का आग्रह किया था । तभी श्रीकृष्ण गें लेने के लिए कालियदह में कूद पड़े थे । ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्म खण्ड) के अनुसार श्रीदामा के शाप के कारण ही राधा और कृष्ण को अवतार लेना पड़ा था । संकर्षण (संकर्षण) - बलराम, वसुदेव के ज्येष्ठ पुत्र, जो पहले देवकी के गर्भ में आए थे, परन्तु विष्णु की माया से देवकी का गर्भ संकर्षित होकर रोहिणी में स्थापित हो गया था ! इसलिए जब ये नन्द के यहाँ रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए, तब गर्ग ने इनका नाम संकर्षण रखा । ये चार व्यूहो - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - मे से एक हैं जो दुष्टो का संहार करते है । बलराम उद्धत- स्वभाव और मद्यप्रिय कहे गये हैं । हल और मूसल इनके अस्त्र है । इसी कारण ये हलधर भी कहे जाते है । सकट (शकट) - छकड़ा या गाड़ी, परन्तु यहाँ वह छकड़ा जिसे पालने मे लेटे शिशु कृष्ण ने पैर से उछालकर गिरा दिया था जिससे वह चूर-चूर हो गया था और उसमें रखे दूध-दही आदि के अनेक बर्तन टूट-फूट गए थे । इस विस्मय- जनक कार्य पर किसी को विश्वास हुआ, किसी को नही । यशोदा ने उसे ग्रहो का उत्पात समझा और स्वस्तिवाचन कराया । 'सूरसागर' मे इसे भी कस का भेजा एक असुर (शकटासुर) कहा गया है । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ७; सू०, प० ६७६-६८० । सनक - सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार मे से एक । ये ब्रह्मा के मानस पुत्र तथा विष्णु के परम भक्त विख्यात हैं । इन लोगो के भक्ति में निरत हो जाने के कारण ब्रह्मा को अन्य पुत्रों की उत्पत्ति करनी पड़ी थी । ये विष्णु के सभासद भी कहे जाते हैं ! विष्णु के द्वारपाल जय-विजय द्वारा रोके जाने पर इन्होने ही उन्हें असुर होने तथा तीसरे जन्म मे उद्धार पाने का शाप और वरदान दिया था । इन चारों में सनत्कुमार सबसे अधिक प्रसिद्ध है । चारो को प्रायः सनकादि कहकर अभिहित किया जाता है ।